
शिकायतों का काफिला यूँ निकला
कि सब अकेले हो गए
श्रेष्ठता के दावे में सब औंधे गिर पड़े ...
खुद में ही कोई पहचान शेष नहीं
तो दूसरे की आँखों में क्या देखें
सबके सब महज खड़े से हैं
पाँव किसी के भी नहीं ...
एक दूसरे की बैसाखियों पर हँसते हँसते जाना
सब घिसट रहे हैं
...
जिसे देखो वो अपने पक्ष की सुरक्षा में
दिल से परे दिमाग से चल रहा है
और दिमाग व्यवहारिकता के पहिये पे चलता है ...
व्यवहारिकता ज़रूरी है
पर मात्र व्यवहारिकता से संतुलन नहीं बनता
..... किसी भी निर्माण में समूह होता है
सृष्टि के निर्माण से चाय बनाने तक में !
अकेला चना भांड नहीं फोड़ता
ऐसे ही तो कोई नहीं कहता
किसी भी पूर्णता के लिए
एक से भले दो ही होता है
पर आह !
यहाँ सब अकेले होते जा रहे हैं
महंगाई तो भाषण है
उससे अधिक तो बुद्धिजीवी बढ़ गए हैं
सामान्य की कोई कीमत ही नहीं रही !
सामान्य असामान्य के तिरस्कृत माहौल में
' मैं ' का वर्चस्व है
' मैं ' की माँग है
और खरीदार कोई नहीं
खुद की बोली खुद का क्रय
और अकेलापन !!!!!!
35 टिप्पणियाँ:
bahut bahut bahut sundar shandaar rachna,
जिसे देखो वो अपने पक्ष की सुरक्षा में
दिल से परे दिमाग से चल रहा है
और दिमाग व्यवहारिकता के पहिये पे चलता है ...
व्यवहारिकता ज़रूरी है
पर मात्र व्यवहारिकता से संतुलन नहीं बनता
..
कितना सही कहा है आपने आज समाज व्यक्तिवादी होता जा रहा है, पहले संयुक्त परिवार टूटे, फिर एकल परिवार और अब तो परिवार ही नहीं बच रहे, आज के युवाओं के पास दूसरे के लिये त्याग, समपर्ण और सहयोग जैसी भावनाओं के लिये समय ही नहीं है...
मैं ' का वर्चस्व है
' मैं ' की माँग है
और खरीदार कोई नहीं
खुद की बोली खुद का क्रय
और अकेलापन !!!!!!
हम की भावना तो न जाने कहाँ खो गयी है ... बस मैं और मैं .... अकेला तो होना ही था ... इस अकेलेपन की त्रासदी झेलते शायद हम सब ... पर फिर भी सुधरेंगे नहीं .... सार्थक रचना
शिकायतों का काफिला यूँ निकला
कि सब अकेले हो गए
सच तो यही है ...
मैं का वर्चस्व होने पे सका अकेला होना तय है...
सच कहा रश्मिजी ...अपनी अपनी डफली ..अपना अपना राग !!! (और सुननेवाला कोई नहीं )
मैं ' का वर्चस्व है
' मैं ' की माँग है
और खरीदार कोई नहीं
खुद की बोली खुद का क्रय
और अकेलापन !!!!!!
बहुत सुंदर प्रस्तुति,..बेहतरीन पोस्ट के लिए बधाई,....रश्मी जी
MY RESENT POST .....आगे कोई मोड नही ....
मैं ' का वर्चस्व है
' मैं ' की माँग है
और खरीदार कोई नहीं
खुद की बोली खुद का क्रय
और अकेलापन !!!!!!
बहुत सुंदर प्रस्तुति,..बेहतरीन पोस्ट के लिए बधाई,....रश्मी जी
MY RESENT POST .....आगे कोई मोड नही ....
अकेला चना भांड नहीं फोड सकता...
दुःख की बात ये है कि भले तकलीफ और असफलता सह लें....मगर आज रहना सबको अकेले ही है.......
प्रिवेसी चाहिए सबको.............
सादर.
