06 अक्तूबर, 2021

हम आज भी वहीं खड़े हैं


 

हम आज तक वहीं खड़े हैं
जहां जला दी जाती थी बहुएं
घर का सारा काम 
उनके सर पर डाल दिया जाता था
 नहीं मिलता था उन्हें समय पर खाना
नहीं इजाज़त थी उनको
बिना नहाए रसोई में जाने की
मायके से किसी के आने पर
उल्लास से दौड़ने की . . .

हममें से ही कुछ स्त्रियों ने 
अपनी आंखों की गंगा को लुप्तप्रायः कर दिया
समाज हिकारत से कहने लगा,
पागल हो गई है औरत,
जिसके व्यवहार में पानी नहीं
वह घर के पानी का अर्थ क्या समझेगी
जब पति की भूख प्यास का ख्याल नहीं
तब इससे कोई और क्या उम्मीद रखेगा !
भीड़ से निकलकर किसी एक ने
जब आंखों की गंगा का आह्वान किया
सम्मान के दीये जलाए
तब उस स्त्री की आंखों से 
बमुश्किल निकली कुछ बूंदों ने
चेहरे पर उभरी सुकून की एक रेखा ने
उसे चरित्रहीन' सिद्ध किया ।

गंगा और गाय बनी स्त्री ने 
स्वयं में स्थित दुर्गा का आह्वान किया
और करने लगी संहार ...
जग जानता है,
जब भी कोई शक्ति उभरी है
तो उसके साथ विकृत
बुरी शक्तियां भी उभरी हैं
... वही हुआ ...
चतुर स्त्रियों ने उन स्त्रियों को जलाना शुरू किया,जो हित में खड़ी हुई थीं,
सही पुरुषों से जवाब मांगने लगीं
यह काम हम ही क्यों ?
की जगह
सारे काम तुम करो की गर्जना करने लगीं ।
दुर्गा ने रक्त पान किया था
इन स्त्रियों ने सारी वर्जनाएं तोड़ डालीं
रक्त के साथ मदिरा का सेवन किया
पुरुष सिर्फ क्यों" के हाहाकारी प्रश्नों के साथ
वह किया
कि पीड़ित स्त्रियों ने अपना दरवाज़ा बन्द कर दिया ।
सही गलत के मंथन में
विष निकला
और मनुष्य ने विष ले लिया
पूरे परिवार को पिला दिया
और अब वह अपने निर्मित दम्भ भरे महल में
पत्थर होता जा रहा है ।

इस धू धू जलते चक्रव्यूह में
एक प्रश्न है,
जब एक पुरुष स्त्री वेश धरकर
बिंदी,सिंदूर,चूड़ी,साड़ी पहनकर 
बाहर निकलता है
तो कोई उसे पुरुष नहीं कहता
फिर पुरुष के वेश में घूमनेवाली स्त्रियों को
स्त्री क्यों मान लिया जाए !!! 
शायद यही वजह है,
कि कुछ अपवादों को छोड़कर
हम आज भी वहीं खड़े हैं
जहां स्त्रियों को अपने अस्तित्व के लिए
अपनी सहनशीलता,विनम्रता से युद्धरत होना पड़ता है,
आगत की जमीन पर 
कुछ संदेशों के बीज डालने होते हैं
और शब्दों की अग्नि में
शब्दों का घी डालना पड़ता है ...

23 सितंबर, 2021

उसी की अदृश्य शक्ति


 


जब कभी' मंदिर गई हूं
और अगर भीड़ न हुई
तो ईश्वर को अपलक देखकर
मन ही मन बहुत कुछ कहकर
लौटी हूं ।
सिद्धि विनायक में
गणपति के मूषक के कान में
अपनी चाह बोलते हुए
ऐसा लगा है
कि गणपति तक बात चली गई
और जब बात चली गई
तो देर कितनी भी हो जाए
अंधेर की गुंजाइश नहीं रह जाती !
शिरडी की भीड़ में
जब अचानक साईं दिखे थे
तो आंखों से आंसू बह निकले थे
...
यूँ मैं मंदिर कम ही जाती हूं
विश्वास है
कि ईश्वर मेरे पास,मेरे साथ हैं
और ऐसे में जाना 
लगता है कि उनकी ही इच्छा होगी ...

