25 फ़रवरी, 2020

टूटा घर !





जब भी कहीं से गुजरा हूँ
या गुजरी हूँ
एक फुसफुसाहट ने
विद्युत गति से,
मेरा पीछा किया है
"टूटे घर से है" ...
टूटा घर !
क्या सच में टूटा हुआ घर वो है,
जिसमें माता पिता अलग हो जाते हैं
या वह घर है,
जिसमें बच्चों की दुहाई देते
माता पिता रात दिन चीखते-चिल्लाते हैं !
न जमीन अपनी लगती है
न आकाश
नाम से ही डर लगता है
और सही-गलत माता पिता से
अव्यक्त चिढ़ होती है ।
अलग हो जाने के बाद
निर्भर करता है
कि हम ख्याल करनेवाले के साथ हैं
या फिर अहम की जीत के साथ !
अहम के आगे
न टूटने के मायने रह जाते हैं
ना जुड़ाव का अर्थ
रह जाता है एक एकाकीपन
धुंध भरे रास्ते
छिले हुए घुटने और मन ...
ख्यालों की उंगली मिल जाये
तो बहुत छोटा घर ही मिले,
अपना लगता है ।
जिसके हिस्से
हर तरफ खुला आकाश होता है
पंख फैलाकर उड़ने का साहस
सपने देखने का हौसला ...
वह बिल्कुल टूटा घर नहीं होता,
कम ही रिश्ते मिलें,
पर खरे रिश्ते मिलें
एक सही तिनका मिल जाए
तो अथाह सागर के बीच भी
द्वीपों की राहत हिस्से आ ही जाती है ।
फिर भी लोग !!!
अपनी मर्ज़ी से मान लेते हैं,
कहते हैं - टूटा घर
और एक पूरे घर के वहम में
नफरत भरी जिंदगी जीते हैं
और सोचते हैं
कि बच्चों के लिए
उन्होंने कितना बड़ा त्याग किया है ।
यह त्याग व्याग बड़ी हास्यास्पद बात है
बेहतर है टूटे घर से कहलाना,
...... गर्दिश के मज़े और ही होते हैं
सबके नसीब में नहीं लिखता मालिक !
और सोच के देखो,
ढाई लाख के डाइनिंग टेबल पर
जुड़ी हुई भवों के साथ
छप्पन भोग निगलने से
क्या लाख बेहतर नहीं है
खुले आसमान के चंदोवे तले
हंसी के गुड़ के साथ सूखी रोटी खाना ?
वैसे उतार चढ़ाव के बगैर
ना कोई ज़िन्दगी होती है
ना कोई घर
ना ही कोई रिश्ते ... ।

17 फ़रवरी, 2020

वगैरह वगैरह कहना ...





अपहरण,
हत्या,
विस्फोट,
गोलीबारी,
यातायात दुर्घटना,
किसी लड़की के पीछे
किसी का साइकिक दीवानापन,
उसका जीना हराम करना,
घरेलू हिंसा,
यौन हिंसा ...
ये तमाम हादसे उनके साथ ही
ताज़िन्दगी असरदार होते हैं,
जिनका सीधा संपर्क होता है
(उसमें भी कुछ बेअसर होते हैं)
वरना सब बुद्धिमानी के चोचले हैं !
बारी जब प्रत्यक्ष विरोध की होती है,
तब सब यूँ चुप्पी साध लेते हैं,
जैसे वे हमेशा से शांत नदी थे !!
और कहते हैं,
भूल जाओ,
क्षमा कर दो,
वगैरह वगैरह ...
सुबह,शाम,रात तो जन्म से होती रही है,
आगे भी होती रहेगी
लेकिन दिनचर्या के मध्य मैं
सोचती रही हूँ
ऐसे लोगों की घिचपिच बनावट को,
कभी कुछ
कभी कुछ ... कैसे कह लेते हैं ये !
देखा है
सुना है मैंने इनको झुंझलाते हुए
क्रोध दिखाते हुए
लेकिन
यह सिर्फ इसलिए
कि इनको अपने मायने चाहिए थे,
ये गलत को गलत
सही को सही नहीं कह रहे थे दावे से
ये अपनी अहमियत तलाश रहे थे
...सच के आगे मैं इस तरह कभी सोच नहीं पाई,
परिस्थिति के आगे भी
सच को स्वीकार करते हुए बढ़ी
कभी घड़ियाली आँसू नहीं बहाए
न दुख का मज़ाक उड़ाने वालों के दुख से
विचलित हुई
अगर क्षमा ही श्रेष्ठ होता जीवन में
तो श्री राम ने वाण नहीं निकाला होता
ना ही प्रभु अवतार लेते ।


