02 जनवरी, 2022

नया साल

 

नया साल,

 कुछ शोर

कुछ सन्नाटे में आया

और एक पूरा दिन गुजारकर

अंगीठी के आगे बैठ गया है ।

बीते साल का सूप पीते हुए

यह नया साल ओमिक्रोन से बचने की तरकीब बता रहा है,

और लोग !!!

अपनी अपनी बुद्धिमत्ता के पर्चे बाँट रहे हैं,

"अरे कुछ नहीं होगा,

हुआ भी तो कोई दिक्कत नहीं,

मरना तो है ही,

कैसे - वह भी तय है,

अगर इसीसे तो क्या कर सकता है आदमी !"

और कुछ लोग मासूमियत से सुनते हुए

डबल,ट्रिपल मास्क लगाकर बैठ जाते हैं . . .

"जो भी हो ख्याल तो रखना ही होगा"

ह्म्म्म ...

भीड़ से एक आवाज आती है,

कुछ नहीं होगा यह सब पहनने से,

जब होना है, हो ही जायेगा !

नया साल 

अपनी एक वर्षीय यात्रा को 

ध्यान में रखकर

महामृत्युंजय मंत्र पढ़ रहा है ...

24 दिसंबर, 2021

एक स्त्री


 


एक स्त्री हर रोज बिछावन ठीक करते हुए किसी दिन आलस में आती है, सोचती है - आज रहने देती हूँ सबकुछ बिखरा बिखरा ही, पर उसे ही लगने लगता है कि कोई आया या नहीं भी आया तो बेतरतीब कमरे में मन भी बेतरतीब हो जाएगा और सोचते हुए वह तह कर देती है रजाई,कम्बल,इत्यादि चादर पर पड़ी सिलवटों को सीधा कर देती है तकिये को हिला डुलाकर ज़िंदा कर देती है फिर रसोई में जाती है । रसोई में नज़रें दौड़ाते हुए अपनी थकान महसूस करते हुए वह सोचती है ऐसा क्या बनाऊं, जो जल्दी हो जाये, स्वाद भी हो, टिफ़िन नाश्ता सब हो जाये ! एक ख्याल गले लिपटता है, आज रहने देती हूँ... और तभी दूसरा ख्याल झकझोरता है बाहर से कुछ ढंग का मिलता नहीं, और और और के बीच कुकर की सीटी बज उठती है सब्जी,पराठे,पूरी,टोस्ट . . . खिलखिलाने,इतराने लगते हैं और एक स्त्री की थकान कम हो जाती है । ऐसी जाने कितनी दिनचर्या वह निभाती है इस निभाने में चुटकी भर खुद को भी जी लेती है कुछ लिख लेती है, पढ़ लेती है, टीवी देख लेती है, अपनों के संग ठहाके लगा लेती है ... ऐसी स्त्री किसी दिन कमरे की बेतरतीबी में चुप बैठी मिले, रसोई से कोई खुशबू न आये, चूल्हा ठंडा रहे, धूप के लिए पर्दा न हटे, ..... तब समझना, समझने की कोशिश करना कि वह थकी नहीं है, बीमार है - शरीर या मन से ! ऐसे में यह मत कहना, "क्या ? आज कुछ बनेगा नहीं ? सब बिखरा बिखरा है, समय देखा ?" बल्कि कंधे पर हाथ रखकर स्नेह से पूछना, "क्या बात है क्या हुआ?" मुमकिन है, वह उमड़ पड़े या एक स्पर्श से स्वस्थ हो जाये, खुद में खिली खिली धूप बन जाये ... स्त्री जिस रिश्ते में हो, उसकी पहचान को पहचानो, अर्थ दो, उसे मशीन मत मान लो या उसके करते जाने की क्षमता के आगे मुँह बिचकाकर यह मत कहो, "कह देती तो हम कर लेते . . ." ... तुम्हें तो कहने की ज़रूरत नहीं पड़ती न ?

