11 दिसंबर, 2018

मेरी उपस्थिति तुम्हारा सम्बल बने




डॉ के आले की तरह
मैं तुम्हारी धड़कनें टटोलती हूँ
बीपी मशीन की तरह
रक्तचाप देखती हूँ ...
मैं निर्विकार किसी क्षण नहीं होती,
किसी शून्य में आँखें टिकाकर,
उन ठोकरों को घूरती हूँ,
जिन्होंने तुम्हें ठेस पहुँचाई !
नहीं,नहीं
मैं उनको कोई शाप नहीं देती,
इसलिए नहीं
कि मैं दे नहीं सकती ...
एक माँ कुछ भी कर सकती है,
लेकिन,
मैं इन कमज़ोर क्षणों से
स्वयं को मुक्त करती हूँ
ठोकरों की शुक्रगुज़ार होती हूँ,
जिन्होंने तुम्हें दर्द दिया,
रुलाया,
लेकिन एक सबक दिया ।
माँ अ से अनार सिखला सकती है,
चलना सिखला सकती है,
किसी ग़लती पे कान उमेठ सकती है,
रात भर तुम्हारे लिए करवटें ले सकती है,
सपनों में भी दुआ कर सकती है,
पर मन के आगे,
जीवन के आगे,
अपने अनुभव ही श्रेष्ठ होते हैं ।
संवेदनाओं से इतर,
चोट अपनी होती है,
महसूस करने
और सहने में फ़र्क होता है
और यही फ़र्क
कभी मौन देता है,
कभी बचपन की अहमियत बताता है,
कभी सूक्ष्म रहस्यों के जंग लगे दरवाजों को
खोल देता है,
...
हाँ मैं माँ,
उन रहस्यों की धुंध में
तुम्हारे साथ होती हूँ,
बचपन की कहानियाँ सुनाती हूँ,
डबडबाई आंखों से,
हर्षातिरेक की स्थिति में
हरि का नाम लेती हूँ
ताकि 'हरि' पर तुम्हारा विश्वास रहे
और कुछ हद तक
मैं तुम्हारे अनुभवों की रास थाम सकूँ,
मरहम बनकर तुम्हारे दर्द को कम कर सकूँ,
और मेरी उपस्थिति तुम्हारा सम्बल बने ।

08 दिसंबर, 2018

कुछ ख्वाबों का अधूरा रह जाना ही अच्छा होता है




कई बार कुछ ख्वाब
प्रत्यक्षतः
रह जाते हैं अधूरे !
लेकिन ख्वाबों के उपजाऊ बीजों को सिंचना
मेरे रोज का उपक्रम है ।
हर दिन,
मिट्टी को हल्का और नम करती हूँ
बीज रखती हूँ,
और अंकुरित होती हूँ मैं ...
पौधा,
फिर वृक्ष,
उसकी शाखें
जाने कौन कौन सी चिड़िया
मेरे रोम रोम में चहचहा उठती है ।
कलरव मुझमें प्राण संचार करते हैं,
फिर से मिट्टी को हल्का
और नम करने के लिए ।
कुछ ख्वाबों का अधूरा रह जाना ही अच्छा होता है,
ताकि उनकी पूर्णता की पुनरावृत्ति
इस तरह हो,
और जीवंतता बनी रहे ।



