08 मार्च, 2021

महिला दिवस


 


इतिहास गवाह है,
विरोध हुआ 
बाल विवाह प्रथा का 
सती प्रथा का 
दहेज प्रथा का
कन्या भ्रूण हत्या का
लड़कियों को बेचने का
उनके साथ हो रहे अत्याचार का ...
पुनर्विवाह के रास्ते बने
लड़का-लड़की एक समान का नारा गूंजा
सम्मान के नाम पर 
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस निर्धारित हुआ
लेकिन,
कुछ अपवादों को छोड़कर
हर क्षेत्र में उठ खड़ी होने पर भी
महिलाओं के प्रति
न सोच बदली
न स्थिति
शिक्षित होने पर भी
नसीहतों की ज्वाला में
उसे जलना पड़ता है ।
स्वेच्छा से विवाह - 
तो स्वच्छन्द !
आत्मनिर्भरता के परिणामस्वरूप
परिवार के लिए देर से लौटी
तो कलंकिनी !
व विवाह नहीं किया
तो लानत,
विवाह नहीं टिका
तो मलामत ।
पति अत्याचारी
तो भी उलाहना
अकेली किसी के साथ हँस बोल लिया
तो मिथ्यानुमानों के संदेह  !
बच्चों के लिए
सम्पूर्णतः उसकी जिम्मेदारी 
एक कप सुबह की चाय पति ने दे दी
तो कटाक्ष करने से 
अधिकांश लोग पीछे नहीं हटते !
'दिवस' मनाना
और हृदय से सम्मान देना
दो अलग स्थितियाँ हैं !
नवरात्रि हो
या महिला दिवस
स्थिति जो कल थी
वही लगभग आज भी है
और कल भी होगी ।

03 मार्च, 2021

चाहा तो ऐसा ही था !


 














"पुष्प की अभिलाषा" से मेरा क्या वास्ता था अपनी तो बस एक चाह थी छोटी सी पर बहुत बड़ी ... कि मैं बनूं, अल्हड, अगराती पुरवा का बेफिकर, बेखौफ, बिंदास झोंका दरवाज़ा चाहे जिसका भी हो, उसकी सांकल खटखटा दूं और दरवाज़े के खुलते ही जब तक कोई संभले, शैतान बच्चे की तरह - करीने से रखी सारी चीज़ें बिखेर दूं, मेरी धमाचौकड़ी से जो मचे अफरातफरी...सामान सहेजने की तो मैं शोखी का जामा पहनकर ज़ोर से खिलखिलाऊं ! बन जाऊं --- केदार की बसंती बंजारन जायसी की कलम से निकला वो भ्रमर, वो काग कालिदास का मेघ प्रियतम का संदेश सुनाता, गाता मेघराग पहाड़ों के कौमार्य में पली वादियों के यौवन में ढली शिवानी की अनिंद्य सुंदरी नायिका ! ......... बारिश ठहरने के बाद आहिस्ता आहिस्ता टपकती बूंदों की नशीली आवाज़ की तरह, मिल जाए कोई इश्क - सा ! पकड़ ले मेरा हाथ और कहे, ' थम भी जा बावरी ! थक जाएगी, आ, थोड़ा बैठ जा चल मेरे संग एक प्याली चाय आधी- आधी पी लें ... पर ज़रा रुक, मैं बंद कर लूं खिड़कियां वरना निकल जाएगी तू ! ...... बता तो सही, नदी, नालों, पहाड़ों को पार करते सुदीर्घ यात्रा तय कर हंसिनी सी, मानसरोवर के तीर जा पहुंचती है ..... क्या तलाश रही है ? खुद को ? मिल जाएगी क्या ऐसे ? खुद से ? अकेली ही ? ' और मैं ! पुरवा का परिधान उतार कर उस माहिया, उस रांझणा के पन्नों पर स्याही सी बिखर जाऊं ..... मेरे अंदर की पुरवाई ने चाहा तो ऐसा ही था !

