15 अक्तूबर, 2018

एक कविता हूँ - अतुकांत !




मैं कोई कहानी नहीं,
एक कविता हूँ - अतुकांत !
पढ़ सकते हो इसे सिलसिले से
यदि तुमने कुछ काटने के दौरान
काट ली हो अपनी ऊँगली,
और उसका भय,
उसका दर्द याद रह गया हो !
तुम समझ सकोगे अर्थ,
यदि तुमने थोड़े बचे अन्न के दानों को देखकर सोचा हो,
कि लूँ या किसी और के लिए रहने दूँ ।
तुम्हारी ख़ास पसन्द की लाइब्रेरी में शामिल हो जाएगी,
यदि किसी भी चकाचौंध में तुम,
पैबन्द भरी जिंदगी के मायने न भूल पाओ तो !
यत्र तत्र बिखरे से शब्द,
तुम्हारी आँखों में पनाह पा लेंगे,
यदि आकस्मिक आँधियों में,
तुम्हारा बहुत कुछ सहेजा हुआ
बिखर गया हो,
गुम हो गया हो !
सर से पांव तक लिखी कविता,
जरा भी लम्बी नहीं,
बेतुकी भी उनके लिए है,
जो ज़िन्दगी के गहरे अंधे कुंए से नहीं गुजरे,
रास्तों को पुख़्ता नहीं किया,
बस पैसे की कोटपीस खेलते रहे ...

13 अक्तूबर, 2018

चीख भर जाए तो अपना आह्वान करो




#me too

दर्द कहने से दर्द दर्द नहीं रह जाता ।
उफ़नते आक्रोश,
बहते आँसुओं के आगे कोई हल नहीं ।
माँ कहती है, चुप रह जाओ,
झिड़क देती है,
उसके साथ नानी ने भी यही किया था,
क्योंकि, कहने के बाद -
जितने मुँह,
उतनी बातें होंगी !
भयानक हादसों के चश्मदीद,
क्या करते हैं ?
इतिहास गवाह है ...
बेहतर है,
आगे बढ़ो ।
गिद्ध अपनी आदत नहीं बदलेगा,
समाज ढिंढोरा पीटेगा,
नाते-रिश्तेदार कहानी सुनेंगे,
नौटंकी' कहकर,
उपहास करेंगे,
... इसलिए इन गन्दी नालियों को पार करो,
दुर्गंध उजबुजाहट भरे तो थूको,
आगे बढ़ो ...
एक चीख भर जाए भीतर,
तो अपने उस अस्तित्व का आह्वान करो,
जिसे माँ दुर्गा कहते हैं ,
अपनी पूजा ख़ुद करो ।

01 अक्तूबर, 2018

एक मौसम था




कट्टमकुट्टी का खेल,
बात बात पे लड़ने का आनन्द,
टिकोले चुनने का सुख,
लेमनचूस को,
जीभ के नीचे छुपाकर
ख़त्म हो जाने का नाटक,
कबड्डी में धीरे से सांस लेकर
नहीं मानने की तमतमाहट
... एक मौसम ही था,
जो ख़रगोश बनने की जुनून में,
ख़त्म ही हो गया ।
छत की खाट,
चार डंडे से लगी मसहरी,
सर्र से छूती हवा,
और गहरी नींद ...
जाने कहाँ रह गया वह सुकून ।
4 से 5
5 से 6 इंच,...
मोटे से मोटे होते गए गद्दे,
बीमारी का सबब बन गए ।
न रेस्तरां में वो बात है,
न कैफ़े में,
मिट्टी के चूल्हे पर बड़ी सी कड़ाही में
जो कचरी
और नमकीन सेव बनता था,
उसका स्वाद ही अनोखा था !
अपने घर के छोटे हरे मैदान में,
क्रिकेट का मैच,
सावधानी की हिदायतें,
बावजूद इसके,
खिड़की के शीशे का टूटना,
चेहरे पर बॉल का लगना,
फिर चीख-पुकार,
कोई तो लौटा लाओ ।
पेड़ से लटका रस्सी का झूला,
रईसी में लगा लकड़ी का पीढ़ा
ऊँची, और ऊँची पींगे,
हवा और बचपन की गलबहियां,
कुछ नहीं दिखाई देता,
धूल भरे पाँव को
साफ़ सुथरे घर में,
उधम मचाने की इजाज़त नहीं,
कीचड़ का तो सवाल ही नहीं ...
सबकुछ सबके हिसाब से
कीमती हो गया है,
साड़ी से पर्दे बनवाकर,
उसे छूकर,
 जो गुदगुदी लगती थी,
अब कहाँ !
मिट्टी के आँगन को,
गोबर से लीपकर,
जब पूजा की तैयारी चलती थी,
तो आस पड़ोस से आनेवालों से भी
अगर की खुशबू आती थी,
पूरा घर पवित्तर हो जाता था ...
कट्टमकुट्टी के खेल को,
हमने बड़ी संजीदगी से ले लिया,
छोटी छोटी खुशियों को,
व्यवहारिकता से काट दिया ।