17 नवंबर, 2021

भगवान थे !


 



भगवान थे जब उसकी आँखों में मोहक सपने थे,
कभी राधा,मीरा
तो कभी किसी अल्हड़ सी बारिश को देखकर
उसके मन में बिजली कौंधती,
ठंडी,शोख़ हवायें बहतीं ...
जिस दिन सपने टूटे,बिखरे
बिजली गिरी,
हवायें दावानल हुईं,
भगवान तब भी थे ।
वह रोई,
फूट फूटकर रोई,
मन के सारे दरवाज़े बंद कर दिए,
भगवान को बेरुख़ी से देखा,
कागज़ पर दर्द उकेरने लगी ...
उस दिन भगवान ने धीरे से
दबे पांव एक सुराख़ बनाया
... एक महीन सी किरण,
उसके कमरे में चहलकदमी करने लगी,
धीमी हवा ने सर सहलाया,
हर उतार-चढ़ाव को शब्द दिया,
जो जिजीविषा बन उसकी हक़ीक़त बने
अहा,
भगवान उस वक़्त भी मौजूद थे
और प्रयोजन,परिणाम का ताना बाना बुन रहे थे ।
जिस दिन मंच पर उपमाओं से सुशोभित वह खड़ी हुई,
उसने महसूस किया सोलहवां साल...
उस दिन वह हीर बन गई,
अदृश्य पर मनचाहे रांझे को
रावी के किनारे
खुद की राह देखते खड़ा देख
उसने प्रेम को जाना
भगवान को माना
वह राधा से कृष्ण हुई और
कृष्ण से कृष्णा हो गई।
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12 नवंबर, 2021

आओ, मिलकर बढ़ें ...


 

रुको, रुको
मिलने पर,
मोबाइल पर,
अर्थहीन मुद्दों को दफ़न करो,
चेहरे की उदासी
आवाज़ के खालीपन में
एक छोटी सी मुस्कुराहट लेकर
एक दूसरे को महसूस करो ।

सूक्तियों को विराम दो,
अपनी अच्छाइयों,
अपनी सहनशीलता से ऊपर उठकर
अपने रिश्तों की गुम हो गई अच्छाइयों पर गौर करो,
अपने अहम को,
अपनी शिकायत को त्यागकर
बिना कुछ कहे
सर पर हाथ रखो
गले मिल जाओ
... शिकायतों के तीखे पकवान रखो ही मत !...

उम्र और समय का तकाज़ा है,
कि वे सारी शिकायतें
जो अपने बड़ों के लिए
मन के कमरों में रो रही हैं,
उन्हें तुम मत दोहराओ
इस क्रम को भंग करो !
रिश्तों का मान चाहिए
तो मान देने की पहल तो करो !

प्रश्न उठाने से क्या होगा ?
प्रश्न और उत्तरों की लड़ाई
महाभारत से कम नहीं ...
बड़ा रक्तपात होता है
इस लड़ाई में कुछ नहीं मिलेगा
दिन व्यर्थ बीत जाएंगे,
इन्हें व्यर्थ क्यों बीत जाने दें
हर पल अमोल है...
दिन बीत जाने से
मन में काई जमती जाती है
उसकी फिसलन,चोट
और थकान के अर्थ
गहराते जाते हैं !

जो दूसरों से ढूंढते हो,
वह करके देखो,
बंजर हो गए हैं जो अपने
उन सब पर
समय के कुएं के जल का
रोज़ थोड़ा छिड़काव करो
मोबाइल है हाथ में
एक प्यार भरा मैसेज रोज करके देखो
जवाब आएगा
वह अपना कॉल बेल नहीं
दरवाज़े की सांकल खटखटाएगा
ड्राइंग रूम की गद्देदार कुर्सियों को परे करके
ठंडी ज़मीन पर औंधे होकर
दुनियाभर की बातें करेगा ।