01 मार्च, 2021

अटकन चटकन


 

विरासत में पिता से मिली कलम, वंदना अवस्थी ने उसे सम्मान से संजोया ही नहीं, ज़िन्दगी के कई सकरी गलियों में घुमाया, कहीं रुदन भरा,कहीं हास्य,कहीं घुटन,कहीं विरोध और अपनी खास दिनचर्या में इसकी खासियत को बड़े जतन से शामिल किया । "बातों वाली गली" से गुजरकर, आज अटकन चटकन की गलियां हैं, जिसमें सिर्फ सुमित्रा,कुंती ही नहीं, किशोर,छोटू,रमा,जानकी,छाया, ... जैसे विशेष पात्र भी हैं, और लेखिका ने किसी को अपनी कलम से अछूता नहीं रखा है ।

अछूता तो लेखिका ने कुंती के दूसरे पक्ष को भी नहीं रहने दिया, वरना अक्सर लोग सिर्फ बुराइयों में लगे रहते हैं । हाँ तो कुंती सुमित्रा के बच्चों को बहुत प्यार करती थी और स्वयं सुमित्रा की जो इज़्ज़त उतार दे, पर मज़ाल थी किसी की जो उसके आगे सुमित्रा के बारे में कटु शब्द बोलकर निकल जाए । 

ख़ैर, उम्र की सांझ के करीब आते आते जीवन की गहरी सच्चाइयां कुंती के आगे अकेलापन बनकर आई । सबसे इतना बुरा व्यवहार किया कि सब उससे दूर हो गए, जुड़ाव दिखाया भी तो मतलब से ! एक बच्चा भी उसके निकट खेलने से कतराता था । और ऐसे सन्नाटे में, समय से लगे तमाचे की आवाज़ में कुंती को अपना हर गलत किया दिखने लगा । परिचित तो वह पहले भी थी, पर तब उम्र की धौंस थी । उसने सुमित्रा के साथ जो किया, उसके पछतावे में वह सुमित्रा के पास ही गई, क्षमा नहीं मांगा, पर अपना दिल उसके आगे ही उड़ेलकर रखा । 
सुमित्रा ने ही मन लगाने का रास्ता दिखाया ... शिक्षा तो उनके घर की नींव थी, सो बच्चों को शिक्षा देना और इसीसे ज़िन्दगी को खूबसूरत बनाने का सिलसिला शुरू हुआ और जीवन की समाप्ति से पूर्व कुंती ने प्रायश्चित भी कर लिया, "सुमित्रा शिक्षा निकेतन" खोलकर ।


.....समाप्त ।

26 फ़रवरी, 2021

अटकन चटकन


सब दिन न होत न एक समान"... कुंती के कर्मों से शर्मिंदा होकर समय ने बहुत कुछ बदल दिया और इसी बदलाव ने कुंती को बहुत कुछ सोचने पर बाध्य किया । 

केंद्र में सुमित्रा को रखकर कुंती ने न सिर्फ अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ा, बल्कि बदजुबान होती गई । बच्चों के साथ भी वह जीतने की कोशिश में लगी रही, जीत भी मिली, पर जब मात होने का मंजर शुरू हुआ तब कुंती अकेली पड़ गई । बड़ी बहु जानकी का आना, उसके द्वारा ग़लत का विरोध करना, समस्याओं से जूझने के लिए पीपल वाले बाबा को ढाल बना लेना एक बहुत स्वाभाविक घटना है । खुद लेखिका ने भी माना है कि ऐसा होता है, होने के पीछे की मनःस्थिति गौर करने की है । सुमित्रा के आगे जानकी स्वीकार भी करती है, और सुमित्रा मानती है कि कुंती के साथ यह सही उपाय है । 
क्योंकि यह एक सच्ची कहानी है तो यह तो सिद्ध होता है कि खुद लेखिका ने इसे रूबरू देखा या सुना है (मेरी समझ से) । और देखने-सुनने में हमसब एक अनुमान, आगे पीछे की शत प्रतिशत सच्ची,झूठी विवेचना से गुजरते ही हैं - सबसे अहम होता है, प्रत्यक्ष में घटित घटनाएं और उसका दिलोदिमाग पर प्रभाव । यह प्रभाव का ही असर है कि लेखिका ने उस मीठे बुंदेली भाषा को भी उकेरा है, जो सुमित्रा-कुंती-रमा-जानकी वगैरह  के मध्य हुआ, जो सहजता से पाठकों को छूता है, एक रोचकता का एहसास देता है । 

