18 जून, 2018

ज़िन्दगी जीने के लिए खुद को खर्चना होता है !




पैसे से
तुम घर खरीद सकते हो
महंगी चीजें खरीद सकते हो,
लेकिन यदि तुम खुद को खर्च नहीं कर सकते,
तो घर को घर का रूप नहीं दे सकते !
पैसे से
तुम महंगे, अनगिनत
कपड़े खरीद सकते हो,
प्रसाधनों की भरमार लगा सकते हो,
लेकिन यदि तुम खुद को खर्च नहीं कर सकते,
तो उन्हें सम्भालकर नहीं रख सकते,
कमरा, आलमीरा कबाड़ बन जाएगा !
पैसे से
बच्चे के लिए तुम आया रख सकते हो
उसे महंगे खिलौने दे सकते हो
लेकिन यदि तुम खुद को खर्च नहीं कर सकते,
तो बच्चे के जीवन मे माँ और पिता की
सार्थक परिभाषा नहीं होगी,
एक खालीपन उसके अव्यक्त पलों में होगा ।
कम पैसे में
यदि तुम स्वयं को खर्च करते हो,
तो बासी रोटी ताजी रोटी से अधिक स्वादिष्ट होती है,
नमक-रोटी के आगे पकवान फीके हो जाते हैं ।
घर के हर कोने से जब तुम्हारी खुशबू उठती है,
बच्चा खुद को विशेष नहीं
स्वाभाविक प्राकृतिक महसूस करता है !
पैसा ज़रूरी है,
लेकिन ज़िन्दगी को जीने के लिए
खुद को खर्चना होता है !

15 जून, 2018

खुद तय करो, तुम क्या हो ।




मान लिया,
सामने रावण और शूर्पणखा हैं
तो उनके विनाश के लिए तुम्हें
रावण और शूर्पणखा नहीं बनना है
राम और लक्ष्मण बनना है ।
अपशब्दों से तुम सामनेवाले को नहीं,
स्वयं को खत्म कर रहे हो,
शब्दों के स्तर
तुम्हारे स्तर की गवाही देते हैं ।
युद्ध ज़रूरी है,
साम,दाम,दंड,भेद भी
लेकिन अश्लील शब्द
!!!
अगर श्री कृष्ण ने भी यही अपनाया होता
तो आज गीता का आध्यात्मिक,
सांसारिक आधार न होता ,
सत्य की कटुताएँ हैं गीता में
"तुम्हारा क्या गया जो तुम रोते हो",
परंतु, कहीं भी ऐसे शब्द नहीं,
जिनको पढ़ने के बाद
वितृष्णा हो,
एक लिजलिजेपन का जन्म हो भीतर।
जो कर्तव्यहीन है,
वही अपशब्दों पर उतरता है
अश्लीलता की सारी सीमाएँ लांघ जाता है !
ऐसे में,
तुम खुद तय करो,
तुम क्या हो ।

22 मई, 2018

एक हस्ताक्षर की तरह !!




एक कमज़ोर लड़की
जो किसी के दर्द को
डूबकर समझती है
डूबकर भी बाहर भागती हो
बनाती हो खुद को मजबूत
तब तुम रो क्यूँ नहीं लेते इस बात पर
कि हालातों ने उसे कितना मजबूर किया !

अपने आँसुओं की खलबली से वह टकरा जाती है
रोकती है खुद को बहने से...
टहनी सी वह लड़की, जो बरगद हो जाना चाहती थी
हुई भी थी, फिर कट गई थी  ....
उस बरगद को कटते देखकर
तुम्हें रोना नहीं आया ?

ज़मीन पर पड़ी उसकी डालियों से उम्मीद रखते हो
कि जब हवा चले
तो पत्तियों में हलचल हो
और तुम्हें राहत मिले !

मुझे उस पर
गुस्सा भी आता है,
और प्यार भी
कि वक़्त ने उसे बहुत बदलना चाहा,
लेकिन वह,
बदलकर भी वही है
एक हस्ताक्षर की तरह !!
       