शिकायतों के भय से
खुद तो उबरो ही,
औरों को भी उबारो
चाहते हो फिर से जीना
तो वे दीवारें
जो तुमने उठाई हैं
और हमने भी,
उन्हें गिराना है ...
रिश्तों की मज़बूत लौह सलाखें
कब से यों ही अनाथ सी पड़ी
जंग खा रही हैं
साथ आकर उसे हटाओ
एक ईंट हम निकालें
एक ईंट तुम निकालो
ऐसा करो
यदि प्यार है,
मिलने की शेष चाह है,
रिश्तों की अहमियत के चूल्हे में
आँच बाकी है तो...
...
समय समाप्ति का पर्दा गिरे
उससे पहले,
गलतफहमियों के बेरंग पर्दे
उतार कर फेंक दें !
आओ,
मिलकर बढ़ें ...
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06 अक्तूबर, 2021

हम आज भी वहीं खड़े हैं


 

हम आज तक वहीं खड़े हैं
जहां जला दी जाती थी बहुएं
घर का सारा काम 
उनके सर पर डाल दिया जाता था
 नहीं मिलता था उन्हें समय पर खाना
नहीं इजाज़त थी उनको
बिना नहाए रसोई में जाने की
मायके से किसी के आने पर
उल्लास से दौड़ने की . . .

हममें से ही कुछ स्त्रियों ने 
अपनी आंखों की गंगा को लुप्तप्रायः कर दिया
समाज हिकारत से कहने लगा,
पागल हो गई है औरत,
जिसके व्यवहार में पानी नहीं
वह घर के पानी का अर्थ क्या समझेगी
जब पति की भूख प्यास का ख्याल नहीं
तब इससे कोई और क्या उम्मीद रखेगा !
भीड़ से निकलकर किसी एक ने
जब आंखों की गंगा का आह्वान किया
सम्मान के दीये जलाए
तब उस स्त्री की आंखों से 
बमुश्किल निकली कुछ बूंदों ने
चेहरे पर उभरी सुकून की एक रेखा ने
उसे चरित्रहीन' सिद्ध किया ।

गंगा और गाय बनी स्त्री ने 
स्वयं में स्थित दुर्गा का आह्वान किया
और करने लगी संहार ...
जग जानता है,
जब भी कोई शक्ति उभरी है
तो उसके साथ विकृत
बुरी शक्तियां भी उभरी हैं
... वही हुआ ...
चतुर स्त्रियों ने उन स्त्रियों को जलाना शुरू किया,जो हित में खड़ी हुई थीं,
सही पुरुषों से जवाब मांगने लगीं
यह काम हम ही क्यों ?
की जगह
सारे काम तुम करो की गर्जना करने लगीं ।
दुर्गा ने रक्त पान किया था
इन स्त्रियों ने सारी वर्जनाएं तोड़ डालीं
रक्त के साथ मदिरा का सेवन किया
पुरुष सिर्फ क्यों" के हाहाकारी प्रश्नों के साथ
वह किया
कि पीड़ित स्त्रियों ने अपना दरवाज़ा बन्द कर दिया ।
सही गलत के मंथन में
विष निकला
और मनुष्य ने विष ले लिया
पूरे परिवार को पिला दिया
और अब वह अपने निर्मित दम्भ भरे महल में
पत्थर होता जा रहा है ।

इस धू धू जलते चक्रव्यूह में
एक प्रश्न है,
जब एक पुरुष स्त्री वेश धरकर
बिंदी,सिंदूर,चूड़ी,साड़ी पहनकर 
बाहर निकलता है
तो कोई उसे पुरुष नहीं कहता
फिर पुरुष के वेश में घूमनेवाली स्त्रियों को
स्त्री क्यों मान लिया जाए !!! 
शायद यही वजह है,
कि कुछ अपवादों को छोड़कर
हम आज भी वहीं खड़े हैं
जहां स्त्रियों को अपने अस्तित्व के लिए
अपनी सहनशीलता,विनम्रता से युद्धरत होना पड़ता है,
आगत की जमीन पर 
कुछ संदेशों के बीज डालने होते हैं
और शब्दों की अग्नि में
शब्दों का घी डालना पड़ता है ...

