06 फ़रवरी, 2019

एक शून्यात्मक विस्तार



कोई प्यासा मर जाता है, कोई प्यासा जी लेता है,
कोई परे मरण जीवन से कड़वा प्रत्यय पी लेता है ..."
मर जाना कोई पलायन नहीं,
क्षमता की बात है,
जी लेना भी आंतरिक शक्ति है,
पर जो पी लेता है कड़वा प्रत्यय,
उसकी आत्मशक्ति में होता है देवत्व,
विकल्पों का लंबा रास्ता,
किसी भी सत्य-झूठ से अलग
एक "मैं",
जिसकी जड़ें बंजर को भी उर्वरक बनाती हैं,
जो तपते रेगिस्तान के मध्य
बन जाते हैं पानी से भरा बादल का एक टुकड़ा,
जो अपनी अदृश्य पोटली में
लेकर चलते हैं,
सूरज,बादल,बसन्त,पृथ्वी,वायु
और एक शून्यात्मक विस्तार !!!

13 जनवरी, 2019

मैं लिखूँगी उनका नाम




नहीं लिखूँगी मैं उनका नाम
स्वर्णाक्षरों में,
जिन्होंने तार तार होकर भी
विनम्रता का पाठ पढ़ाया
सम्मान खोकर
झुकना सिखाया
और रात भर देखते रहे छत
और अचानक
 बन्द कर ली आँखें !!!
इस स्वभाव ने जो भी सुकून दिया हो
उनके घाव हरे रहे।
...
मैं उनका नाम कत्तई नहीं लिखूँगी,
जो हर सही ग़लत पर
अपने हठ की मुहर लगाते हैं,
लेकिन सहनशीलता का पाठ पढ़ाते हैं,
और बड़ी सख़्ती से !!!
...
कुछ नाम बड़े ज़िद्दी होते हैं,
हाथ झटककर आगे बढ़ जाते हैं
ख़ुद को ऐसा दिखाते हैं
कि उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता
लेकिन किसी मोहक सम्बन्ध से
यादों से
वे नहीं उबरते,
आवेश में भी उनका अनिष्ट नहीं चाहते,
ना ही उनकी प्रतीक्षा से निर्विकार होते हैं
मैं लिखूँगी उनका नाम
हर जगह की मिट्टी पर
एक बीज की तरह
ताकि उनकी जड़ें मजबूत रहें !
कभी जब सारे रास्ते बंद मिलें
तब उनके नाम की सरसराहट
शीतल,मंद हवा की तरह
कई अनोखे पल याद दिलाये
सच का सामना कराते हुए
ये पौधे,
ये वृक्ष
आपको अपने पास जी भरकर रोने का मौका दें
आपके घाव सूख जायें ... !
झूठे अहम के कीचड़ से
आप मुक्ति पायें
स्वर्ण और मिट्टी का अंतर
आपके रोम रोम में स्थापित हो
समय ऐतिहासिक गवाह बन जाए ।

03 जनवरी, 2019

यह जादू, चलता रहे चलता रहे चलता रहे ...



चाहती हूँ, फिर से अपने बच्चों के लिए परी बन जाऊँ,
उनकी आंखों के आगे जादू की छड़ी घुमाउँ,
उनकी टिमटिमाती आंखों में निश्चिंतता की मुस्कान भर दूँ ।
मुझे पता है,
मैं आज भी उनके लिए परी हूँ,
उनको मेरी अदृश्य जादुई छड़ी पर विश्वास है,
और वे हो जाते हैं निश्चिंत ।
लेकिन,
बुद्धि !!!
अचानक प्रश्न उठाती है,
क्या सच मे माँ जादू कर पाएगी !
यह भय दूर रहे,
मेरी माँ सी ईश्वरीय छड़ी,
उनके सारे सपनों को पूरा करे,
खुल जा सिम सिम कहते,
सारे बन्द दरवाज़े खुल जाएं
और उनकी मासूम हँसी से,
मेरे थके मन को स्फूर्ति मिल जाए
...हाँ,
यह दोतरफा जादू,
चलता रहे चलता रहे चलता रहे ...

01 जनवरी, 2019

नए वर्ष की पहचान लौटाएं ...