06 दिसंबर, 2018

आमीन


कभी दर्द
कभी खुशी
कभी प्यार
कभी ख्वाब
मैं लिख लिया करती थी,
टूटे फूटे शब्द ही सही,
लगता था,
जी लिया दिन ।
एक दिन कुछ धुआँ सा दिखा,
और हवा के साथ पतंग की तरह उड़ते
कागज़ के कुछ टुकड़े
...जंल रहे थे मेरे एहसास,
जाने किस दिशा में उड़ रहे थे,
न मैं आग बुझा सकी,
न पकड़ पाई उन टुकड़ों को
खड़ी रही अवाक !
...
क्या सिर्फ अवाक ?
नहीं,
मेरी अवाक स्थिति ले रही थी संकल्प
किसी मन्त्र की तरह गूंज रहे थे ये वाक्य
"अपराध को सहते जानेवाला भी
अपराधी ही होता है ।
जो स्वयं की रक्षा नहीं कर सकता,
उसकी रक्षा ईश्वर भी कब तक करेंगे ।"
और मेरे सामने मेरा "मैं" बोल पड़ा,
बस ...अब बस ।
दर्द,खुशी,ख्वाब,प्यार
सब मेरे गले लग गए,
और कहा,
अब लिखो,
तब तक लिखो,
जब तक अग्नि तुम्हारे राख हुए शब्दों का रूप न ले ले,
जब तक हवाएं शब्द शब्द न बहने लगे,
जब तक दिशाएं प्रतिध्वनित हो
तुम तक न लौटें
और मैंने कहा,
आमीन ।

04 दिसंबर, 2018

जा तेरे शब्दकोश बड़े हों




कभी कभी मन करता है,
इसके उसके सबके शब्द चुरा लूँ
और अपनी भावनाओं के बालों को सुलझा
उन्हें क्लिप बना टांक दूँ !
कई बार धूल की तरह
उड़ती नज़र आती हैं भावनाएं,
जब तक समझूँ
आंखों में जाकर बेचैन कर देती हैं ।
कितनी सारी कोशिशें होती हैं
उन धूलकणों को हटाने की
लेकिन वे आँखों की गहरी नदी में
बना लेती हैं अपनी जगह
किसी और दिन बह निकलने के लिए
...
उस दिन के लिए मेरे पास शब्द होने चाहिए न
ताकि मैं उन कणों की गाथा लिख सकूँ !
कभी चुरा लूँ,
तो क्षमा कर देना
धूलकणों सी उड़ती मेरी स्थिति को
दे देना आशीष
कि जा तेरे शब्दकोश बड़े हों ...

23 नवंबर, 2018

पुरुष/स्त्री



पुरुष यानी घर,
ठीक उसी तरह-
जैसे एक स्त्री आँगन ।
ऐसा नहीं कि स्त्री ने बाह्य संघर्ष नहीं किया,
पति की सुरक्षा नहीं की,
परन्तु,
पुरुष शरीर से शक्तिशाली था,
मन की कमजोरियों को,
उसने आंखों से बहने नहीं दिया,
तार तार होकर भी,
वह बना रहा ढाल,
ताकि स्त्री बनी रहे अन्नपूर्णा ।
पुरुष ने मिट्टी का दीया बनाया,
कि स्त्री भर सके उसमें रोशनी ,
अंधेरे से लड़ सके ...!
किसी भी बात की अति,
व्यक्ति को अत्याचारी
या निरीह बनाती है,
और वही होने लगा ।
पुरुष आक्रामक हो उठा,
स्त्री असहाय,
जबकि दोनों के भीतर रही जीवनदायिनी शक्ति,
दोनों थे पूरक,
लेकिन दोनों स्वयंसिद्धा बन गए,
एक दूसरे को नकार दिया,
भविष्य का पुरुष,
भविष्य की स्त्री ,
दोनों उग्र हो उठे,
परिवार,समाज से अलग
उनका एकल वर्चस्व हो,
इस कल्पनातीत इच्छा के आगे,
उनकी अद्भुत क्षमताएँ
क्षीण होने लगीं ।
प्रेम दोनों के आगे 
फूट फूटकर रो उठा,
घर का कोना कोना सिहरकर पूछने लगा,
कहाँ गया वह पुरुष
और वह स्त्री,
जिनसे मेरा वजूद था,
बचपन की मासूमियत थी,
बिना किसी तर्क के
पर्व-त्योहार थे, 
मेजबान और मेहमान थे ...
अब तो एक ही सवाल है,
इतना सन्नाटा क्यों है भाई,
या फिर है खीझ,
"ये कौन शोर कर रहा है" 
!!!