19 मई, 2018

नख से शिख तक ज़िंदा रहूँगी




मैंने कब कहा ?
कि,
खुद के हिस्से
थोड़ी स्वतंत्रता माँगते हुए
मैं अपने सपनों को ऊँचे छींके पर रख दूँगी ?
भूल जाऊँगी गुनगुनाना,
चूड़ी पहनना,
पायल को ललचाई आँखों से देखना।
चुनरी मुझे आज भी खींचती है अपनी ओर,
पुरवईया - जब मेरे बालों से ठिठोली करती है
तो सोलहवें साल के ख्याल
पूरे शरीर में दौड़ जाते हैं !
स्वतंत्रता माँगी है,
राँझा बन जाने की बात नहीं की है।
मैं हीर थी,
हूँ
और रहूँगी !
मुझे भी जीने का हक़ है,
कुछ कहने का हक़ है
....
सूरज को अपने भाल पर
बिंदी की तरह सजाकर
मैं श्रृंगार रस की चर्चा आज भी करुँगी
स्वतंत्रता माँगी है,
पतझड़ नहीं।
बसंत के गीत,
जो तुम मेरे होठों से छीन लेना चाहते हो,
वह मैं होने नहीं दूँगी !
6 मीटर की साड़ी पहनकर,
मैं वीर रस की गाथा लिख चुकी हूँ,
तो आज भी यही होगा,
भोर और गोधूलि की लालिमा लिए
मैं धरती का चप्पा चप्पा नापूँगी,
सारे व्रत-त्यौहार जियूँगी,
अपने भाई के हाथों अपनी रक्षा का अधिकार बांधूंगी,
पूरी माँग भरकर,
अनुगामिनी बनूँगी  ...
साथ ही,
भाई की रक्षा का वचन भी लूँगी,
पति राह से भटका
तो, निःसंकोच -
उसके सारे रास्ते बंद कर दूँगी
स्त्री हूँ
स्त्रीत्व को सम्मान से जीऊंगी,
माँ के अस्तित्व को,
उसके आँचल से गिरने नहीं दूँगी,
मैं नख से शिख तक खुद को संवारूँगी
रोम रोम से ज़िंदा रहूँगी ,
स्वतंत्रता के सही मायने बताऊँगी  ...

06 मई, 2018

"जाने कहाँ गए वो दिन" !




छोटे थे तो
अपने गाँव
अपने शहर से बाहर
सब अद्भुत था
और अपनी पहुँच से कोसों कोसों दूर !
मुजफ्फरपुर,पटना,राँची जाना ही शान थी
पटना के हॉल में सिनेमा देखना
कुछ अलग सी बात थी .
तब चर्चा होती थी गोलघर की,
पहलेजा से महेंद्रू घाट जाने की
स्टीमर पर जो हवा बालों से अठखेलियाँ करती थी
वह परियों के देश जैसी ही थी !
राँची का फिरायालाल
रईसी की बात थी,
वहाँ सॉफ्टी खाना
आधुनिकता की बात थी !
वहाँ के रिफ़्यूजी मार्केट के मेले में
क्या नहीं मिलता था !
मिलता तो आज भी है,
लेकिन  ... पहले जैसी बात नहीं रही।
अस्सी के दशक में
शहीद चौक पर वह चाट का ठेला
हर कोई रुक ही जाता था।

रिक्शा से ऑटो,
ऑटो से कार,
सेकेंड स्लीपर से एसी 3
फिर एसी 2
... अपने शहर से जब निकले
तो निकल ही गए,
अपना शहर,
यूँ कहें, अपना घर अजनबी हो गया
कभी गए वहाँ
तो विस्फारित आँखों से यूँ देखा,
जैसे म्यूजियम घूमने आए हों !
जिन शहरों की कोई कल्पना नहीं थी
वहाँ रहने लगे !
विमान से जब पहली बार उड़े
तब लगा,
हम भी अमीर हो गए !

मुम्बई ! हमारे लिए एक फिल्मी दुनिया थी
लेकिन विद्युत गति से भागती मुम्बई
हमारा ठिकाना बन गई
दौड़ने लगे हम यहाँ की सड़कों पर
समंदर हमारा दोस्त बन गया
खुद से हम अपरिचित हो गए  !