कैलेंडर के पन्ने बदल देने से
31 दिसम्बर से 1 जनवरी हो जाने में
वर्ष ना पुराना होता है
ना नया ।
दोनों लम्हें
किसी मुंडेर पर
साथ बैठ जाते हैं।
बीते लम्हों का किस्सा
नए लम्हों को
नई सोच देने की कोशिश करता है !
पूछता है वो बीता लम्हा संजीदगी से,
"लिया था जो संकल्प पहले,
उसे निभाया क्या ईमानदारी से,
जो नए संकल्प आज उठा रहे ?"
सुबह तो रोज होती है,
तारीखें भी रोज बदलती हैं,
उसी बदलने के क्रम में
वर्ष बदल जाता है,
और शुरू होती है 365 दिनों की दौड़ ,
जो सदियों से जारी है
जारी रहेगी।
साल, युग तो तब बदलेगा
जब तुम्हारी सोच में सूर्योदय हो
...
आओ हम आह्वान करें
मन की दहलीज पर
सूर्योदय की प्रतीक्षा करें
जो परम्पराएं हमें जोड़ती थीं,
उनका सम्मान करें,
बड़ों का आशीष ले,
छोटों को आशीष देकर
नए वर्ष की पहचान लौटाएं  ...

20 दिसंबर, 2018

अति का विश्लेषण ज़रूरी है




जब मेरे वजूद में
वसुधैवकुटुम्बकम की भावना थी
सबके लिए अपनी थाली से
बराबर बराबर कौर निकालती थी
एक तिनके से सत्य को भी
खुलकर बताती थी,
सब मौन थे !
उनके मेरे मध्य
खाई जैसा फर्क है ...
यह उन्होंने आँखों से समझाया ।
मैं मूर्ख,
समझते हुए भी
बराबर बराबर कौर निकालती रही,
नारायण स्तब्ध !!
उन्होंने मेरे आगे से
मेरी थाली खींच ली,
दिल-दिमाग में,
सम्पूर्ण रक्त कोशिकाओं में
उन्होंने तांडव किया,
मेरी बेमानी सहजता के
कई मंच तोड़ दिए
...
पाँव स्थिर करने में
वक़्त लगा,
धरती का मजबूत कोना
स्वयं नारायण ही रहे,
लेकिन मौन, बंजर सा रूप लिए ।
साथ तो हम पहले भी थे
अब ज्ञात है ।
संसार अर्थात नारायण
नारायण अर्थात मोक्ष ...
मोक्ष,
प्रेमहीन नहीं
मोह से मुक्त
रोटी के उतने ही टुकड़े करो,
जितने भूखे हैं,
जो तृप्त हैं,
और और की रट में हैं
उनको कौर बढ़ाना
अन्न का अपमान है
जो अपने अपमान से ऊपर है ।
कोशिश
और अति में अंतर होता है
और वही तूफ़ान लाता है
तूफ़ान को दोष देने से पूर्व
अति का विश्लेषण ज़रूरी है ।

11 दिसंबर, 2018

मेरी उपस्थिति तुम्हारा सम्बल बने




डॉ के आले की तरह
मैं तुम्हारी धड़कनें टटोलती हूँ
बीपी मशीन की तरह
रक्तचाप देखती हूँ ...
मैं निर्विकार किसी क्षण नहीं होती,
किसी शून्य में आँखें टिकाकर,
उन ठोकरों को घूरती हूँ,
जिन्होंने तुम्हें ठेस पहुँचाई !
नहीं,नहीं
मैं उनको कोई शाप नहीं देती,
इसलिए नहीं
कि मैं दे नहीं सकती ...
एक माँ कुछ भी कर सकती है,
लेकिन,
मैं इन कमज़ोर क्षणों से
स्वयं को मुक्त करती हूँ
ठोकरों की शुक्रगुज़ार होती हूँ,
जिन्होंने तुम्हें दर्द दिया,
रुलाया,
लेकिन एक सबक दिया ।
माँ अ से अनार सिखला सकती है,
चलना सिखला सकती है,
किसी ग़लती पे कान उमेठ सकती है,
रात भर तुम्हारे लिए करवटें ले सकती है,
सपनों में भी दुआ कर सकती है,
पर मन के आगे,
जीवन के आगे,
अपने अनुभव ही श्रेष्ठ होते हैं ।
संवेदनाओं से इतर,
चोट अपनी होती है,
महसूस करने
और सहने में फ़र्क होता है
और यही फ़र्क
कभी मौन देता है,
कभी बचपन की अहमियत बताता है,
कभी सूक्ष्म रहस्यों के जंग लगे दरवाजों को
खोल देता है,
...
हाँ मैं माँ,
उन रहस्यों की धुंध में
तुम्हारे साथ होती हूँ,
बचपन की कहानियाँ सुनाती हूँ,
डबडबाई आंखों से,
हर्षातिरेक की स्थिति में
हरि का नाम लेती हूँ
ताकि 'हरि' पर तुम्हारा विश्वास रहे
और कुछ हद तक
मैं तुम्हारे अनुभवों की रास थाम सकूँ,
मरहम बनकर तुम्हारे दर्द को कम कर सकूँ,
और मेरी उपस्थिति तुम्हारा सम्बल बने ।