दरगाह में धागा बांधते हुए
मैं धागा बन जाती हूं
धागे में दुआ मतलब
मुझमें दुआ ...
तो धागे संग दुआ बांधती हूं
और दुआओं के साथ 
खुद बंधती चली जाती हूं ।

स्वर्ण मंदिर गई
तो उसके निकट
अपने आप में एक अरदास बन गई हूं
कड़ा लेकर ऐसा लगा
जैसे मेरा मन ही स्वर्णिम हो गया हो ।

महालया के दिन
पूरी प्रकृति माँ दुर्गा बन जाती है
कलश स्थापना करते हुए
मिट्टी में जौ मिलाते हुए
यूँ महसूस होता है कि
मैं मिट्टी से एकाकार हो रही हूं
और चतुर्थी से हरीतिमा लिए
 नौ रूप का शुद्ध मंत्र बन जाती हूं ।
अखंड दीये का घृत बन
स्वयं में एक शक्ति बन जाती हूं ।

सुनकर आप विश्वास करें
ना करें
मुझे कवच,कील,अर्गला, तेरह अध्याय
और क्षमा प्रार्थना में 
जीवन का सार मिल जाता है
और हवन के साथ
मैं मंदिर मंदिर गूंज जाती हूं
यज्ञ की अग्नि में
रुद्राभिषेक के जल में
मैं खुद कहाँ नहीं होती हूं !

मैं मंदिर
मैं गिरजा
मैं गुरुद्वारा ...
कैलाश से गुजरती हवाओं में मैं हूं
जहां जहां से मुझे पुकारा है
वहां वहां मैं रही हूं
और रहूंगी ... 
उसकी ही तरह
उसकी शक्ति - सी
अदृश्य पर सर्वदा !!!

19 सितंबर, 2021

स्त्री लिपि


 

मनुस्मृति के पन्नों पर
एक श्रद्धा थी स्त्री लिपि
जो मनु की ताकत बन पहुंची थी
उसके उद्विग्न मन के आगे,
 थमाई थी उसे अपनी जीवनदायिनी उंगली
और प्रकृति के कण कण में मातृरूप लिए
 हवाओं की छुवन को आत्मसात किया था ।

विश्वास था उसे,
अब कोई प्रलय नहीं आएगा
तभी उसने युगों का आह्वान किया
यज्ञ कुंड बनी
वृंदा बन हर आंगन पहुंची ... 
पर नियति निर्धारित झंझावात में
वह प्रश्न बनकर प्रवाहित होने लगी,
एक नहीं,दो नहीं
जाने कितने कटघरे बन गए
और स्त्री लिपि वर्जित हो गई ।

उसे विध्वंस का कारण बना दिया गया
उसके शुभ कदमों को रोकने,जलाने के उपाय होने लगे,
कन्या पूजन के नाम पर
माँ दुर्गा को छला जाने लगा
कन्या के जन्म से पूर्व ही
उसे मृत्युदंड दिया जाने लगा ...

अनगिनत घरों से दुर्गंध आने लगी
तब पुनः स्त्रियों ने अपने अस्तित्व को संवारा
खुद को मशाल बना 
खुद को खुद में लिपिबद्ध करने लगी
स्पष्ट शब्दों में लिखा,
नारी तुम केवल श्रद्धा नहीं हो
मनु को जीवन देनेवाली
उसे अर्थ देनेवाली संजीवनी हो ।

परोक्ष का मौन,
तुम्हें कमज़ोर बनाता गया है
उस मौन की कारा से बाहर निकलो,
अपना पूजन स्वयं करो
अपनी शक्ति से अपना अभिषेक करो
और चण्डमुण्ड,रक्तबीज,महिषासुर का
वध करो,
किसी भी युग के आह्वान से पहले
खुद का आह्वान करो ...



14 सितंबर, 2021

नज़रिए का मोड़


 

बात सिर्फ नज़रिए की है
कौन किस नज़रिए से क्या कहता है ,करता है
कौन किस नज़रिए से उसे सुनता,और देखता है
और इन सबके बीच 
एक तीसरा नज़रिया
उसे क्या से क्या प्रस्तुत कर देता है,
जाने क्या मायने रखता है सबके लिए !!!

ईमानदारी बहुत कम है दोस्तों,
कुतर्कों की अमर बेल तेजी से फैल रही है...
आलीशान घर हो या फुटपाथ
सबके पास एक मोबाइल है
और मोबाइल पर - क्या नहीं है !

