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मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

28 अप्रैल, 2012

कोई पहचान शेष नहीं



शिकायतों का काफिला यूँ निकला
कि सब अकेले हो गए
श्रेष्ठता के दावे में सब औंधे गिर पड़े ...
खुद में ही कोई पहचान शेष नहीं
तो दूसरे की आँखों में क्या देखें
सबके सब महज खड़े से हैं
पाँव किसी के भी नहीं ...
एक दूसरे की बैसाखियों पर हँसते हँसते जाना
सब घिसट रहे हैं
...
जिसे देखो वो अपने पक्ष की सुरक्षा में
दिल से परे दिमाग से चल रहा है
और दिमाग व्यवहारिकता के पहिये पे चलता है ...
व्यवहारिकता ज़रूरी है
पर मात्र व्यवहारिकता से संतुलन नहीं बनता
..... किसी भी निर्माण में समूह होता है
सृष्टि के निर्माण से चाय बनाने तक में !
अकेला चना भांड नहीं फोड़ता
ऐसे ही तो कोई नहीं कहता
किसी भी पूर्णता के लिए
एक से भले दो ही होता है
पर आह !
यहाँ सब अकेले होते जा रहे हैं
महंगाई तो भाषण है
उससे अधिक तो बुद्धिजीवी बढ़ गए हैं
सामान्य की कोई कीमत ही नहीं रही !
सामान्य असामान्य के तिरस्कृत माहौल में
' मैं ' का वर्चस्व है
' मैं ' की माँग है
और खरीदार कोई नहीं
खुद की बोली खुद का क्रय
और अकेलापन !!!!!!

35 टिप्पणियाँ:

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

bahut bahut bahut sundar shandaar rachna,

Anita ने कहा…

जिसे देखो वो अपने पक्ष की सुरक्षा में
दिल से परे दिमाग से चल रहा है
और दिमाग व्यवहारिकता के पहिये पे चलता है ...
व्यवहारिकता ज़रूरी है
पर मात्र व्यवहारिकता से संतुलन नहीं बनता
..
कितना सही कहा है आपने आज समाज व्यक्तिवादी होता जा रहा है, पहले संयुक्त परिवार टूटे, फिर एकल परिवार और अब तो परिवार ही नहीं बच रहे, आज के युवाओं के पास दूसरे के लिये त्याग, समपर्ण और सहयोग जैसी भावनाओं के लिये समय ही नहीं है...

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

मैं ' का वर्चस्व है
' मैं ' की माँग है
और खरीदार कोई नहीं
खुद की बोली खुद का क्रय
और अकेलापन !!!!!!

हम की भावना तो न जाने कहाँ खो गयी है ... बस मैं और मैं .... अकेला तो होना ही था ... इस अकेलेपन की त्रासदी झेलते शायद हम सब ... पर फिर भी सुधरेंगे नहीं .... सार्थक रचना

सदा ने कहा…

शिकायतों का काफिला यूँ निकला
कि सब अकेले हो गए
सच तो यही है ...

Dr.Nidhi Tandon ने कहा…

मैं का वर्चस्व होने पे सका अकेला होना तय है...

Saras ने कहा…

सच कहा रश्मिजी ...अपनी अपनी डफली ..अपना अपना राग !!! (और सुननेवाला कोई नहीं )

dheerendra ने कहा…

मैं ' का वर्चस्व है
' मैं ' की माँग है
और खरीदार कोई नहीं
खुद की बोली खुद का क्रय
और अकेलापन !!!!!!

बहुत सुंदर प्रस्तुति,..बेहतरीन पोस्ट के लिए बधाई,....रश्मी जी

MY RESENT POST .....आगे कोई मोड नही ....

dheerendra ने कहा…

मैं ' का वर्चस्व है
' मैं ' की माँग है
और खरीदार कोई नहीं
खुद की बोली खुद का क्रय
और अकेलापन !!!!!!

बहुत सुंदर प्रस्तुति,..बेहतरीन पोस्ट के लिए बधाई,....रश्मी जी

MY RESENT POST .....आगे कोई मोड नही ....

expression ने कहा…

अकेला चना भांड नहीं फोड सकता...
दुःख की बात ये है कि भले तकलीफ और असफलता सह लें....मगर आज रहना सबको अकेले ही है.......
प्रिवेसी चाहिए सबको.............

सादर.

वन्दना ने कहा…

सामान्य असामान्य के तिरस्कृत माहौल में
' मैं ' का वर्चस्व है
' मैं ' की माँग है
और खरीदार कोई नहीं
खुद की बोली खुद का क्रय
और अकेलापन !!!!!…………एक सटीक व सार्थक रचना सोचने को मजबूर करती "मै के अरण्य मे" सिर्फ़ "मै" ही रह जाता है

Maheshwari kaneri ने कहा…

शिकायतों का काफिला यूँ निकला
कि सब अकेले हो गए .......sach hai aaj sab andar se bilkul akele hai...