15 सितंबर, 2018

हार-जीत सिर्फ एक दृष्टिकोण है




युद्ध कोई भी हो,उसका कोई परिणाम नहीं होता पार्थ, मान लेना है, वह जीत गया,वह हार गया । क्या तुम्हें अपनी जीत पर भरोसा था ? क्या तुम जीतकर भी जीत सके ? कर्ण की हार का दोषी दुनिया मुझे ठहराती है, फिर इस तरह मैं ही हारा !
दरअसल पार्थ, हार-जीत सिर्फ एक दृष्टिकोण है।  दुर्योधन को समय ने क्रूर और उदण्ड बना दिया था, इसलिए वह दंड का भागी बना, अन्यथा ग़ौर करो, तो वह भी  युद्ध में कुशल था, गांधारी उसे वज्र बनाकर अजेय बना ही देती, मृत्यु हिस्सा तो मेरे प्रयास से रह गया, ... क्योंकि, हार वह वहीं गया था, जब उसने द्रौपदी को अपनी जांघ पर बैठने को कहा, कर्ण की हार उसके मौन की वजह से तय हुई ।
हस्तिनापुर की उस सभा में, जब द्रौपदी का चीर खींचा गया, उस वक़्त हर देखनेवाले की  हार निश्चित हो गई थी ।
पार्थ, किसी भी हार-जीत में कई मासूम बेवजह हार जाते हैं, इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं होता कि वह कमज़ोर था ! देखो न, तुम्हारी जीत सुनिश्चित करने में मैं कई बार हारा । मेरी सबसे बड़ी हार थी, जब मैंने कर्ण के आगे प्रलोभन दिया , उसके दर्द में घी डाला ।
युद्ध नीति कहो या राजनीति, कभी सही नहीं होती । कुछ प्राप्त नहीं होता, कालांतर में रह जाती हैं आलोचनाएं और मेरे आगे प्रश्न ...
तुम ही कहो, मैं मथुरा नरेश हारा कि जीता ?

08 सितंबर, 2018

नई उड़ान




 कोई माने न माने..
परी थी मैं,
उड़ान ऐसी कि हर तरफ आग लग गई,
मेरे पंख जल गए,
लेकिन परी थी न,
 सो मन की उड़ान ज़िंदा रही ।
सपनों में पंख भी सही-सलामत रहे,
भीड़ में भी मेरी अदृश्य उड़ान  बनी रही ।
भागती ट्रेन से बाहर,मैं मेड़ों पर थिरकती,
खेत-खलिहानों में गुनगुनाती,
गाड़ी से बाहर भागती सड़कों पर ,
नृत्यांगना बन झूमती ।
पहली बार जब हवाई यात्रा की,
तो बादलों से कहा, आ गई न मिलने,
चलो, इक्कट,दुक्कट खेलें,
फिर सूरज के घर मुझे अपनी पालकी पर बिठाकर ले चलना,
चाँद की माँ के गले लगना है,
उनको चरखा चलाते देखना है,
ज़रा मैं भी तो जानूँ,
वो चाँद को क्या क्या सिखलाती हैं !
चाह में बड़ी ईमानदारी रही,
सपनों की बुनावट में जबरदस्त गर्माहट रही,
तभी,
 मुझे मेरे दोनों पंख बारी बारी मिल गए,
उन पंखों ने मुझे नई उड़ान दी,
आँखों पर सहेजकर रखे सपनों में रंग भरे,
मैं चाभी वाली गुड़िया की तरह थिरक उठी,
उम्र को भूलकर उड़ान भरने लगी,
मेरा परिवेश प्राकृतिक हो उठा
और मैं  .  .परी ।