गली गली, हर मोड़ पर
अजीब अजीब विचार और व्यवहार तैर रहे हैं,
जो नहीं तैर पाया उनके साथ
वह डूब गया ।
कोई डूबना नहीं चाहता
ऊपर रहने के लिए बगैर कपड़ों के भी आना पड़े
तो यह उनका नज़रिया है,
व्यक्तिगत मामला है ।

... मैं सोचती रहती हूं
डुबो या तैरो
आखिर कब तक !!!
एक दिन वही शमशान होगा
वही चिता होगी
या कोई अनजान जगह ...
जहां खोकर पता भी नहीं चलेगा !

कभी कभार चर्चा होगी,
जब तक कोई जाननेवाला है
उसके बाद कहानी 
कब, कैसे कैसे मोड़ लेगी
अनुमानों की चपेट में आएगी

कौन जाने !!!

13 सितंबर, 2021

जर्जर परंपरा तोड़ दो


 



स्त्रियां निर्जला व्रत प्यार का प्रतीक मानती हैं
पति,बच्चों के लिए ...
ऐसा करके वे खुद को मान लेती हैं सावित्री
और दृढ़ माँ !
अनादि काल से ऐसा देखते देखते 
पुरुषों ने,बच्चों ने मान लिया
कि उनकी पत्नी
उनकी माँ - सबसे जुदा हैं ।
गर्व से कहते हैं सब,
"बिल्कुल कुछ नहीं लगा ...!"

न लगने की यूँ कोई उम्र नहीं होती,
पर वह उम्र -
जब दवा के सहारे जीने लगता है आदमी,
तब खुद को सबसे जुदा रखने के लिए
खुद के लिए सोचना चाहिए,
सोचना चाहिए पति और बच्चों को
कि पानी बगैर रहना
सारी व्यवस्था करके पूजा पर बैठना
सर्कस का सबसे बड़ा खतरनाक खेल है
उंगली थमाते थमाते अचानक
ईश्वर भी हतप्रभ हो उठते हैं 
और कहने को रह जाता है एक ही वाक्य,
"नहीं करती तो कुछ हो जाता, "
...... 
ईश्वर कहें या आप,
पर रो रोकर 
दबी आवाज़ में 
बार बार यह कहने से अच्छा है
इन प्रश्नों और
व्यर्थ टिप्पणियों के चक्रव्यूह से 
बाहर निकलें
मन को गंगाजल कर लें
और मानसहित कहें -
"बहुत हुआ, अब रहने दो
हमारे लिए है ना 
तो हम कहते हैं, 
आज हमें कहने दो -
तुम स्वयं दुआओं का कलश हो 
जिसके जल से हम रोज़ नहाते हैं
तुम्हारी आंखों के गोमुख से 
जिस जाह्नवी की धारा बहती है
उसमें प्रतिपल भीग जाते हैं 
तुम्हारे अंतर का पूजागृह 
जिसके कपाट
कभी बंद ही नहीं होते हैं
तुम्हारी बातें हैं हर की पौड़ी 
जहां सुबह शाम उतर कर 
हम अपने सारे कष्ट धोते हैं 
तुममें सांस लेता है हर व्रत,
हर मंदिर, हर तीर्थस्थल 
तुमसे पावन नहीं हो सकता 
कोई पुरी या रामेश्वरम
या गंगासागर,
कोई कैलाश मानसरोवर
या मुक्तिदायिनी
भागीरथी का जल... 
तुम्हारा है हमारे भीतर वास
जर्जर हो रही इस परंपरा को
तोड़ दो
अब छोड़ भी दो 
ये निर्जला व्रत
यह उपवास।"

03 सितंबर, 2021

बरसाने की राधिका


 