क्रमशः
 

 

24 फ़रवरी, 2021

अटकन चटकन


 


कुंती सुमित्रा की बहन रह ही नहीं सकी । उसके जीवन का एक ही उद्देश्य रह गया था, सुमित्रा का अपमान, उसको सबके आगे ग़लत साबित करना । सुमित्रा की अच्छाइयों की अति ने सुमित्रा को हर बार रुलाया,उसे रुलाने का माध्यम बनी कुंती, क्योंकि सुमित्रा की ऐसी स्थिति से उसे असीम सुख मिलता था । 
कहते हैं,एकांत का एक लम्हा भी आईना बनता है, मन मंथन से गुजरता है, स्व आकलन करता है ... ऐसी कहावत से कुंती का कोई सम्बन्ध नहीं था, पर अगर गम्भीरता से इस पर विचार किया जाए तो उसकी स्वभाव की उग्रता में घी का काम किया सुमित्रा की सहनशीलता ने । 
दिनकर की पंक्तियां मनमस्तिष्क में गूंजती हैं,

"क्षमा शोभती उस भुजंग को,जिसके पास गरल हो,
उसको क्या जो दंतहीन,विषहीन,विनीत,सरल हो"

शायद, (दावे से तो कुछ नहीं कह सकते) सुमित्रा ने उसका सच समय रहते उसके सामने कहा होता तो कुंती के मन में ग्लानि भले न होती, पर एक भय होता कि सुमित्रा चुप नहीं रहेगी । घर के बाकी सदस्य भी समझते थे, लेकिन पीछे में बोलकर या स्वभाव का पहलू स्वीकार करके कुंती को ज़िद्दी और असभ्य बना दिया । 
क्या कारण सिर्फ़ कुंती थी ?! ... ख़ैर, जो भी हो - अब तो धधकती अग्नि सबकुछ स्वाहा करने का दुःसाहस कर ही रही थी, जिसे अपनी जेठानी बनाकर सुमित्रा ने ख़ुद अपने घर को तबाह कर लिया ।


क्रमशः


19 फ़रवरी, 2021

अटकन चटकन


 



पहली बार जब यह नाम "अटकन चटकन" मेरी आंखों से गुजरा, लगा कोई नाज़ुक सी लड़की अपने दोस्तों के साथ चकवा चकइया खेल रही होगी ... सोचा,बचपन की खास सन्दूक सी होगी कहानी । शब्दों को, गज़लों को,किसी वृतांत को ज़िन्दगी देनेवाली वन्दना अवस्थी दूबे ने कोई जादू ही किया होगा, इसके लिए निश्चिंत थी । फिर भी आनन-फानन मंगवाने का विचार नहीं आया । 

फिर आने लगे प्रतिष्ठित लोगों के विचार और उन विचारों ने कौतूहल पैदा किया, इस कहानी की मुख्य पात्रों से मिलने की उत्कंठा ने बेटी से कहा, "जरा ऑर्डर दे दो तो" ... ।
और, किताब मुझ तक आ गई, आवरण चित्र ने कहा - शनैः शनैः पढ़ना तभी समझ सकोगी दो विपरीत स्वभाव की बहनों को, जो दो छोर पर नज़र आती क्षितिज बनी रहीं ।
शुरुआत के पन्नों को एक नहीं कई बार पढ़ा ... बचपन से जो हुआ उस पर गौर किया । क्या कुंती ईर्ष्यालु थी ? या लोगों के द्वारा किये गए फ़र्क ने उसे उच्श्रृंखल बनाया ! सुमित्रा का स्वभाव भी लोगों की देन रहा । उसका खुद में सिमट जाना, परिस्थिति से अनजान होने का उपक्रम करती कुंती को स्नेह देने का उसके मन का वह दर्द था, जो कुंती की उदासी को बर्दाश्त नहीं कर पाता था । लोगों द्वारा तुलना किये जाने का भय, यदि कुंती को आक्रोशित करता था तो सुमित्रा को सोने नहीं देता था । 
कुंती के स्वभाव की चर्चा आसान है, परन्तु लोगों के गलत व्यवहार ने उसे बचपन से चिढ़ने का कारण दिया, बड़ी बहन के विरुद्ध खड़ा किया - इसे हंसकर टाला नहीं जा सकता । एक चेहरे के प्रति यह रवैया कितना खतरनाक होता है, इस कहानी के माध्यम से समझा जा सकता है, समझने की ज़रूरत है ।
रंग रूप में भेद करते हुए घर के,आसपास के लोगों ने कुंती के मन को खतरनाक बना दिया, उसका उद्देश्य ही रहा - सुमित्रा का अपमान ! जबकि सुमित्रा की सारी सोच कुंती के प्रति थी, कुंती की पसंद,कुंती का सुख ... लेकिन कुंती का मन मंथरा हो चुका था, यूँ कहें कैकेई !