02 सितंबर, 2018

प्रभु, मैं याचक हूँ, माँगती रहूँगी ...




बिना फूल,
अगरबत्ती,
चढ़ावे के,
मैं तुम्हें घर में ही
झाँक झाँक कर देखती रही,
टॉफी चाहिए हो,
कोई जादू देखना हो,
कह दिया तुमसे ...
कुछ लोगों ने कहा,
यह पूजा करने का ढंग है भला !
ढंग ?
कहा,
क्या लालची की तरह हर वक़्त माँगती हो,
दूसरे की लिखी पंक्तियों को हिकारत से सुनाया,
बिन माँगे मोती ..."
 प्रभु,
मैंने देखा उनको कीमती वस्त्र चढ़ाते,
...
कम उम्र थी मेरी
तब बड़े यत्न से मैंने भी कुछ कुछ लिया,
लेकिन बड़ा अटपटा लगा ।
तुम दोगे या मैं !!
तुम तो जानते ही हो
कि एक सुबह से सोने तक
मैं निरंतर तुमसे माँगती हूँ,
एक अलादीन का चिराग दे दो,
यह परिणाम सुंदर होना ही है,
लक्ष्मी स्वयं आ जायें मेरे पास,
बजरंगबली संजीवनी रख दें मेरी मुट्ठी में,
सारे भगवान मेरे सिरहाने रखे सपनों को पूरा कर दें  ...
कृष्ण एक बार माँ यशोदा की तरह मुझे ब्रह्माण्ड दिखा दें,
मेरे आशीष में. तुम्हारे आशीष सी अद्भुत ताकत हो।

प्रभु,
मैं याचक हूँ,
माँगती रहूँगी  ...
तुम दाता हो,
देते रहना।
तुमको दे सकूँ अपनी निष्ठा,
पुकारती रहूँ प्रतिपल,
यह सामर्थ्य देते रहना,
आते-जाते जब भी तुमको देखूँ,
झट से आशीष दे देना,
हर हाल में मेरे साथ रहना ... 

15 अगस्त, 2018

बड़े बड़े कारनामे झूठ होकर भी बहुत सच होते है बालमुकुंद




एक था बालमुकुंद
परियों की कहानी
सिंड्रेला के जादुई जूत्ते
आलू के कारनामे सुनकर
आखिर में अपनी दोनों बाहें
बेफिक्री से ऊपर उठाकर कहता
"सब झूठ है"
सुनकर हँसी आ जाती ....
झूठ से ही तो कल्पनायें निकलती हैं
सच की ईंट रखी जाती है
बच्चे इन्हीं कहानियों से
अपनी नई कहानी के रास्ते खोलते हैं
लेकिन बालमुकुंद तठस्थ था
झूठ है, फिर क्या मानना
क्या सोचना !
जज़्बा तैयार करना बहुत कठिन है
जब ना मानने के पुख्ता कारण हो !
क्योंकि हम जो लकीर खींचते हैं
वह आगे ही जाएगी
एक ही परिणाम होगा
यह तय नहीं है
तभी तो बचपन से
गाजर से
शकरकंद से
हम किला बनाते हैं
तोप की रचना करते हैं।
और दुश्मनों को मार गिराते हैं !
ये नन्हे नन्हे खेल
बड़े बड़े कारनामे
झूठ होकर भी
बहुत सच होते है बालमुकुंद
कुछ कर दिखाने का प्रतीक होते हैं  ...