साठ की कुछ सीढ़ियां चढ़ तो गई है वह स्त्री,

लेकिन वह उम्र और कर्तव्यों का
एक ढांचा भर है !
प्रेम उसका सपना था
प्रेम उसकी ख्वाहिश थी
अपनी पुरवा सी आंखों में
उसने प्रेम के बीज लगाए थे
 प्रेम की सावनी घटा बनकर
धरती के कोने कोने में 
थिरक थिरक कर बरसी थी।
इंद्रधनुष के सातों रंग
उसके साथ चलते थे,
गति की तो पूछो मत
हिरणी भी हतप्रभ हो दांतों तले उंगली दबाती थी  ।
ख्यालों में उसके कोई देवदार सा होता
और वह अल्हड़ लता सी
उससे लिपट जाती थी,
प्रेम का अद्भुत नशा था
अद्भुत उड़ान थी
कब वह कैक्टस से उलझी
कब उसके पंख टूटे
जब तक वह समझे
संभले 
वह दो उम्र में विभक्त हो चुकी थी,
एक प्रेम
एक मौन कर्तव्य !
मौन कर्तव्यों की यात्रा में
उसके चेहरे पर 
कब थकान की पगडंडियां उगीं
कब बालों का रंग मटमैला हुआ
कब पैरों के घुटने समाधिस्थ हुए
उसे खुद भी पता नहीं चला ।
तस्वीरों में
आईने में कई बार
खुद को ही नहीं पहचान पाई है
क्योंकि ख्वाबों में आज भी वह 
विद्युत गति से नृत्य करती है
अनिंद्य सुंदरी बन
अपनी पलकों को झपकाते हुए
प्रेम के शोखी भरे गीत गाती है 
सुनती है -
रावी और चनाब के किनारे
उसके नाम की तरंगें उछालते हैं 
एक उसे हीर कहता है 
एक अपनी सोहणी बताता है 
और दोनों किनारों के 
दरमियान खड़ा 
एक जवां अधीर साया 
उसके कानों में गुनगुनाता है 
"जलते हैं जिसके लिए
तेरी आँखों के दीये .."
इसे सुनकर, रोमांचित होकर 
वह ज़िंदगी के दरवाज़े पे लगे 
खामोशी के ताले खोलती है 
मुस्कुराते  हुए 
पड़ोसी दिल से बोलती है  ... 
"वह गोकुल का छोरा 
नटखट ग्वाला 
नंदलाला  ... 
युग बदले 
पर वह 
कण भर भी नहीं बदला  ... 
तो मैं आज भी 
बरसाने की 
राधिका ही हूं ना !


30 अगस्त, 2021

मैंने देवकी और यशोदा को ही जिया है


 



कृष्ण को सोचते हुए, 
मैं कभी राधा नहीं हुई,
न सुदामा, न सूरदास,न ऊधो ...
मैंने देवकी और यशोदा को ही जिया है,
लल्ला को गले लगाकर दुलारा है
बरसों का रुदन दबाए बिलखी हूँ ।
मैं बस माँ रही ...
क्या करती अपने ही कान्हा से गीता सुनकर
उसके मुख में ब्रह्माण्ड देख
उसे याद क्या रखना था,
मुझे तो बस भोली माँ बन
उसकी बाल लीलाओं से आनन्दित होना था
अन्यथा सच तो यही है
कि मुझ देवकी के 
सांवरे सलोने लाल ने
गीता का ज्ञान
मेरे गर्भ में लिया 
मेरे आंचल की छांव तले ब्रह्माण्ड को आत्मसात किया
उसे जगत कल्याण के निमित्त
ज्ञान का आगार बनना था,
मुझे अज्ञान के हिंडोले में
पेंग मारते हुए,
उसे अपलक देखते
विदा करना था
और सूने कक्ष में बैठ
उसकी मोहिनी सूरत को
स्मरण करना था
मगर ...
उस जैसा ज्ञानेंद्र
अज्ञानी जननी की
कोख से जन्मे
क्या कभी संभव है !
सात पुत्रों की नृशंस हत्या के आगे भी
मैं आठवें के विश्वास से परे नहीं हुई
ऐसे में,
प्रकृति के सारे सामान्य नियम बदलने ही थे !
कारा की कठोर धरती
और लौह बेड़ियों ने
मुझे स्वयं से
कई गुना कठोरतर बनाया
और चौदह वर्षों के लिए
मेरी आत्मा को यशोदा की आत्मा से बदल दिया ।
यशोमति का तन
देवकी का मन 
कान्हा का भरण पोषण
मैंने अपने लाल को 
यशोदा के हाथों से
माखन सा निर्मल,कोमल,और स्वाद से भरा बनाया
माथे मोरपंख लगा 
पैरों में मोर के नृत्य की गति दी
काठ की बांसुरी देकर शिक्षा दी
कि चाह लेने भर की देर होती है
पत्थर को भी सजीव किया जा सकता है
मनोबल हो तो 
गोवर्धन को उंगली पर उठाया जा सकता है !