23 सितंबर, 2021

उसी की अदृश्य शक्ति


 


जब कभी' मंदिर गई हूं
और अगर भीड़ न हुई
तो ईश्वर को अपलक देखकर
मन ही मन बहुत कुछ कहकर
लौटी हूं ।
सिद्धि विनायक में
गणपति के मूषक के कान में
अपनी चाह बोलते हुए
ऐसा लगा है
कि गणपति तक बात चली गई
और जब बात चली गई
तो देर कितनी भी हो जाए
अंधेर की गुंजाइश नहीं रह जाती !
शिरडी की भीड़ में
जब अचानक साईं दिखे थे
तो आंखों से आंसू बह निकले थे
...
यूँ मैं मंदिर कम ही जाती हूं
विश्वास है
कि ईश्वर मेरे पास,मेरे साथ हैं
और ऐसे में जाना 
लगता है कि उनकी ही इच्छा होगी ...

दरगाह में धागा बांधते हुए
मैं धागा बन जाती हूं
धागे में दुआ मतलब
मुझमें दुआ ...
तो धागे संग दुआ बांधती हूं
और दुआओं के साथ 
खुद बंधती चली जाती हूं ।

स्वर्ण मंदिर गई
तो उसके निकट
अपने आप में एक अरदास बन गई हूं
कड़ा लेकर ऐसा लगा
जैसे मेरा मन ही स्वर्णिम हो गया हो ।

महालया के दिन
पूरी प्रकृति माँ दुर्गा बन जाती है
कलश स्थापना करते हुए
मिट्टी में जौ मिलाते हुए
यूँ महसूस होता है कि
मैं मिट्टी से एकाकार हो रही हूं
और चतुर्थी से हरीतिमा लिए
 नौ रूप का शुद्ध मंत्र बन जाती हूं ।
अखंड दीये का घृत बन
स्वयं में एक शक्ति बन जाती हूं ।

सुनकर आप विश्वास करें
ना करें
मुझे कवच,कील,अर्गला, तेरह अध्याय
और क्षमा प्रार्थना में 
जीवन का सार मिल जाता है
और हवन के साथ
मैं मंदिर मंदिर गूंज जाती हूं
यज्ञ की अग्नि में
रुद्राभिषेक के जल में
मैं खुद कहाँ नहीं होती हूं !

मैं मंदिर
मैं गिरजा
मैं गुरुद्वारा ...
कैलाश से गुजरती हवाओं में मैं हूं
जहां जहां से मुझे पुकारा है
वहां वहां मैं रही हूं
और रहूंगी ... 
उसकी ही तरह
उसकी शक्ति - सी
अदृश्य पर सर्वदा !!!

19 सितंबर, 2021

स्त्री लिपि


 

मनुस्मृति के पन्नों पर
एक श्रद्धा थी स्त्री लिपि
जो मनु की ताकत बन पहुंची थी
उसके उद्विग्न मन के आगे,
 थमाई थी उसे अपनी जीवनदायिनी उंगली
और प्रकृति के कण कण में मातृरूप लिए
 हवाओं की छुवन को आत्मसात किया था ।

विश्वास था उसे,
अब कोई प्रलय नहीं आएगा
तभी उसने युगों का आह्वान किया
यज्ञ कुंड बनी
वृंदा बन हर आंगन पहुंची ... 
पर नियति निर्धारित झंझावात में
वह प्रश्न बनकर प्रवाहित होने लगी,
एक नहीं,दो नहीं
जाने कितने कटघरे बन गए
और स्त्री लिपि वर्जित हो गई ।

उसे विध्वंस का कारण बना दिया गया
उसके शुभ कदमों को रोकने,जलाने के उपाय होने लगे,
कन्या पूजन के नाम पर
माँ दुर्गा को छला जाने लगा
कन्या के जन्म से पूर्व ही
उसे मृत्युदंड दिया जाने लगा ...