18 नवंबर, 2018

मन न भए दस बीस

 शरतचन्द्र का लिखा "देवदास" मेरी पहली किताब थी, जिसे मैंने डूबकर पढ़ा, और मेरा पूरा वजूद पारो' बन गया, कल्पनालोक की सीढियां उतरती पानी भरती, दौड़ती एक पुकार के साथ...देवदास$$$$ ।
फिर मेरी ज़िंदगी में आई शिवानी की "कृष्णकली" और मेरा एकांत शोख़ी से प्रवीर से बातें करने लगा ... "सुनो, यह तुम्हारी कुन्नी की साड़ी नहीं है"...
कृष्णकली की गली से निकली तो सामने खड़ा था "न हन्यते" का मिर्चा ...और अमृता बनकर मैं उससे मिलने गई । काश, मिर्चा देखता, लेकिन उससे क्या, अमृता की आहट से उसने वर्षों बाद भी उसे देख लिया ।
उम्र के साथ कहानियों का जो पड़ाव मिला हो, पात्रों में कहीं न कहीं समानता थी, शायद इसे ही कहते हैं पुनरावृति का आकर्षण, भविष्य का अद्भुत हस्ताक्षर ।
शिवाजी सामन्त की पुस्तक "मृत्युंजय" जब हाथ में आई तो कर्ण मेरी नसों में पुनः प्रवाहित होने लगा, दिनकर की "रश्मिरथी",लोगों की ज़ुबानी कहानी, सीरियल, इन सबसे एक बीजारोपण तो हो ही चुका था ।
इनदिनों, मैं एक तरफ वृंदावन में राधेकृष्ण सी चित्रित हो गई हूँ तो दूसरी तरफ कर्णसंगिनी बन कर्ण के अपमान, धैर्य की पराकाष्ठा देख रही हूँ । रसखान की पंक्तियों को गुनते हुए लगता है,"आठहुँ सिद्धि नवोनिधि को सुख नन्द की गाय चराय बिसारो"
सूरदास की कलम में उतरकर गोपिकाओं का हृदय बांचती हूँ -
"ऊधौ मन न भए दस बीस। एक हुतौ सो गयौ स्याम सँग, को अवराधै ईस।। इंद्री सिथिल भई केसव बिनु, ज्यौ देही बिनु सीस। आसा लागि रहति तन स्वासा, जीवहिं कोटि बरीस।। तुम तौ सखा स्याम सुंदर के, सकल जोग के ईस। ‘सूर’ हमारै नंदनँदन बिनु, और नाहिं जगदीस।।"

 कृष्ण का प्रयोजन कृष्ण ही जानें ।




10 नवंबर, 2018

स्मृति कह लो या आत्मा



वह नहीं है,
तो फिर,
जब किसी पदचाप को सुनके
किसी के गुजरने का एहसास होता है,
उसे क्या कहेंगे ?
आत्मा !
जिसे भय से,
हम भूत मान लेते हैं ।
दरअसल यह भूत,
अतीत है !
पर, हम डरने लगे,
डराने लगे,
तर्पण अर्पण,
झाड़फूंक करवाने लगे ...
यदि तर्पण अर्पण हो ही जाता है,
तो आत्मा कहाँ जाती है ?
किसी दूसरे शरीर में रूप पा लेती है,
फिर दिखाई क्यूँ देती है ?
और यदि नहीं पाया दूसरा शरीर,
तब तो तर्पण अर्पण अर्थहीन हो गया !
अगर आत्मा हमारे बीच ही रहना चाहती है,
तो रहने देते हैं न ।
क्यूँ स्मृतियों के गले लग
हम रोते भी हैं,
ढेरों कहानियाँ सुनाते हैं,
"काश,वह होता/होती" जैसी बातें करते हैं,
और उसे दूर भी करना चाहते हैं ।
आत्मा अमर है,
तभी तो,
राम,कृष्ण,रावण,कर्ण...
कुंती,सीता,द्रौपदी,गांधारी...
ये सब हमारे बीच आज भी हैं ।
ये हमारा व्यक्तिगत साक्षात्कार है उनसे,
जो हम अपने नज़रिए से,
उनकी व्याख्या करते हैं ।
इसी तरह पूर्वज हैं,
नहीं होते तो पितृ पक्ष का कोई अर्थ नहीं होता,
नदी,समंदर में खंडित दिखाई देते देवी देवता,
पुनः उपस्थित नहीं होते,
आशीषों से नहीं नहलाते ।
वे हैं -
अब इन सबको स्मृति कह लो
या आत्मा ।।।