क्रमशः


17 फ़रवरी, 2021

अटकन चटकन और लेखिका वंदना अवस्थी









 




कहानी या कविता या और किसी विधा में लिखित दस्तावेज़, हैं क्या ? सब सामान हैं, पड़ाव हैं, हमसफ़र हैं - कलम की यात्रा में और इस यात्रा में राहगीरों की कमी नहीं है, हज़ारों आए, आते हैं और अपने शब्दों में अपनी नजर छोड़ जाते हैं... जहां से पाठक उसे उठाते हैं, उसमें झांकते हैं...फिर उनका मन हर राहगीर के साथ सहयात्री बन चलने लगता है, उसकी नजर और नज़रिये को पूरी शिद्दत से पढ़ने और समझने लगता है। इसी समझ की चाक पर राहगीर यानी रचनाकार की पहचान गढ़ी जाती है, उसकी छवि बनने लगती है, उसके ख्यालों की बारीकियां बिंब से प्रतिबिंब बनती हैं और उसकी कलम की बेल परवान चढ़कर आबोहवा को जीवन का दान देती है।

अटकन-चटकन की कथाकार वंदना अवस्थी की जीवनदायिनी कलम के सौजन्य से चटकी रचना है अटकन-चटकन, जिसको मैं एकबारगी नहीं पढ़ सकी क्योंकि मुमकिन  नहीं था। इसके हर पात्र के सम्मोहन से बंध जाती थी मैं और उस मोहपाश को काटकर  आगे बढ़ना मुश्किल होता था क्योंकि हरेक मुझे अलग - अलग सोच की गहरी नदी में गोते लगाने के लिए छोड़ देता था।

कथाकार कुछ नहीं होता जब तक कथा की गलियों से पढ़ने वाले नहीं गुजरते, पर गुजरने के बाद कथा दूसरे सोपान पर जाती है और प्रथम सोपान पर कथाकार का राज्य बनता है। अपनी साकेत नगरी की बड़ी कुशल और गंभीर महिषी हैं वंदना अवस्थी जी जिनकी कलम ने कथा के हर दृश्य को यों जीवंत कर दिया है कि घटना और घटनास्थल भी सांस लेते महसूस होते हैं। जीवन के मंच पर जहां हर पल कलाकार आते हैं और अगले पल ही बदल जाते हैं, दिल दुआ मांगता है कि यहीं कहीं, आस पास, किसी ऐसे कलमजीवी से मुलाकात हो जाए जो ज़िन्दगी के हाथ आए उस पल की बेहतरीन सौगात बन जाए ... 