अनगिनत घरों से दुर्गंध आने लगी
तब पुनः स्त्रियों ने अपने अस्तित्व को संवारा
खुद को मशाल बना 
खुद को खुद में लिपिबद्ध करने लगी
स्पष्ट शब्दों में लिखा,
नारी तुम केवल श्रद्धा नहीं हो
मनु को जीवन देनेवाली
उसे अर्थ देनेवाली संजीवनी हो ।

परोक्ष का मौन,
तुम्हें कमज़ोर बनाता गया है
उस मौन की कारा से बाहर निकलो,
अपना पूजन स्वयं करो
अपनी शक्ति से अपना अभिषेक करो
और चण्डमुण्ड,रक्तबीज,महिषासुर का
वध करो,
किसी भी युग के आह्वान से पहले
खुद का आह्वान करो ...



14 सितंबर, 2021

नज़रिए का मोड़


 

बात सिर्फ नज़रिए की है
कौन किस नज़रिए से क्या कहता है ,करता है
कौन किस नज़रिए से उसे सुनता,और देखता है
और इन सबके बीच 
एक तीसरा नज़रिया
उसे क्या से क्या प्रस्तुत कर देता है,
जाने क्या मायने रखता है सबके लिए !!!

ईमानदारी बहुत कम है दोस्तों,
कुतर्कों की अमर बेल तेजी से फैल रही है...
आलीशान घर हो या फुटपाथ
सबके पास एक मोबाइल है
और मोबाइल पर - क्या नहीं है !

गली गली, हर मोड़ पर
अजीब अजीब विचार और व्यवहार तैर रहे हैं,
जो नहीं तैर पाया उनके साथ
वह डूब गया ।
कोई डूबना नहीं चाहता
ऊपर रहने के लिए बगैर कपड़ों के भी आना पड़े
तो यह उनका नज़रिया है,
व्यक्तिगत मामला है ।

... मैं सोचती रहती हूं
डुबो या तैरो
आखिर कब तक !!!
एक दिन वही शमशान होगा
वही चिता होगी
या कोई अनजान जगह ...
जहां खोकर पता भी नहीं चलेगा !

कभी कभार चर्चा होगी,
जब तक कोई जाननेवाला है
उसके बाद कहानी 
कब, कैसे कैसे मोड़ लेगी
अनुमानों की चपेट में आएगी

कौन जाने !!!

13 सितंबर, 2021

जर्जर परंपरा तोड़ दो


 



स्त्रियां निर्जला व्रत प्यार का प्रतीक मानती हैं
पति,बच्चों के लिए ...
ऐसा करके वे खुद को मान लेती हैं सावित्री
और दृढ़ माँ !
अनादि काल से ऐसा देखते देखते 
पुरुषों ने,बच्चों ने मान लिया
कि उनकी पत्नी
उनकी माँ - सबसे जुदा हैं ।
गर्व से कहते हैं सब,
"बिल्कुल कुछ नहीं लगा ...!"