एक सत्य और बताऊं,
लल्ला का सुदर्शन चक्र
हमदोनों मायें थीं
हमने उसे कभी भी
कहीं भी
अकेला और निहत्था नहीं किया
अभिमन्यु और कर्ण की मृत्यु पर
जब वह बिलखा था
उसके सारे आंसू हमने आँचल में बटोर लिए थे
 
... आज कृष्णा का जन्मदिन है
मुझ देवकी को पीड़ा सहनी है
बाबा वासुदेव को यमुना पार करना है
नन्द बाबा को उनकी गोद से कान्हा को लेकर
यशोदा का लाल बनाना है
फिर से गोकुल,वृंदावन,मथुरा,द्वारका को दोहराना है
आततायियों का नाश करना है
...
उससे पहले हमारे लाल को
जरा जरा माखन खिला दो
और जमकर उसका जन्मोत्सव मनाओ ...

23 अगस्त, 2021

रिश्तों का हवाला नहीं होता




जब हर तरफ से उंगली उठती है
तो बड़ी घबराहट
अकबकाहट होती है
लेकिन उस बेचैन स्थिति में भी
सारथी बने हरि साथ होते हैं
मन के रूप में ।
मन कहता है,
लौट यहां से
अभी इसी वक्त
स्पष्टीकरण की ज़रूरत नहीं
पता तो है तुझे
कि बात जब स्पष्टीकरण पर आ जाए
तो मानो,तुम गलत हो चुके हो
कुछ भी कहना जब समय की मांग नहीं,
तो बेहतर है एक लंबी ख़ामोशी
और ख़ामोशी की प्रतिध्वनि में
अपने 'अति' का मूल्यांकन !
. . .
मूल्यांकन करो,
तीव्रता से महसूस करो उन पलों को,
जहां से तुम्हें नियत समय पर हट जाना चाहिए था
न कि उसकी अवधि बढ़ाकर
रिश्तों का हवाला देना था ।
रिश्तों का कोई हवाला नहीं होता
गर हो तो बेहतर है 
इस हाले की घूंट से दूर
उस मधुशाला में जाओ
जहां तुम खुद को मिल सको
खुद को पा सको ।

19 मई, 2021

सुना तुमने ?


 

सुना तुमने ?
गणपति ने महीनों से मोदक को हाथ नहीं लगाया है
माँ सरस्वती ने वीणा के तार झंकृत नहीं किये
भोग से विमुख हर देवी देवता
शिव का त्रिनेत्र बन
माँ दुर्गा की हुंकार बन
दसों दिशाओं में विचर रहे ...
फिर नीलकंठ बनने को तत्पर शिव
देव दानव के मध्य
एक मंथन देख रहे
विष निकलता जा रहा है
शिव नीले पड़ते जा रहे हैं
माँ पार्वती ने अपनी हथेलियों से
विष का प्रकोप रोक रखा है
मनुष्य की गलती की सज़ा
मनुष्य भोग रहा है
अभिभावक की तरह अश्रुओं को रोक
देवी देवता अपने कर्तव्य को पूरा कर रहे
रात के सन्नाटे में
शमशान के निकट
उनकी सिसकियां ...
सुनी तुमने ???

28 अप्रैल, 2021

हमारा देश जहाँ पत्थर भी पूजे गए !


 


 


 हमारा देश
जहाँ पत्थर भी पूजे गए !

 
जाने किस पत्थर में अहिल्या हो
कहीं तो जेहन में होगा
जो हमीं ने पत्थरों में प्राणप्रतिष्ठा की
फूल अच्छत चढ़ाए
और सुरक्षित हो गए ।


बड़ों के चरण हम झुककर
श्रद्धा से छूते थे
कि उनका आशीर्वचन
रोम रोम से निकले
और ऐसा हुआ भी
और हम सुरक्षित हो गए ।


स्त्री के लिए हमने एक आँगन बनाया
जहाँ वह खुलकर सांस ले सके
अपने बाल खोल
धूप में सुखाए
आकाश से अपना सरोकार रखे
चाँद को रात भर देखे
स्त्री खुश थी
संतुष्ट थी
बाधाओं में भी उसके आगे एक हल था
जिसे संजोकर
हम सुरक्षित हो गए ।


फिर एक दिन हमने अपनी आज़ादी का प्रयोग किया
बोलने की स्वतंत्रता को
स्वच्छंदता में तब्दील किया ...
हमने पत्थर को उखाड़ फेंका
अपशब्द बोले
और उदण्डता से कहा,
"अब देखें यह क्या करता है !"