बेशक वंदना अवस्थी से मिलना कुछ ऐसा ही एहसास है।










04 सितंबर, 2020

#कुछचेहरे


#कुछचेहरे

कई चेहरे बहुत मुखर होते हैं, उनकी आंखें बोलती हैं, होठों पर टिकी,आंखों के कोने से टपकती मुस्कान बोलती है _ इतना कि तोहमतें दामन पकड़ लेती हैं,अफ़वाहों के बाज़ार में कुछ असली,कुछ नकली चीजें बिक जाती हैं और प्यार हो जाता है ।
उम्र की उड़ान और माशाअल्लाह सर से पांव तक नन्हीं सी चिड़िया जैसे अंदाज, आंखों से उतरती आग, बेबाक खिलखिलाहट में कालिदास की कलम का मेघदूत ... बात कितनी भी मुश्किल हो, बन ही जाती है ।











02 सितंबर, 2020

#कुछचेहरे




#कुछचेहरे



अभिनय की दुनिया हो,या लेखन की दुनिया _ कुछ चेहरे किताब के पन्ने लगे, जिनको देखते हुए उनको पढ़ने सा एहसास हुआ । गौरैया सी मासूमियत, हिरणी सी चंचलता, राहुल की माँ यशोधरा सी तटस्थता, हवाओं की तरह मंज़िल को पाने का प्रयास, घर का पूजा घर, धुला हुआ आँगन, धधकता चूल्हा, आग की तेज लपटें, चाभी का गुच्छा, दरवाज़े की सांकल, बेचैनी में भी एक सुकून भरी गुनगुनाहट ...। परिचय इनका अपनी जगह है, इनकी पहचान है - मेरी दृष्टि का एक हस्ताक्षर ये तस्वीरें, जिनको देखते, संजोते,प्रस्तुत करते हुए एक वक्त,जिसे हम गुजरा हुआ कहते हैं, मेरे साथ गोलंबर पर बैठ जाता है, या किसी अमरूद के पेड़ के नीचे या किसी मिट्टी के दालान में ...










 

27 अगस्त, 2020

राधा


 



मैं राधा
माता कीर्ति
पिता वृषभानु की बेटी !
कृष्ण की आदिशक्ति
नंदगाँव और बरसाने की प्रेमरेखा !