न लगने की यूँ कोई उम्र नहीं होती,
पर वह उम्र -
जब दवा के सहारे जीने लगता है आदमी,
तब खुद को सबसे जुदा रखने के लिए
खुद के लिए सोचना चाहिए,
सोचना चाहिए पति और बच्चों को
कि पानी बगैर रहना
सारी व्यवस्था करके पूजा पर बैठना
सर्कस का सबसे बड़ा खतरनाक खेल है
उंगली थमाते थमाते अचानक
ईश्वर भी हतप्रभ हो उठते हैं 
और कहने को रह जाता है एक ही वाक्य,
"नहीं करती तो कुछ हो जाता, "
...... 
ईश्वर कहें या आप,
पर रो रोकर 
दबी आवाज़ में 
बार बार यह कहने से अच्छा है
इन प्रश्नों और
व्यर्थ टिप्पणियों के चक्रव्यूह से 
बाहर निकलें
मन को गंगाजल कर लें
और मानसहित कहें -
"बहुत हुआ, अब रहने दो
हमारे लिए है ना 
तो हम कहते हैं, 
आज हमें कहने दो -
तुम स्वयं दुआओं का कलश हो 
जिसके जल से हम रोज़ नहाते हैं
तुम्हारी आंखों के गोमुख से 
जिस जाह्नवी की धारा बहती है
उसमें प्रतिपल भीग जाते हैं 
तुम्हारे अंतर का पूजागृह 
जिसके कपाट
कभी बंद ही नहीं होते हैं
तुम्हारी बातें हैं हर की पौड़ी 
जहां सुबह शाम उतर कर 
हम अपने सारे कष्ट धोते हैं 
तुममें सांस लेता है हर व्रत,
हर मंदिर, हर तीर्थस्थल 
तुमसे पावन नहीं हो सकता 
कोई पुरी या रामेश्वरम
या गंगासागर,
कोई कैलाश मानसरोवर
या मुक्तिदायिनी
भागीरथी का जल... 
तुम्हारा है हमारे भीतर वास
जर्जर हो रही इस परंपरा को
तोड़ दो
अब छोड़ भी दो 
ये निर्जला व्रत
यह उपवास।"

03 सितंबर, 2021

बरसाने की राधिका


 


साठ की कुछ सीढ़ियां चढ़ तो गई है वह स्त्री,

लेकिन वह उम्र और कर्तव्यों का
एक ढांचा भर है !
प्रेम उसका सपना था
प्रेम उसकी ख्वाहिश थी
अपनी पुरवा सी आंखों में
उसने प्रेम के बीज लगाए थे
 प्रेम की सावनी घटा बनकर
धरती के कोने कोने में 
थिरक थिरक कर बरसी थी।
इंद्रधनुष के सातों रंग
उसके साथ चलते थे,
गति की तो पूछो मत
हिरणी भी हतप्रभ हो दांतों तले उंगली दबाती थी  ।
ख्यालों में उसके कोई देवदार सा होता
और वह अल्हड़ लता सी
उससे लिपट जाती थी,
प्रेम का अद्भुत नशा था
अद्भुत उड़ान थी
कब वह कैक्टस से उलझी
कब उसके पंख टूटे
जब तक वह समझे
संभले 
वह दो उम्र में विभक्त हो चुकी थी,
एक प्रेम
एक मौन कर्तव्य !
मौन कर्तव्यों की यात्रा में
उसके चेहरे पर 
कब थकान की पगडंडियां उगीं
कब बालों का रंग मटमैला हुआ
कब पैरों के घुटने समाधिस्थ हुए
उसे खुद भी पता नहीं चला ।
तस्वीरों में
आईने में कई बार
खुद को ही नहीं पहचान पाई है
क्योंकि ख्वाबों में आज भी वह 
विद्युत गति से नृत्य करती है
अनिंद्य सुंदरी बन
अपनी पलकों को झपकाते हुए
प्रेम के शोखी भरे गीत गाती है 
सुनती है -
रावी और चनाब के किनारे
उसके नाम की तरंगें उछालते हैं 
एक उसे हीर कहता है 
एक अपनी सोहणी बताता है 
और दोनों किनारों के 
दरमियान खड़ा 
एक जवां अधीर साया 
उसके कानों में गुनगुनाता है 
"जलते हैं जिसके लिए
तेरी आँखों के दीये .."
इसे सुनकर, रोमांचित होकर 
वह ज़िंदगी के दरवाज़े पे लगे 
खामोशी के ताले खोलती है 
मुस्कुराते  हुए 
पड़ोसी दिल से बोलती है  ... 
"वह गोकुल का छोरा 
नटखट ग्वाला 
नंदलाला  ... 
युग बदले 
पर वह 
कण भर भी नहीं बदला  ... 
तो मैं आज भी 
बरसाने की 
राधिका ही हूं ना !