इन बड़े शहरों में
गोल्ड क्लास में बैठकर
अब हम सिनेमा नहीं देखते
फ़िल्म देखते हैं !
छोटे छोटे किरानों से अब हम
किराने का सामान नहीं लेते,
बड़े बड़े मॉल से अनोखे पैकेट उठाते हैं
ऑर्गेनिक फ्रूट्स,वेजिटेबल्स लेते हैं
हज़ार की जगह
हज़ारों का सामान खरीदते हैं
घर में लाकर भूल जाते हैं
कुछ चीजें खाते हुए बुरा सा मुँह बनाते हैं
अरे ! यह क्या है !
....
लेकिन,
हम गाँव की  बातें करते हैं !
छूट गए शहरों को याद भी करते हैं !
बुद्धिजीवी हो गए हैं हम महानगरों में
हर विषय पर बोलते हैं,
चुप होते ही नहीं,
इतने ज्ञानी हो गए हैं
थोड़ी थोड़ी राजनीति सबने सीख ली है !

इंटरनेट का ज़माना है
और हम रोबोट
कुछ करें या न करें
बोलते जाते हैं।
हमारे सपनों की माँग भी बदल गई है
पहले हम राजा,रानी,
तोता,मैना को सुनते थे
अलादीन का चिराग चाहते थे,
अब आईपैड है,
और हर बटन में एक कहानी !
इक्के दुक्के घर में रखे टेलीफोन के नंबर घुमाने के लिए
इज़ाज़त लेनी पड़ती थी,
जिसका मिलना लॉटरी निकलने जैसा था !
अब तो बच्चों से इज़ाज़त लेनी पड़ती है
... स्वाभाविक है,
हमने बच्चों से उनका बचपन छीन लिया है,
बच्चों ने बड़ों का सम्मान !!

प्रश्न झकझोरता है,
क्या हम पीछे छोड़ आए,
छूट गए वक़्त को,
रिश्तों को,
गीतों को,
बचपन को
आगे ला पाएँगे ?
बच्चों के साथ कागज़ की नाव बनाने का
समय निकाल पाएँगे ?
बच्चों में पंचतंत्र की कहानियों की
उत्सुकता जगा पाएँगे  !!!!!!

मरीन ड्राइव पर बैठे लोग
अब रोमांचित कम,
थके हुए अधिक मिलते हैं
जिनके चेहरे पर एक ही गीत होता है,
"जाने कहाँ गए वो दिन" !



29 अप्रैल, 2018

कुछ यूँ महसूस होता है ...



खींचता है मुझे अपनी तरफ
वो ब्लैक एंड व्हाइट का ज़माना
गीत, तस्वीरें
वो अल्हड़पन  ...
जाने कब तक सुनती जाती हूँ कोई खोया खोया
अधजगा सा गीत
प्यास,उदासी,मिट्टी, इंतज़ार के !
रंगीन तस्वीरों को
ब्लैक एंड व्हाइट करती जाती हूँ
और  ... बात ही बदल जाती है !

कविता सुनते हुए
शायद कविता से भी अधिक खूबसूरत, मोहक
मुझे  ब्लैक एंड व्हाइट में उभरते पात्र लगते हैं
उनकी घूमती नज़रें
उनका बेफ़िक्र सा अंदाज़
लगता है,
कुछ यूँ महसूस होता है,
जैसे किसी ने मुझे बाँधकर बैठा दिया है !
सपनों के ब्लैक एंड व्हाइट बादल उमड़ते हैं
और,
एक प्याली चाय के संग मैं गुनगुनाने लगती हूँ
"ऐसे में कहीं कोई मिल जाए"
एक तितली मेरे कंधों पर आकर बैठ जाती है
काले मेघ रिमझिम बरसने लगते हैं,
चेहरे पर समेटने लगती हूँ मैं
-बारिश की बूँदों को,
वक़्त प्यानो बजाने लगता है
मैं धीरे से कहती हूँ,
"मैं तुझे फिर मिलूँगी
कहाँ कैसे पता नहीं"(अमृता प्रीतम)
सुनाई देती है उसकी चिर परिचित आवाज़
....
"बाँध दिए क्यों प्राण प्राणों से!
तुमने चिर अनजान प्राणों से!
यह विदेह प्राणों का बंधन,
अंतर्ज्वाला में तपता तन,
मुग्ध हृदय सौन्दर्य ज्योति को,
दग्ध कामना करता अर्पण,
नहीं चाहता जो कुछ भी आदान प्राणों से! "
( सुमित्रानंदन पंत)