मैं कृष्ण की आराधिका थी
या उनकी बाँसुरी
यमुना का किनारा
या कदम्ब की डाली
गोकुल की पूरी धरती
या माखन
उनके मुख में चमकता ब्रह्माण्ड
या उनको बाँधी गई रस्सी
या !!! ...
जो भी मान लो
मैं थी - तो कृष्ण थे
कृष्ण थे - तो मैं !
०००
जिस दिन कृष्ण ने जन्म लिया
उस दिन मैं अमावस्या थी
कारागृह के द्वार मैंने ही खोले थे
टोकरी की एक एक बुनावट में मैं थी
मूसलाधार बारिश की बूंदों में मैं थी
यमुना की उठती हिलोरों में मैं थी
पाँव छूकर मैंने ही अपने होने का हस्ताक्षर किया था ...
बरसाने में जन्म लेकर मैं
गोकुल की प्रतीक्षित देहरी बन गई !
माँ यशोदा के आँगन में कृष्ण के जो नन्हें पाँव मचले थे
उसके मासूम निशानों में मैं तिरोहित हो गई ....
रास की इस पहेली को समझ सका है कोई !?
०००
सिर्फ ज्ञान ... मात्र एक भ्रम है
जो मान लेता है खुद को सर्वस्व !
इसीलिए कृष्ण ने उद्धव को अपने ज्ञान का प्रतिरूप बनाकर
अहम से परे
मोह में स्वयं को उलझाकर
हर रिश्ते के मध्य प्रेम क्या है
यह समझने के लिए भेजा
क्योंकि, गीता सुनाने के लिए
उसे समझने के लिए
पहले प्रेम और रिश्तों को जीना होता है
पाने से कहीं अधिक खोना पड़ता है !!
गोपिकाओं के निकट
उद्धव के शरीर में
दरअसल कृष्ण ने स्वयं को प्रस्तुत किया
जहाँ प्रत्येक गोपिका में मैं समाहित थी
कृष्ण ज्ञान बनकर प्रज्ज्वलित थे
मैं प्रेम की मूक आँखों से बरस रही थी
तभी तो गोकुल में कृष्ण का एक रूप ठिठक गया
रास के इस रहस्य को समझ सका है कोई !?
०००
मिट्टी का स्वर्णिम शरीर थे वासुदेव,
देवकी
नंदबाबा,
यशोदा
रुक्मिणी,
सत्यभामा
बलराम,
सुदामा,
रसखान,
सूरदास
मीरा ....
मैं थी मिट्टी
जिसमें अपनी आँखों का पानी मिलाकर
कृष्ण ने मुझे बनाया - राधा !!!
साधारण स्तर पर
हर किसी ने सोचा कृष्ण ने मुझे छोड़ दिया ...
यदि यही बाह्य सत्य था
तो देवकी और मथुरा के लिए
वासुदेव ने
कृष्ण को तूफानों के मध्य जो गोकुल पहुँचाया वह क्या था ?
माँ यशोदा
पूरे गोकुल को छोड़कर
अधर्म के नाश के लिए
कृष्ण जो मथुरा पहुँचे
वह क्या उनका स्वार्थ था ?
यदि साधारण
या असाधारण रूप से ऐसा नहीं होता तब ???
तब क्या होता ?
क्या होना चाहिए था ? 
रास के इस त्याग को समझ सका है कोई !?
०००
कुरुक्षेत्र के मैदान में
जिस विद्युत गति से रथ को दौड़ाया कृष्ण ने
उसकी रास मैं थी
कृष्ण के अकेलेपन की सम्पूर्ण वेदना मैं थी
उनके विराट स्वरुप का चमत्कृत रूप मैं थी
उनके और द्रौपदी के मध्य चीर मैं थी
अनहोनी अपनी जगह थी
उसकी सकारात्मक होनी मैं थी
इस अद्भुत रास को समझ सका है कोई !?
०००
मैं बड़ी भी हूँ
छोटी भी हूँ
ज्ञानी भी हूँ
अज्ञानी भी मैं हूँ
शरीर कृष्ण का
और आत्मा हूँ राधा की
कृष्ण हैं मेरे रोम रोम में
तो कृष्ण में लय राधा भी है
तुम सबको किस बात का विस्मय है ?!
तुम नहीं हो सकते कृष्ण
कभी नहीं मिल सकती कोई राधा
जिस रास का अर्थ तुम समझ ना सके
वहाँ कैसा रिश्ता
कौन सा त्याग
और कैसी बाधा !
सोचो खुद में
और कहो जरा
इस रास को समझ सका है कोई !?
०००
हमारा एकांत
हमारा अध्यात्म था
हमारा रास
जीवन का सार था
अतिरिक्त कल्पना तो मानव मन की उत्पत्ति है !
विवाह में सिर्फ सात वचन नहीं होते
जीवन के समस्त मंत्र इसकी समिधा होते हैं
जहाँ सिर्फ दो व्यक्ति नहीं मिलते
पूरा संसार एक होता है
राधेकृष्ण संसार की एकता का प्रतीक हैं ...
वसुधैवकुटुंबकम "रास" है
गहरे उतरो 
ज्ञान और प्रेम के 
अथाह सिंधु में  
युगों से सीप में 
प्रतीक्षारत पड़ा है
प्रीत की कोख से जन्मा वह मोती
उसे निकालो
और पा लो अर्थ 
राधेकृष्ण का 
हरे कृष्णा, हरे रामा का।

11 अगस्त, 2020

क्या खोया,क्या पाया !

 


(लिखती तो मैं ही गई हूँ, पर लिखवाया सम्भवतः श्री कृष्ण ने है )


भूख लगी थी,

मगर रोऊं ...

उससे पहले बाबा ने टोकरी उठा ली !

घनघोर अंधेरा,

मूसलाधार बारिश,

तूफान,

और उफनती यमुना ...

मैं शिशु से नारायण बन गया

घूंट घूंट पीता गया बारिश की बूंदों को,

और कृष्णावतार का दूसरा चमत्कार हुआ

अपनी तरंगों से बादलों को छूती यमुना

सहसा शांत हो गईं

मुझे देखा,

श्यामा हुई,

गोकुल को जाने की राह बन गई

मैं जा लगा

मइया यशोदा के उर से,

मेरी भूख क्या मिटी

मैं गोपाल, कन्हैया, कान्हा ...