30 अक्तूबर, 2018

समय हर बार कहता है




जब कोई हमें neglect करता है तो हम अपने अपमान में सोचते हैं, हम हार   गए ।
वक़्त लगता है इस समझ के सुकून को पाने में कि हम हारे नहीं, हम बच गए असली जीत के लिए । और रही बात अपमान की, तो यह अपमान सही मायनों में उनका होता है, जो ग़लत करने से रोकते हैं, जो बेइन्तहां प्यार करते हैं ।
अम्मा (स्व सरस्वती प्रसाद) ने इसे सहज भाव से समझने के लिए "मन का रथ" ही लिख दिया है -

"मन का रथ जब निकला
आए बुद्धि - विवेक
रोका टोका समझाया
दी सीख अनेक
लेकिन मन ने एक ना मानी
रथ लेकर निकल पड़ा
झटक दिया बातों को जिद पर रहा अड़ा
सोचा मैं मतवाला पंछी नील गगन का
कौन भला रोकेगा झोंका मस्त पवन का
जब चाहे मुट्ठी में भर लूं चाँद सितारे
मौजों से कहना होगा कि मुझे पुकारे
आंधी से तूफाँ से हाथ मिलाना होगा
अंगारों पे चलके मुझे दिखाना होगा
लोग तभी जानेंगे हस्ती क्या होती है
अंगूरी प्याले की मस्ती क्या होती है
मन की सोच चली निर्भय हो आगे - आगे
अलग हो गए वो अपने जो रास थे थामे
यह थी उनकी लाचारी
कुछ कर न सके वो
चाहा फिर भी
नही वेग को पकड़ सके वो
समय हँसा...
रे मूरख ! अब तू पछतायेगा॥
टूटा पंख लिए एक दिन वापस आएगा...
सत्य नही जीवन का नभ में चाँद का आना
सच्चाई हैं धीरे धीरे तम का छाना
समझ जिसे मधुरस मानव प्याला पीता हैं
वह केवल सपनो में ही जीता मरता हैं
अनावरण जब हुआ सत्य का,
मन घबराया
रास हाथ से छूट गई कुछ समझ न आया
यायावर पछताया ,
रोया फूट फूट कर
रथ के पहिये अलग हो गए टूट टूट कर
रही सिसकती पास ही खड़ी बुद्धि सहम कर
और विवेक अकुलाया मन के गले लिपट कर
लिए मलिन मुख नीरवता आ गयी वहाँ पर
लहू-लुहान मन को समझाया अंग लगा कर
धीरे से बोली-
अब मिल-जुल साथ ही रहना
फिर होगा रथ ,
तीनो मिल कर आगे बढ़ना
कोई गलत कदम अक्सर पथ से भटकाता हैं
मनमानी करने का फल फिर सामने आता हैं.."