बड़ों के आगे झुकने में हमारी हेठी होने लगी
चरण स्पर्श की बजाय
हम हवा में घुटने तक हाथ बढ़ाने लगे
प्रणाम करने का ढोंग करने लगे
बड़ों ने देखा,
महसूस किया
उनके आशीर्वचनों में उनकी क्षुब्धता घर कर गई
. .. सिखाने पर हमने भृकुटी चढ़ाई
उपेक्षित अंदाज में आगे बढ़ गए
घने पेड़ की तरह वे भी धराशायी हुए
हम फिर भी नहीं सचेत हुए !


आँगन को हमने लगभग जड़ से मिटा दिया
जिस जगह पुरुष द्वारपाल की तरह डटे थे
वहाँ स्त्रियाँ खड़ी हो गईं
उनकी सुरक्षा में खींची गई
हर लकीर मिटा दी गई
हम भूल गए कि कराटे सीखकर भी
एक स्त्री
वहशियों की शारीरिक संरचना से नहीं जूझ सकती !!!
दहेज हत्या,कन्या भ्रूण हत्या,...
हमने स्त्रियों का शमशान बना दिया
और असुरों की तरह अट्टहास करने लगे
माँ के नवरूप स्तब्ध हुए
जब उनके आगे कन्या पूजन के नाम पर
कन्याओं की मासूमियत दम तोड़ गई
कंदराओं में सुरक्षा कवच बनी माँ
प्रस्थान कर गईं !
गंगा,यमुना,सरस्वती ... कोई नहीं रुकी !


उसका घर मेरे घर से बड़ा क्यों?
उसकी गाड़ी मेरी गाड़ी से कीमती क्यों?
और बनने लगा करोड़ों का आशियाना
आने लगी करोड़ों की गाड़ियां
ज़रूरतों को हमने
इतना विस्तार दे दिया
जहाँ तक हमारी बांहों की
पहुँच नहीं बनी
पर हमने
उसे समेटने की कोशिश नहीं की
उस नशे ने हमें आत्मघाती बना दिया
फिर हम ताबड़तोड़
आत्महत्या करने लगे ।


अति सर्वत्र वर्जयेत"
 इसीके आगे आज हम असहाय,
निरुपाय ईश्वर को पुकार रहे ।
पुकारो,
वह आएगा
लेकिन मन के अंदर झांक के पुकारो
लालसाओं से बाहर आकर पुकारो
पुकारो,पुकारो
ईश्वर ने सज़ा दी है
कठोर नहीं हुआ है"
इस विश्वास के साथ अपने संस्कारों को जगाओ
फिर देखो - वह प्रकाश पुंज क्या करता है ।


08 मार्च, 2021

महिला दिवस


 


इतिहास गवाह है,
विरोध हुआ 
बाल विवाह प्रथा का 
सती प्रथा का 
दहेज प्रथा का
कन्या भ्रूण हत्या का
लड़कियों को बेचने का
उनके साथ हो रहे अत्याचार का ...
पुनर्विवाह के रास्ते बने
लड़का-लड़की एक समान का नारा गूंजा
सम्मान के नाम पर 
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस निर्धारित हुआ
लेकिन,
कुछ अपवादों को छोड़कर
हर क्षेत्र में उठ खड़ी होने पर भी
महिलाओं के प्रति
न सोच बदली
न स्थिति
शिक्षित होने पर भी
नसीहतों की ज्वाला में
उसे जलना पड़ता है ।
स्वेच्छा से विवाह - 
तो स्वच्छन्द !
आत्मनिर्भरता के परिणामस्वरूप
परिवार के लिए देर से लौटी
तो कलंकिनी !
व विवाह नहीं किया
तो लानत,
विवाह नहीं टिका
तो मलामत ।
पति अत्याचारी
तो भी उलाहना
अकेली किसी के साथ हँस बोल लिया
तो मिथ्यानुमानों के संदेह  !
बच्चों के लिए
सम्पूर्णतः उसकी जिम्मेदारी 
एक कप सुबह की चाय पति ने दे दी
तो कटाक्ष करने से 
अधिकांश लोग पीछे नहीं हटते !
'दिवस' मनाना
और हृदय से सम्मान देना
दो अलग स्थितियाँ हैं !
नवरात्रि हो
या महिला दिवस
स्थिति जो कल थी
वही लगभग आज भी है
और कल भी होगी ।

हम आज भी वहीं खड़े हैं

  हम आज तक वहीं खड़े हैं जहां जला दी जाती थी बहुएं घर का सारा काम  उनके सर पर डाल दिया जाता था  नहीं मिलता था उन्हें समय पर खाना नहीं इजाज़त थ...