14 अगस्त, 2018

अकेलापन ही सही, इस खुद्दारी में अपना अर्थ नज़र आया ।



प्रेम एक ही बार होता है
या कई बार,
किताबी या फिल्मी बातों से इतर,
मैंने,
हाँ मैंने,
एक बार नहीं,
दो तीन बार प्यार किया ...
क्यूँ का क्या जवाब ?
और क्यूँ ?
किसे देना है जवाब ?
कौन व्याख्या करने की,
तराज़ू पर तौलने की सामर्थ्य रखता है !
यह मेरा मन जानता है,
और यह मन की स्वीकृति है
कि मैंने प्यार किया ।
जब भी किया,
सामनेवाला उसका सही पात्र नहीं निकला,
कहा जा सकता है,
मैं सही पात्र नहीं निकली ।
उसे शरीर की तलाश थी,
मुझे मन की !
यकीनन,
स्पर्श प्रेम का माध्यम है,
पर,
जहाँ मन नहीं,
वहाँ शरीर छल है,
न दर्द ,न ख़ुशी
कुछ भी नहीं ।
...
फिर, मैंने मन की तलाश से ख़ुद को विमुख कर लिया,
मेरे एकाकी क्षणों में ,
मैंने एक बार नहीं,
कई बार ख़ुद की व्याख्या की,
और जाना,
मेरा प्रेम कभी भी स्वार्थी नहीं हुआ,
यदि स्वार्थ प्रबल होता,
तो मैं सिर्फ शरीर हो सकती थी,
लेकिन मुझे मन होना रास आया,
अकेलापन ही सही,
इस खुद्दारी में अपना अर्थ नज़र आया ।



08 अगस्त, 2018

अपने व्यक्तित्व को पहचानो, ... वही तुम्हारी कृति है ।




शब्दों की गहरी नदी में उतरकर,
कुशल तैराक बनी मैं,
सोच रही हूँ -
मैं एक कृति - अपने माँ पापा की,
वे भावातिरेक में आए होंगे,
तभी तो ऊँगली थमाकर मुझे कहा,
आगे बढ़ो ...
मैं बढ़ती गई,
अपने भीतर कुछ न कुछ गढ़ती गई,
स्तब्ध होती गई,
कितना कुछ छूटा,
कितना कुछ टूटा,
बेवजह कुछ जुड़ गया,
तार तार हुई मैं,
जार जार रोई,
कई संकल्प उठाये,
कई महत्वपूर्ण किनारे छोड़े,
मझदार को अपना विकल्प बनाया,
प्रश्नों के कटघरे में कहा एक दिन,
जवाब देना छोड़ो,
किसी जवाब से कुछ नहीं होगा ।
जो तुम्हारा है,
वह जवाबतलब करेगा नहीं,
और जो नहीं है,
वह किसी जवाब से संतुष्ट होगा नहीं ।
प्रश्नकर्ता की एक सनक होती है,
उसे मात देना होता है,
वह किसी भी स्तर पर उतरकर देगा ।
व्यर्थ की परेशानियों से खुद को मुक्त करो,
आँसुओं की नदी में निराधार बहने से बेहतर है,
अपने व्यक्तित्व को पहचानो,
... वही तुम्हारी कृति है ।
शैतान खुद को नहीं बदलता,
तो तुम किस परिवर्तन का संकल्प ले रहे ?
बाड़ का निर्माण करो,
बहुत ज़रूरी है खुद को सुरक्षित रखना,
न बुद्ध होने के ख्वाब देखो,
न यशोधरा बनने की चाह,
जो है,
उसे सम्भालकर रखो ...