30 अगस्त, 2021

मैंने देवकी और यशोदा को ही जिया है


 



कृष्ण को सोचते हुए, 
मैं कभी राधा नहीं हुई,
न सुदामा, न सूरदास,न ऊधो ...
मैंने देवकी और यशोदा को ही जिया है,
लल्ला को गले लगाकर दुलारा है
बरसों का रुदन दबाए बिलखी हूँ ।
मैं बस माँ रही ...
क्या करती अपने ही कान्हा से गीता सुनकर
उसके मुख में ब्रह्माण्ड देख
उसे याद क्या रखना था,
मुझे तो बस भोली माँ बन
उसकी बाल लीलाओं से आनन्दित होना था
अन्यथा सच तो यही है
कि मुझ देवकी के 
सांवरे सलोने लाल ने
गीता का ज्ञान
मेरे गर्भ में लिया 
मेरे आंचल की छांव तले ब्रह्माण्ड को आत्मसात किया
उसे जगत कल्याण के निमित्त
ज्ञान का आगार बनना था,
मुझे अज्ञान के हिंडोले में
पेंग मारते हुए,
उसे अपलक देखते
विदा करना था
और सूने कक्ष में बैठ
उसकी मोहिनी सूरत को
स्मरण करना था
मगर ...
उस जैसा ज्ञानेंद्र
अज्ञानी जननी की
कोख से जन्मे
क्या कभी संभव है !
सात पुत्रों की नृशंस हत्या के आगे भी
मैं आठवें के विश्वास से परे नहीं हुई
ऐसे में,
प्रकृति के सारे सामान्य नियम बदलने ही थे !
कारा की कठोर धरती
और लौह बेड़ियों ने
मुझे स्वयं से
कई गुना कठोरतर बनाया
और चौदह वर्षों के लिए
मेरी आत्मा को यशोदा की आत्मा से बदल दिया ।
यशोमति का तन
देवकी का मन 
कान्हा का भरण पोषण
मैंने अपने लाल को 
यशोदा के हाथों से
माखन सा निर्मल,कोमल,और स्वाद से भरा बनाया
माथे मोरपंख लगा 
पैरों में मोर के नृत्य की गति दी
काठ की बांसुरी देकर शिक्षा दी
कि चाह लेने भर की देर होती है
पत्थर को भी सजीव किया जा सकता है
मनोबल हो तो 
गोवर्धन को उंगली पर उठाया जा सकता है !

एक सत्य और बताऊं,
लल्ला का सुदर्शन चक्र
हमदोनों मायें थीं
हमने उसे कभी भी
कहीं भी
अकेला और निहत्था नहीं किया
अभिमन्यु और कर्ण की मृत्यु पर
जब वह बिलखा था
उसके सारे आंसू हमने आँचल में बटोर लिए थे
 
... आज कृष्णा का जन्मदिन है
मुझ देवकी को पीड़ा सहनी है
बाबा वासुदेव को यमुना पार करना है
नन्द बाबा को उनकी गोद से कान्हा को लेकर
यशोदा का लाल बनाना है
फिर से गोकुल,वृंदावन,मथुरा,द्वारका को दोहराना है
आततायियों का नाश करना है
...
उससे पहले हमारे लाल को
जरा जरा माखन खिला दो
और जमकर उसका जन्मोत्सव मनाओ ...

नया साल

  नया साल,  कुछ शोर कुछ सन्नाटे में आया और एक पूरा दिन गुजारकर अंगीठी के आगे बैठ गया है । बीते साल का सूप पीते हुए यह नया साल ओमिक्रोन से बच...