जाने कितने नामों से सज गया

उत्सव का नाद मेरे कानों में गूंजा

झूल रहे थे वंदनवार,

नंद बाबा के द्वार

मां की गोद क्या मिली

मुझे मेरा खोया वह ब्रह्मांड मिल गया

जिसे छोड़ आया था मैं

या यों कहूं

जो मुझसे छूट गया था

मथुरा के कारागृह में ...

गोकुल में मिला तभी,

हां, हां तभी

मैं सुरक्षित रहा

पूतना के आगे

कर सका कालिया मर्दन

उठा सका गोवर्धन ......

तो ईश्वर कौन था ?

मैं ?

या सात नवजात बच्चों की हत्या देखकर भी

मुझे जन्म देनेवाली मां ?

संतान को जीवित रखने का साहस जुटाकर

मुझे गोकुल ले जानेवाले पिता वासुदेव ?

पुत्री का दान देकर मुझे स्वीकार करनेवाले

नंद बाबा ?

या अपने पयपान से

मेरी बुभुक्षा को तृप्त कर

मुझे संजीवित करनेवाली

मां यशोदा ?

यह कौन तय करेगा

क्योंकि मैं स्वयं अनभिज्ञ हूँ ...

इस गहन ज्ञानागार में मैंने जाना ...

तुम क्या लेकर आए जिसे खो दोगे ?

तुम्हारा जब कुछ था ही नहीं

तो किसके न होने के दुख से रोते हो ?

मिट्टी से भरे मेरे मुख में

मां ने ब्रह्मांड देखा था

या कर्तव्यों का ऋण चुकाते हुए,

तिल तिलकर मेरे मरने का सत्य ...

किसी ग्रंथकार या लेखाकार को नहीं मालूम

यह सारा कुछ तो

मेरे और मेरी जीवनदायिनी के मध्य घटित

हर छोटे - बड़े संदर्भों की कथा है

जिसे वह जानती है

या फिर मुझे पता है.....

मेरे मथुरा प्रस्थान पर

विस्मृति का स्वांग ओढ़ना

उसकी वैसी ही विवशता थी

जैसे गोकुल का चोर,

ब्रज का किशोर

और फिर,

द्वारकाधीश बनना मेरी विवशता रही ...

मैं !

जिसे सबने अवतार माना,

अबतक नहीं जान पाया

कि मैंने क्या खोया, क्या पाया !

पर एक सत्य है

जो मुझे प्रिय है ...

गोकुल, यमुना, वृंदावन की तरह

मां की फटकार और

मुंह से लगे चुगलखोर माखन की तरह

पीताम्बर, मोरपंख और गोधन की तरह

बरसाने, राधा, बंसी और मधुबन की तरह

जिसके दर्शन

हर बरस होते हैं मुझे

भाद्रपद, कृष्ण पक्ष, रोहिणी नक्षत्र में पड़ी

अष्टमी तिथि की अर्धरात्रि को

चहुंओर बिखरे

अपने जन्मोत्सव के उल्लास में,

ममता से भरी खीर में,

प्रेम की दहीहांडी में,

गलियों के बीच मचे हुड़दंग में...

उस रात के हर प्रहर में

मैं याद रखकर भी भूल जाता हूं

कि सदियों पूर्व क्या हुआ था

इस रात को ...

और सुनता हूं

मुग्ध होकर,

तुम्हारे घर में गूंजते

अपने लिए गाए जा रहे

क्षीरसागर में डूबे

सोहर के मीठे, सरल शब्दों को

और अपने जन्म की खुशी को जीता हूं।

और अपने जन्म की खुशी को जी भर के पीता हूं,

जी भर के जीता हूं

 ...कि यह रात!फिर आएगी 

मगरपूरे एक बरस के बाद।

महिला दिवस

  इतिहास गवाह है, विरोध हुआ  बाल विवाह प्रथा का  सती प्रथा का  दहेज प्रथा का कन्या भ्रूण हत्या का लड़कियों को बेचने का उनके साथ हो रहे अत्याच...