07 फ़रवरी, 2020

... अब मैं चुप हूँ




घृणा, नफरत से बहुत हद तक उबरी हूँ,
पर - अतीत के दुखद सत्य से नहीं !
वह सत्य,
जिसके आगे अवाक मैं,
महीनों बीमार रही,
बेवजह रोती-चीखती रही
और एक उम्मीद लेकर 
सूखे आंसुओं के साथ सो गई
कि कल सुबह सब ठीक होगा,
मेरे सत्य की बारीकियों से वे बेचैन हो उठेंगे
जिन्हें मैंने निःस्वार्थ प्यार किया
और उतने ही प्यार किये जाने का विश्वास रखा !!!
विश्वास की दीवारों का धीरे धीरे दरकना
कितना खाली करता है
बताया नहीं जा सकता ।
एक बार नहीं,
कई बार 
मेरे सर की छत
पैरों के नीचे की जमीन 
दिन दहाड़े
डंके की चोट पर लेने का प्रयास हुआ ।
मेरे पांव थरथरा रहे थे
सर के अंदर रक्त का सुनामी प्रवाह था
और निरुपाय बहते आंसुओं के आगे
प्रश्नों का घृणित शक़ !!!
ऐसे चक्रव्यूह में घिरे व्यक्ति को
कुछ भूल जाने की सलाह देना
सहज होने की उम्मीद रखना
बहुत हास्यास्पद
और दुखद स्थिति है,
साथ ही उसके भोगे दर्द और बेचैनी का मज़ाक !
निःसंदेह,
 आरम्भ में मेरा रोम रोम जल रहा था
कुछ अपशब्द मेरे जेहन में भी उतरे
कुछ बाहर भी चिंगारी की तरह निकले
लेकिन, 
वह मेरी वास्तविक पहचान नहीं थी ।
आईने के आगे,
एकांत में ,
मैं स्वयम से हतप्रभ थी
और धीरे धीरे मैंने 
बचे हुए जान की बाजी लगा दी
कि अपने अस्तित्व पर 
कुछ भारी नहीं पड़ने दूँगी ।
मैं बददुआ नहीं करती
तो अच्छाई का चोला जकड़कर रखने की खातिर
दुआ भी नहीं करती ।
बुरी लग जाऊँ किसी को
तो परवाह नहीं
परवाह है अब सिर्फ अपनी
और किसी भी गंदगी के लिए
अपने मन-मस्तिष्क की शांति का
हनन नहीं करूँगी
आंसुओं का भी सम्मान करूँगी,
व्यर्थ किसी के लिए बहाकर
उसके होने की गरिमा को 
खत्म नहीं करूँगी ।
अग्नि में धारदार चाकू जैसे शब्दों को तपाकर
जिस दिन मुझ पर वार हुआ
सब चुप थे
.... अब मैं चुप हूँ ।

02 फ़रवरी, 2020

शोर में खुद को डुबोते लोग !




 जब जब मन का दरवाजा खोलकर
बाहर देखा है
एक बेबस शोर देखा है
और उस शोर में खुद को डुबोते लोग !
इन्हें देखकर,
कोई धारणा मत बनाओ
सब के सब हारे हुए हैं
और खुश होने के उपक्रम में
लगे हुए हैं ।
कोई समन्दर की लहरों की शून्यता में
एक नन्हीं सी लहर ढूँढ रहा है
कोई बंजारों को देखते हुए
खुद की ज़िन्दगी को मायने दे रहा है
कोई कपड़ों की दुकान में
लिए जा रहा है कपड़े ...और और और
उदासीन भाव से सोने की कीमत
और अपने पर्स में तालमेल बिठा रहा है ।
मॉडल सी चाल पर
लम्बी साँसों के आने जाने की रस्म निभाते हुए
खुद को सहज बनाने की चेष्टा कर रहा है ।
सब बेखबर से
एक दूसरे को देख रहे हैं,
सवालों की रुई धुन रहे हैं
इसकी ज़िन्दगी तो बहुत अच्छी होगी ?
क्या इसने मेरे दर्द को पहचान लिया ?
दर्द कहूँ या बेतरतीब सी ज़िन्दगी !
ईएमआई भरते हुए
घर से सड़कों की खाक छानते हुए
सब कितने बेघर से हैं ।
बाहर का खाना
लिफ्ट में किसी को देखकर
यूँ ही मुस्कुरा देना
कितना बनावटी हो गया है सबकुछ
खुद को विशेष बनाते हुए
समय के साथ चलने की शाबाशी पाने के लिए !!
न चाय में खुशी
न कॉफी बनाने की नोकझोंक
न सुकून से किसी के गले लगने का वक़्त
जो है
बस रिझाने,बहलाने का उपक्रम है
सच पूछो तो बेवकूफ बनाने का -
घर,बाहर
बच्चे,पति-पत्नी
माँ-बाप !
...रिश्तेदारों से अब मिलना ही कौन चाहता है ?
पड़ोसी के घर हमेशा बन्द रहते हैं
घंटी बजने से उकताहट होती है,
लेकिन कोई आ ही गया
तो "हाय" की चीख के साथ
एक अभिनय शुरू कर देते हैं ।
क्या लेंगे ?
चाय,कॉफी, कोल्ड ड्रिंक,जूस...
पहले तो बस चाय बनकर आ जाया करती थी
थाली या ट्रे में चाय छलक भी जाये
तो कोई बात नहीं थी
अब तो हर बात में मीनमेख ।
तो यारा,
कौन इतना सुने,
अच्छा ही है न
कि जागती सड़कों की तरह
अब हम भी जागने लगे हैं
पार्टी और एक खोज में
रोबोट हो गए हैं ...

जवाब तुम्हें खुद मिल जाएंगे

                                                             (गूगल से साभार) जिस दिन तुम्हारे हिस्से वक़्त ही वक़्त होगा, तुम जानोगे अ...