11 जुलाई, 2018

बासी का स्वाद अनोखा होता है




बासी का स्वाद अनोखा होता है,
अगर वह बेस्वाद हो जाए,
मीठा से खट्टा हो जाए,
तो वक़्त देना खुद को
कि वजह क्या थी ।
रोटी हो,प्यार हो ,
बचपन हो,
या हो चिट्ठियाँ
बासी होकर
 भूख मिटा देती है,
आँखों से बहुत कुछ उमड़कर
हलक तक आ जाता है,
इच्छा होती है,
भीग जाएँ इस बारिश में ।
बच गई रोटी
सिर्फ बासी नहीं होती,
किसने बनाई,
कितने जतन से बनाई,
जतन से रखा,
ये सारी बातें आती हैं।
बासी रोटी,
यानी की ताजे भोजन के लिए वक़्त मत बर्बाद करो,
बासी रोटी,
रात से सुबह
सुबह से रात की यात्रा करके आती हैं,
बहुत कुछ उसमें नमक घी की तरह लगा होता है
बासी रोटी, बासी बचपन,बासी प्रेम
कृष्ण की बांसुरी सा होता है,
खींचता है अपनी तरफ  ...

09 जुलाई, 2018

दिनचर्या


उठती हूँ ,
बिखरे बालों को समेट लेती हूँ
दिनचर्या तिरछी नज़रों से देखती है,
लम्बी साँसें भरकर,
शरीर को जगाती हूँ,
मन को झकझोरती हूँ
"अरे उठो न"
झाड़-पोछ,
कुछ बनाना,
गीत गाना,
कुछ कहना-सुनना,
...
कई बार
बस यंत्रवत
सुनती हूँ, कहती हूँ,
 पढ़ती हूँ, लिखती हूँ,
पर, कुछ याद नहीं रहता ...
एक ही धुरी पर घूमती हूँ,
बातों को दुहराती हूँ ।
समय को हटाओ,
तारीखें भी देखकर याद आती हैं !
तारीख कोई भी हो,
एक सवाल उठता है
"आज कुछ है क्या"
ओह, कुछ नहीं है,
सोचकर पेट और दिमाग के गुब्बारे
फूटकर शांत हो जाते हैं ।
बेवजह का खौफ़
कुछ भी खाओ,
न स्वाद लगता है,
न पेट भरता है ।
बहुत सवेरे,
या नौ बजे के बाद रात में
मोबाइल के बजते
आंखें मिटमिटाने लगती हैं,
किसी बुरी खबर कीआशंका ...
किसी दुख में,
किसी के ना रहने पर,
आसपास कोई फुरसत वाला कंधा भी नहीं,
जिस पर सर रखकर रो लें,
...इंतज़ार रहता है,
फ़ोन आएगा,
टिकट कटाकर,
स्टेशन,एयरपोर्ट की दूरी तय करके,
बेचैनी को जब्त करके ,
कोई अपना पहुँचेगा ...
तब तक मन
सत्य-असत्य के बाणों से बिंध चुका होता है ।
"आपका समय शुरू होता है अब" से रोना,
संभव नहीं ।
अब क्या हम साधारण लोग भी रुदाली ढूंढेंगे ?
अजीब सी तरक्की है यह,
अजीब सी समानता !
आत्मीयता के आँसू सूख गए हैं,
क्या यह गंगा का शाप है ?
उन बुज़ुर्गों का शाप है,
जिनके फोन की घण्टी भी नहीं बजी,
या शाप है उन देवताओं का,
जिनके आगे कीमती वस्त्र,
भोग रखकर,
आडम्बरयुक्त नृत्य करके,
हम सर्वोच्च भक्त बन गए !
... कुछ तो हुआ है,
क्योंकि कोई एक नहीं,
सबकेसब अकेले हो गए हैं
...
तस्वीरों पर मत जाना,
वह तो एक और सबसे बड़ा झूठ है !!!

एक कविता हूँ - अतुकांत !

मैं कोई कहानी नहीं, एक कविता हूँ - अतुकांत ! पढ़ सकते हो इसे सिलसिले से यदि तुमने कुछ काटने के दौरान काट ली हो अपनी ऊँगली, और उसका...