24 अप्रैल, 2018

काश ! मान लिया होता




बुरा लगता है
जब कोई सिखाने लगता है अपने अनुभवों से
लेकिन, फिर एकांत हो या भीड़
ज़िन्दगी भर
हथौड़े की तरह यह बात पीछा करती है
"काश ! मान लिया होता"
...
धैर्य ज़रूरी है,
समझना होगा - कोई यूँ ही नहीं बोलता
विशेषकर, "माँ" !
उसकी आँखों में
उसकी बेचैन करवटों में
उसके भयभीत लम्हों में
ऐसी न जाने कितनी बातें होती हैं,
जो वह कहती नहीं,
पर रोकती है,
हिदायतें देती है,
....
झल्लाना एकदिन पछतावा बन जाता है
और फिर शुरू होता है वही सिलसिला
जब तुम्हारे अनुभवी विचार
अपने से छोटे का हाथ पकड़कर कहते हैं,
इतना ज़रूरी तो नहीं...
विशेषकर उनको,
जिनको तुमने गोद में उठाया हो
जिनके रोने पर तुम्हें नींद न आई हो
सोचो,
जब वे नहीं सुनेंगे,तो कैसा लगेगा !
कितने सारे दृश्य तुम्हें मथेंगे
और  ....

बता पाना मुश्किल होता है
बहुत मुश्किल !
इसलिए,
मान लेना चाहिए,
मान लेना कुछ दिन की उदासी हो सकती है
लेकिन नहीं मानना,
.... !

22 अप्रैल, 2018

बाकी से तो सुरक्षित रहेंगे !




रुक जाओ
रुक भी जाओ
पीछे लौटो
जहाँ हो,
एक बड़ा मिट्टी या सीमेंट का आँगन
लाल पोचाड़े से रंगा घर
बारामदे का पाया
जिससे छुप्पाछुप्पी खेलने की सुविधा हो
मिट्टी से लीपा बर्तन
दो कसी चोटी
हिदायतों की फेहरिस्त
घर से स्कूल
स्कूल से घर लौटने की ताक़ीद 
...
बहुत बने हम लड़कों के समान
बक्शो हमें
देखने दो हमें  सिर्फ सपने
रखो यह हकीकत अपने पास !
नहीं जाना हमें आगे,
क्या मिला है आगे जाकर ?
दिया है बस पैसों का हिसाब
नहीं दिया
तो हो गया है तलाक !
बच्चों की जिम्मेदारी आज भी हम पर ही है
नौकरी तो सिर्फ तुम करते हो
हम तो तफ़रीह करती हैं  !
किसी के साथ हँस लिया
तो चरित्रहीन !
फ़ोटो खिंचवा लिया
तो तौबा तौबा !
और हो गया कोई हादसा
तब तो  ...

आओ, वहीं चलें
बाबा के पीछे से बहुत कहने पर झांकें
भईया की किताब छुपकर पढ़ें
मईया से सीखें चुप रहना
दादी की झिड़कियाँ सुनें
"लड़कीजात हो,
ज्यादा खी खी खी खी मत करो,
दुपट्टा लेने का शऊर नहीं  ... "
घर के अंदर जो भेदभाव था
उसे ही सह लेंगे
आँगन के पेड़ में रस्सी बाँधकर
सावन का झूला झूल लेंगे
जिससे ब्याह दिया जाएगा
उसके पीछे पीछे
लम्बा घूँघट किए चल देंगे
बाकी से तो सुरक्षित रहेंगे !

18 अप्रैल, 2018

यह अँधेरा तुम्हारे घर से कभी नहीं जाएगा ...



मैं हूँ,
पर शायद कहीं नहीं हूँ !
कहीं नहीं होने का तात्पर्य बस इतना है
कि तुमसब मुझे देखकर अनदेखा कर रहे
लेकिन  ... मैं हूँ न !
मैं वही कन्या हूँ
जिसे तुमने पूजने के बहाने बुलाया था
और मंदिर के सारे दीये बुझा डाले थे
...
तुम्हें लगा, अन्धेरा हो गया
तुम्हारा विकृत चेहरा किसी को नहीं दिखा
... और न्याय की ऐसी की तैसी
हमेशा की तरह लोग चीखेंगे
नारे लगाएंगे
फिर सब खत्म !
मुर्ख हो तुम
और ऐसा सोचनेवाले !
मंदिर और प्रकृति की दीवारों ने देखा है तुम्हें
मुमकिन है,
कोई आदमी तुम्हें भूल जाए,
कोई इंसान तुम्हें एक बार में ही मार डाले
लेकिन मैं ऐसा नहीं करुँगी !
तुमने पूजने के लिए बुलाया था न
मैं लहूलुहान बैठी हूँ
तुम्हारे आँगन में
अपनी सहस्रों भुजाओं से
मैं तुम्हें धीरे धीरे खत्म करुँगी
वह सारे दृश्य तुम्हारे आगे लाऊँगी
जो तुमने अँधेरे में दफना दिया !
हैवानियत कभी दफ़न नहीं होती,
यह और कोई जान पाए या नहीं
तुम जानोगे
तुम्हारी सुरक्षा में खड़े लोग जानेंगे
कि अँधेरा कैसे बोलता है !
और यह अँधेरा तुम्हारे घर से कभी नहीं जाएगा  ...