08 दिसंबर, 2018

कुछ ख्वाबों का अधूरा रह जाना ही अच्छा होता है




कई बार कुछ ख्वाब
प्रत्यक्षतः
रह जाते हैं अधूरे !
लेकिन ख्वाबों के उपजाऊ बीजों को सिंचना
मेरे रोज का उपक्रम है ।
हर दिन,
मिट्टी को हल्का और नम करती हूँ
बीज रखती हूँ,
और अंकुरित होती हूँ मैं ...
पौधा,
फिर वृक्ष,
उसकी शाखें
जाने कौन कौन सी चिड़िया
मेरे रोम रोम में चहचहा उठती है ।
कलरव मुझमें प्राण संचार करते हैं,
फिर से मिट्टी को हल्का
और नम करने के लिए ।
कुछ ख्वाबों का अधूरा रह जाना ही अच्छा होता है,
ताकि उनकी पूर्णता की पुनरावृत्ति
इस तरह हो,
और जीवंतता बनी रहे ।



06 दिसंबर, 2018

आमीन


कभी दर्द
कभी खुशी
कभी प्यार
कभी ख्वाब
मैं लिख लिया करती थी,
टूटे फूटे शब्द ही सही,
लगता था,
जी लिया दिन ।
एक दिन कुछ धुआँ सा दिखा,
और हवा के साथ पतंग की तरह उड़ते
कागज़ के कुछ टुकड़े
...जंल रहे थे मेरे एहसास,
जाने किस दिशा में उड़ रहे थे,
न मैं आग बुझा सकी,
न पकड़ पाई उन टुकड़ों को
खड़ी रही अवाक !
...
क्या सिर्फ अवाक ?
नहीं,
मेरी अवाक स्थिति ले रही थी संकल्प
किसी मन्त्र की तरह गूंज रहे थे ये वाक्य
"अपराध को सहते जानेवाला भी
अपराधी ही होता है ।
जो स्वयं की रक्षा नहीं कर सकता,
उसकी रक्षा ईश्वर भी कब तक करेंगे ।"
और मेरे सामने मेरा "मैं" बोल पड़ा,
बस ...अब बस ।
दर्द,खुशी,ख्वाब,प्यार
सब मेरे गले लग गए,
और कहा,
अब लिखो,
तब तक लिखो,
जब तक अग्नि तुम्हारे राख हुए शब्दों का रूप न ले ले,
जब तक हवाएं शब्द शब्द न बहने लगे,
जब तक दिशाएं प्रतिध्वनित हो
तुम तक न लौटें
और मैंने कहा,
आमीन ।

04 दिसंबर, 2018

जा तेरे शब्दकोश बड़े हों




कभी कभी मन करता है,
इसके उसके सबके शब्द चुरा लूँ
और अपनी भावनाओं के बालों को सुलझा
उन्हें क्लिप बना टांक दूँ !
कई बार धूल की तरह
उड़ती नज़र आती हैं भावनाएं,
जब तक समझूँ
आंखों में जाकर बेचैन कर देती हैं ।
कितनी सारी कोशिशें होती हैं
उन धूलकणों को हटाने की
लेकिन वे आँखों की गहरी नदी में
बना लेती हैं अपनी जगह
किसी और दिन बह निकलने के लिए
...
उस दिन के लिए मेरे पास शब्द होने चाहिए न
ताकि मैं उन कणों की गाथा लिख सकूँ !
कभी चुरा लूँ,
तो क्षमा कर देना
धूलकणों सी उड़ती मेरी स्थिति को
दे देना आशीष
कि जा तेरे शब्दकोश बड़े हों ...