इस रथ के घोड़े अपने नशे में होते हैं, तो नशा उतरते असलियत सामने होती है ।
कोई भी व्यक्ति पूरी तरह सही नहीं होता है, इसलिए उसको समझाने से पहले समझना भी होता है । सच भयानक लगता है सुनने में, लेकिन सच कह देना ज़रूरी भी होता है । हाँ इकतरफा कभी नहीं ।
     रथ के पहिये जब अलग हो जाते हैं,और जहाँ से यह बात आती है कि सब मिलजुल अब साथ ही रहना, वहाँ से, बुद्धि-विवेक को अनदेखा करना ख़ुद से ख़ुद का अपमान है । फिर सामनेवाला दोषी नहीं होता, क्योंकि उसने अपने सत्य को उजागर कर दिया था ।
समय गवाह है, जब जब हमने देखे हुए,भोगे  गए सत्य को अनदेखा किया है, वर्तमान शूल बनकर चुभता है । रोओ, लेकिन इसलिए रोओ कि ईश्वर ने तुम्हें चेतावनी दी, बड़ों ने समझाया ... और तुमने सुनकर भी अनसुना किया ।
"मेरी ख़ुशी, मेरी इच्छा" ... यह सब क्षणिक उन्माद है ।
उन्माद को जीना चाहते हो तो जियो, और मजबूत बनो -क्योंकि उन्मादित लहरें दिशाहीन होती हैं ।
कभी मत कहो कि हमें पता नहीं चला" एक बार ऐसा हो सकता है, बार बार नहीं । समय हर बार कहता है, "रे मूरख, अब तू पछतायेगा,टूटा पंख लिए एक दिन वापस आएगा" !
सार यही है, कि ईश्वर ने जो तुमको दिया है, उसे गंवाओ मत, और जो तुम्हारे लिए नहीं, उसके पीछे भागो मत । भागना है तो उसके जैसा बनने की क्षमता लाओ, एक ही मुखौटा सही - अपने लिए भी लाओ ।

26 अक्तूबर, 2018

इंतज़ार




वो जो सड़कों,शहरों,दो देशों की दूरियाँ है,
वह तुम्हारे लिए,मेरे आगे हैं
तो निःसंदेह, मेरे लिए तुम्हारे आगे भी हैं ।
बेचैनी बराबर भले न हो,
तुम समझदार हो,
मैं नासमझ ...
पर,
होंगी न !
कुछ बातें कह सुनाने को,
मेरे अंदर घुमड़ती हैं,
तो कुछ तो तुम्हारे भीतर भी सर उठाती होंगी ।
तुम्हें छूकर,
मेरे अंदर संगीत बजता है,
एक जलतरंग की चाह में,
तुम भी मेरे गले लग जाना चाहते होगे ।
रिश्तों के आगे,
उम्र की कैसी बाधा !
समय,लोग,संकोच के आगे रुक जाने से,
न समय समझेगा,
न लोग,
ना ही संकोच ...
सड़क,शहर,देश की दूरियां,
ज्यों ज्यों बढ़ेंगी,
बेचैनियां सर पटकेंगी,
और अगली बार तक
क्या पता मैं रहूँ ना रहूँ,
जिसके गले लग,
तुम अपने मन के धागे बांध सको !
यूँ यह यकीन रखना,
हर दूरी तय करके,
मैं तुम्हें सुनती हूँ,
सुनती रहूँगी,
और करूँगी इंतज़ार
- बिना कौमा,पूर्णविराम के,
तुम अपनी खामोशियाँ सुना जाओ ।