14 अप्रैल, 2018

सब सही है




हर मृत्यु के बाद
रोज़मर्रा की साँसे
ले ही लेता है इंसान !
खाते हुए,
सोते हुए देखकर
लगता तो यही है
पर,
!!!
साँसें
किसी संकरे नाले से
गुजरती हुई सी लगती है !
पूछने से तो यही जवाब मिलेगा
कि
सब ठीक है
....
क्या सचमुच सब ठीक होता है ?!

चिड़िया भी रोज चहक लेती है
लेकिन चहक में वो बात नहीं होती
वह गा रही है
या रो रही है
कौन समझता है चिड़िया की भाषा
उसे तो दिखता है
उसका फुदकना
चोंच खोलना
और सुनाई देती है चीं चीं
गीत है या रुदन
किसे पता !

वह बच्चा रो रहा है
उसे चुप कराना है
वह भूखा है
उसे खाना देना है
एक तरफ
ज़रूरतें मुँह बाये खड़ी हैं
दूसरी तरफ दिनचर्या
समझ से परे है
अपनेआप को भी समझ पाना
साँसों का क्या है
जब तक चलना है
चलेंगी ही  ...
कैसे का कोई जवाब नहीं
हम - आप जो समझ लें
सब सही है
!!!

13 अप्रैल, 2018

सशक्त कदम उठाओ !!!




सती की तरह
मेरे शरीर के कई टुकड़े हो गए है
ज्ञात, अज्ञात
शहर,गांव
जंगलों में तड़प रहे हैं !
जान बाकी है
अर्थात अब भी उम्मीद बाकी है !
उम्मीद के नाम पर
कोई दीप मत जलाओ
कुछ बोलो मत,
मुझे ढूंढो
अपने अपने भीतर। 
समेटो,
जोड़ो,
खींच लाओ उस स्त्री को
जो अपने ऐसे बेटे के लिए व्रत रखती है
जो किसी स्त्री का सम्मान नहीं करता
उस स्त्री को
जो रात दिन जलील होकर भी
पूरी माँग सिंदूर भरती है
दीर्घायु का व्रत रखती है उस पति के लिए
जो अन्य स्त्रियों के आसपास
गिद्ध की तरह मंडराता है
उस स्त्री को
जो रक्षा का बन्धन
उसकी कलाई में बांधती है
जिसकी कलाइयाँ
ज़िन्दगानियाँ तहस नहस करती हैं !
शुरुआत यहाँ से होगी
तभी सुबह होगी
जितने हक़ से तुमने पुरुषों की बराबरी में
जाम से जाम टकराये हैं
धुँए के छल्ले बनाये हैं
उतने ही हक़ से
सड़क पर उस सुबह को लेकर उतरो
जिसके आह्वान में चीखें उभर रही हैं !!
.....
वहशी आंखों की पहचान
तुमसे अधिक कौन रखता है ?
निकाल दो उन आंखों को !
जो व्यवस्था
तुम्हें रौंद रही - एक वोट के लिए
एक घृणित जीत के लिए
वहाँ से किनारा कर लो ...
सिर्फ वोट देना ही तुम्हारी पहचान नहीं
एक एक वोट को रोक देना भी
तुम्हारी पहचान है
गहराई से चिंतन करो
सशक्त कदम उठाओ !!!

ज़िन्दगी जीने के लिए खुद को खर्चना होता है !

पैसे से तुम घर खरीद सकते हो महंगी चीजें खरीद सकते हो, लेकिन यदि तुम खुद को खर्च नहीं कर सकते, तो घर को घर का रूप नहीं दे सकते ! प...