डॉ टी एस दराल ने कहा…

जैसे जैसे संचार व्यवस्था बढती जा रही है , पारस्परिक संचार ख़त्म होता जा रहा है .
आधुनिक विकास की देंन !

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

यह नयी दुनि‍या का सच है

shikha varshney ने कहा…

आलम यह है कि हम के आवरण में भी "मैं" ही छिपा रहता है.

Kailash Sharma ने कहा…

सामान्य असामान्य के तिरस्कृत माहौल में
' मैं ' का वर्चस्व है
' मैं ' की माँग है
और खरीदार कोई नहीं
खुद की बोली खुद का क्रय
और अकेलापन !!!!!!

....अकेलेपन की व्यथा का बहुत सजीव चित्रण...बहुत संवेदनशील अभिव्यक्ति...आभार

पंछी ने कहा…

ufff..kya kahun ...just awesome :)

मत भेद न बने मन भेद- A post for all bloggers

Human ने कहा…

अच्छी कविता । बहुत अच्छे विषय पर लिखा है आपने । आदमी का वजूद आदमी के बाद कितना है । अपनी 'मैँ' को जितना दूसरोँ मेँ देखा उतना है ।

sushila ने कहा…

" मैं ' का वर्चस्व है
' मैं ' की माँग है
और खरीदार कोई नहीं
खुद की बोली खुद का क्रय
और अकेलापन !!!!!!"
गहन अभिव्यक्‍ति ! बहुत सुंदर !

Amrita Tanmay ने कहा…

सब घिसट रहे हैं एक दूसरे को बैसाखियों पर ... सच !!!

Amrita Tanmay ने कहा…

सब घिसट रहे हैं एक दूसरे को बैसाखियों पर ... सच !!!

mridula pradhan ने कहा…

मैं ' का वर्चस्व है
' मैं ' की माँग है
और खरीदार कोई नहीं
खुद की बोली खुद का क्रय
और अकेलापन !!!!!! bahut sachchi tasveer kheench di aapne.....

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

काश मैं की में में से जीवन बाहर आ पाये।

M VERMA ने कहा…

'मैं' का वर्चस्व है
'मैं' की माँग है
और खरीदार कोई नहीं
'मैं' की इस 'मैं' में शायद 'मैं' हलाक हो जाए

मनोज कुमार ने कहा…

शून्य भी पूर्णता ही है, बल्कि पूर्ण ही है।

मनोज कुमार ने कहा…

शून्य भी पूर्ण होता है, बल्कि पूर्ण ही है।

lokendra singh rajput ने कहा…

ये 'मैं' आदमी को एक दिन पूरी तरह खा जायेगा....

Sadhana Vaid ने कहा…

मैं ' का वर्चस्व है
' मैं ' की माँग है
और खरीदार कोई नहीं
खुद की बोली खुद का क्रय
और अकेलापन !!!!!!

वास्तव में एक यही चरम सत्य रह गया है और शायद यही आज के हर बुद्धिजीवी का परम धर्म भी बन गया है ! गहन सोच लिये सार्थक रचना ! बधाई !

सतीश सक्सेना ने कहा…

मरने के बाद मैं का क्या ....

Anupama Tripathi ने कहा…

विकास का मूल चुकाता समाज .....मशीने हैं तो इंसान का महत्व कहाँ है...... जब व्यक्ती सोचे ...मैं सब कुछ कर सकता हूँ ...अकेला पन तो आएगा ही ....
कटु सत्य आज का ....

Onkar ने कहा…

bahut prabhavshali rachna

रचना दीक्षित ने कहा…

शिकायतों का काफिला यूँ निकला
कि सब अकेले हो गए
श्रेष्ठता के दावे में सब औंधे गिर पड़े ...

इस सत्य को पहचानने की आवश्यकता है. सुंदर प्रस्तुति.

vandana ने कहा…

जिसे देखो वो अपने पक्ष की सुरक्षा में
दिल से परे दिमाग से चल रहा है



' मैं ' का वर्चस्व है
' मैं ' की माँग है
और खरीदार कोई नहीं
खुद की बोली खुद का क्रय
और अकेलापन !!!!!!

बिलकुल सही स्थिति बतलाई है आपने

RITU ने कहा…

सच है ..स्वार्थ नहीं त्यागता कोई..

RITU ने कहा…

सच है ..स्वार्थ नहीं त्यागता कोई..

Pallavi ने कहा…

बस यह (मैं) ही तो आजकल सारे फसाद कि जड़ बन गया है।