21 अक्तूबर, 2018

मेरे सपनों का अंत नहीं हुआ




यज्ञ हो,
महायज्ञ हो ...
मौन हो, शोर हो,
खुशी हो,डूबा हुआ मन हो !
चलायमान मन ...
जाने कितनी अतीत की गलियों से घूम आता है ।
बचपन, रिश्ते,पुकार,शरारतें,हादसे,सपने, ख्याली इत्मीनान ...
सब ठहर से गए हैं !
पहले इनकी याद में,
बोलती थी,
तो बोलती चली जाती थी !
तब भी यह एहसास था
कि सामनेवाला सुनना नहीं चाहता,
उसे कोई दिलचस्पी नहीं है,
हो भी क्यूँ !!!
लेकिन मैं, जीती जागती टेपरिकॉर्डर -
बजना शुरू करती थी,
तो बस बजती ही जाती थी ।
देख लेती थी अपने भावों को,
सामनेवाले के चेहरे पर,
और एक सुकून से भर जाती थी,
कि चलो दर्द का रिश्ता बना लिया,
माँ कहती थी, दर्द के रिश्ते से बड़ा,
कोई रिश्ता नहीं !
ख़ुद नासमझ सी थी,
मुझे भी बना दिया ।
यूँ यह नासमझी,
बातों का सिरा थी,
लगता था - कह सुनाने को,
रो लेने को,
कुछ" है ... भ्रम ही सही ।
चहल पहल बनी रहती अपने व्यवहार से,
क्योंकि सामनेवाला सिर्फ़ द्रष्टा और श्रोता होता !
ईश्वर जाने,
कुछ सुनता भी था
या मन ही मन भुनभुनाता था,
मेरे गले पड़ जाने पर !
सच भी है,
"कौन रोता है किसी और की ख़ातिर ऐ दोस्त"
और दूसरी ओर
दूसरों की ख़ुशी बर्दाश्त किसे होती है !
..
लेकिन, भिक्षाटन में मुझे दर्द मिला,
और उसे सहने की ताकत,
तो जिससे प्यार जैसा कुछ महसूस होता,
देना चाहती थी एक मुट्ठी,
पर झटक दिया द्रष्टा,श्रोता ने !
"आपकी बात और है,हम क्यूँ करेंगे भिक्षाटन!"
अचंभित, आहत होकर सोचती रही,
हमें कौन सी भिक्षा चाहिए थी
जो भी था, समय का हिसाब किताब था ।
ख़ैर,
सन्नाटा सांयें सांयें करे,
या किसी उम्मीद की हवा चले,
मैं उस घर की सारी खिड़कियाँ खोल देती हूँ,
जिसके बग़ैर मुझे रहने की आदत नहीं ।
बुहारती हूँ,
धूलकणों को साफ़ करती हूँ,
खिलौने वाले कमरे में प्राणप्रतिष्ठित खिलौनों से
बातें करती हूँ,
सबकी चुप्पी,
बेमानी व्यस्तता को,
अपनी सोच से सकारात्मक मान लेती हूँ,
एक दिन जब व्यस्तता नहीं रह जाएगी,
तब उस दिन इस घर,
इन कमरों की ज़रूरत तो होगी न,
जब -
गुनगुनाती,
सपने देखती,
मैं उन अपनों को दिखूंगी,
जिनके लिए,
मेरे सपनों का अंत नहीं हुआ,
और ना ही कमरों में सीलन हुई !
सकारात्मक प्रतीक्षा बनी रहे,
अतीत,वर्तमान,भविष्य की गलियों में सपने बटोरती मैं
- यही प्रार्थना करती हूँ ।

15 अक्तूबर, 2018

एक कविता हूँ - अतुकांत !




मैं कोई कहानी नहीं,
एक कविता हूँ - अतुकांत !
पढ़ सकते हो इसे सिलसिले से
यदि तुमने कुछ काटने के दौरान
काट ली हो अपनी ऊँगली,
और उसका भय,
उसका दर्द याद रह गया हो !
तुम समझ सकोगे अर्थ,
यदि तुमने थोड़े बचे अन्न के दानों को देखकर सोचा हो,
कि लूँ या किसी और के लिए रहने दूँ ।
तुम्हारी ख़ास पसन्द की लाइब्रेरी में शामिल हो जाएगी,
यदि किसी भी चकाचौंध में तुम,
पैबन्द भरी जिंदगी के मायने न भूल पाओ तो !
यत्र तत्र बिखरे से शब्द,
तुम्हारी आँखों में पनाह पा लेंगे,
यदि आकस्मिक आँधियों में,
तुम्हारा बहुत कुछ सहेजा हुआ
बिखर गया हो,
गुम हो गया हो !
सर से पांव तक लिखी कविता,
जरा भी लम्बी नहीं,
बेतुकी भी उनके लिए है,
जो ज़िन्दगी के गहरे अंधे कुंए से नहीं गुजरे,
रास्तों को पुख़्ता नहीं किया,
बस पैसे की कोटपीस खेलते रहे ...

मेरी उपस्थिति तुम्हारा सम्बल बने

डॉ के आले की तरह मैं तुम्हारी धड़कनें टटोलती हूँ बीपी मशीन की तरह रक्तचाप देखती हूँ ... मैं निर्विकार किसी क्षण नहीं होती, किसी शू...