सामान्य असामान्य के तिरस्कृत माहौल में
' मैं ' का वर्चस्व है
' मैं ' की माँग है
और खरीदार कोई नहीं
खुद की बोली खुद का क्रय
और अकेलापन !!!!!…………एक सटीक व सार्थक रचना सोचने को मजबूर करती "मै के अरण्य मे" सिर्फ़ "मै" ही रह जाता है
शिकायतों का काफिला यूँ निकला
कि सब अकेले हो गए .......sach hai aaj sab andar se bilkul akele hai...
जैसे जैसे संचार व्यवस्था बढती जा रही है , पारस्परिक संचार ख़त्म होता जा रहा है .
आधुनिक विकास की देंन !
यह नयी दुनिया का सच है
आलम यह है कि हम के आवरण में भी "मैं" ही छिपा रहता है.
सामान्य असामान्य के तिरस्कृत माहौल में
' मैं ' का वर्चस्व है
' मैं ' की माँग है
और खरीदार कोई नहीं
खुद की बोली खुद का क्रय
और अकेलापन !!!!!!
....अकेलेपन की व्यथा का बहुत सजीव चित्रण...बहुत संवेदनशील अभिव्यक्ति...आभार
ufff..kya kahun ...just awesome :)
मत भेद न बने मन भेद- A post for all bloggers
अच्छी कविता । बहुत अच्छे विषय पर लिखा है आपने । आदमी का वजूद आदमी के बाद कितना है । अपनी 'मैँ' को जितना दूसरोँ मेँ देखा उतना है ।
" मैं ' का वर्चस्व है
' मैं ' की माँग है
और खरीदार कोई नहीं
खुद की बोली खुद का क्रय
और अकेलापन !!!!!!"
गहन अभिव्यक्ति ! बहुत सुंदर !
सब घिसट रहे हैं एक दूसरे को बैसाखियों पर ... सच !!!
सब घिसट रहे हैं एक दूसरे को बैसाखियों पर ... सच !!!
मैं ' का वर्चस्व है
' मैं ' की माँग है
और खरीदार कोई नहीं
खुद की बोली खुद का क्रय
और अकेलापन !!!!!! bahut sachchi tasveer kheench di aapne.....
काश मैं की में में से जीवन बाहर आ पाये।
'मैं' का वर्चस्व है
'मैं' की माँग है
और खरीदार कोई नहीं
'मैं' की इस 'मैं' में शायद 'मैं' हलाक हो जाए
शून्य भी पूर्णता ही है, बल्कि पूर्ण ही है।
शून्य भी पूर्ण होता है, बल्कि पूर्ण ही है।
ये 'मैं' आदमी को एक दिन पूरी तरह खा जायेगा....
मैं ' का वर्चस्व है
' मैं ' की माँग है
और खरीदार कोई नहीं
खुद की बोली खुद का क्रय
और अकेलापन !!!!!!
वास्तव में एक यही चरम सत्य रह गया है और शायद यही आज के हर बुद्धिजीवी का परम धर्म भी बन गया है ! गहन सोच लिये सार्थक रचना ! बधाई !
मरने के बाद मैं का क्या ....
विकास का मूल चुकाता समाज .....मशीने हैं तो इंसान का महत्व कहाँ है...... जब व्यक्ती सोचे ...मैं सब कुछ कर सकता हूँ ...अकेला पन तो आएगा ही ....
कटु सत्य आज का ....
bahut prabhavshali rachna
शिकायतों का काफिला यूँ निकला
कि सब अकेले हो गए
श्रेष्ठता के दावे में सब औंधे गिर पड़े ...
इस सत्य को पहचानने की आवश्यकता है. सुंदर प्रस्तुति.
जिसे देखो वो अपने पक्ष की सुरक्षा में
दिल से परे दिमाग से चल रहा है
' मैं ' का वर्चस्व है
' मैं ' की माँग है
और खरीदार कोई नहीं
खुद की बोली खुद का क्रय
और अकेलापन !!!!!!
बिलकुल सही स्थिति बतलाई है आपने
सच है ..स्वार्थ नहीं त्यागता कोई..
सच है ..स्वार्थ नहीं त्यागता कोई..
बस यह (मैं) ही तो आजकल सारे फसाद कि जड़ बन गया है।
एक टिप्पणी भेजें