23 नवंबर, 2018

पुरुष/स्त्री



पुरुष यानी घर,
ठीक उसी तरह-
जैसे एक स्त्री आँगन ।
ऐसा नहीं कि स्त्री ने बाह्य संघर्ष नहीं किया,
पति की सुरक्षा नहीं की,
परन्तु,
पुरुष शरीर से शक्तिशाली था,
मन की कमजोरियों को,
उसने आंखों से बहने नहीं दिया,
तार तार होकर भी,
वह बना रहा ढाल,
ताकि स्त्री बनी रहे अन्नपूर्णा ।
पुरुष ने मिट्टी का दीया बनाया,
कि स्त्री भर सके उसमें रोशनी ,
अंधेरे से लड़ सके ...!
किसी भी बात की अति,
व्यक्ति को अत्याचारी
या निरीह बनाती है,
और वही होने लगा ।
पुरुष आक्रामक हो उठा,
स्त्री असहाय,
जबकि दोनों के भीतर रही जीवनदायिनी शक्ति,
दोनों थे पूरक,
लेकिन दोनों स्वयंसिद्धा बन गए,
एक दूसरे को नकार दिया,
भविष्य का पुरुष,
भविष्य की स्त्री ,
दोनों उग्र हो उठे,
परिवार,समाज से अलग
उनका एकल वर्चस्व हो,
इस कल्पनातीत इच्छा के आगे,
उनकी अद्भुत क्षमताएँ
क्षीण होने लगीं ।
प्रेम दोनों के आगे 
फूट फूटकर रो उठा,
घर का कोना कोना सिहरकर पूछने लगा,
कहाँ गया वह पुरुष
और वह स्त्री,
जिनसे मेरा वजूद था,
बचपन की मासूमियत थी,
बिना किसी तर्क के
पर्व-त्योहार थे, 
मेजबान और मेहमान थे ...
अब तो एक ही सवाल है,
इतना सन्नाटा क्यों है भाई,
या फिर है खीझ,
"ये कौन शोर कर रहा है" 
!!!

18 नवंबर, 2018

मन न भए दस बीस

 शरतचन्द्र का लिखा "देवदास" मेरी पहली किताब थी, जिसे मैंने डूबकर पढ़ा, और मेरा पूरा वजूद पारो' बन गया, कल्पनालोक की सीढियां उतरती पानी भरती, दौड़ती एक पुकार के साथ...देवदास$$$$ ।
फिर मेरी ज़िंदगी में आई शिवानी की "कृष्णकली" और मेरा एकांत शोख़ी से प्रवीर से बातें करने लगा ... "सुनो, यह तुम्हारी कुन्नी की साड़ी नहीं है"...
कृष्णकली की गली से निकली तो सामने खड़ा था "न हन्यते" का मिर्चा ...और अमृता बनकर मैं उससे मिलने गई । काश, मिर्चा देखता, लेकिन उससे क्या, अमृता की आहट से उसने वर्षों बाद भी उसे देख लिया ।
उम्र के साथ कहानियों का जो पड़ाव मिला हो, पात्रों में कहीं न कहीं समानता थी, शायद इसे ही कहते हैं पुनरावृति का आकर्षण, भविष्य का अद्भुत हस्ताक्षर ।
शिवाजी सामन्त की पुस्तक "मृत्युंजय" जब हाथ में आई तो कर्ण मेरी नसों में पुनः प्रवाहित होने लगा, दिनकर की "रश्मिरथी",लोगों की ज़ुबानी कहानी, सीरियल, इन सबसे एक बीजारोपण तो हो ही चुका था ।
इनदिनों, मैं एक तरफ वृंदावन में राधेकृष्ण सी चित्रित हो गई हूँ तो दूसरी तरफ कर्णसंगिनी बन कर्ण के अपमान, धैर्य की पराकाष्ठा देख रही हूँ । रसखान की पंक्तियों को गुनते हुए लगता है,"आठहुँ सिद्धि नवोनिधि को सुख नन्द की गाय चराय बिसारो"
सूरदास की कलम में उतरकर गोपिकाओं का हृदय बांचती हूँ -
"ऊधौ मन न भए दस बीस। एक हुतौ सो गयौ स्याम सँग, को अवराधै ईस।। इंद्री सिथिल भई केसव बिनु, ज्यौ देही बिनु सीस। आसा लागि रहति तन स्वासा, जीवहिं कोटि बरीस।। तुम तौ सखा स्याम सुंदर के, सकल जोग के ईस। ‘सूर’ हमारै नंदनँदन बिनु, और नाहिं जगदीस।।"

 कृष्ण का प्रयोजन कृष्ण ही जानें ।




एक शून्यात्मक विस्तार

कोई प्यासा मर जाता है, कोई प्यासा जी लेता है, कोई परे मरण जीवन से कड़वा प्रत्यय पी लेता है ..." मर जाना कोई पलायन नहीं, क्षमता क...