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मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

27 अक्तूबर, 2012

निजी क्या है ?निजित्व क्या है ?



निजी क्या है ?
घड़ी की टिक टिक की तरह यह प्रश्न 
मंथन संधान कर रहा ...
उजाले से अन्धकार 
अन्धकार में जुगनू 
घुप्प अन्धकार
सफ़ेद प्रकाश .... निजित्व क्या है ?

प्रेम निजित्व है
संबंध निजित्व है 
पर यदि वह है सरेआम 
तो गलत है 
अश्लील है 
निजी नहीं  !

अहिंसा निजित्व है 
अहिंसा की लक्ष्मण रेखा बनाने के लिए हिंसा 
हिंसात्मक शब्द - अन्याय है.
यातना का सूक्ष्म कण भी 
निजी नहीं होता 
सड़क पर जब चीखें उभरती हैं 
तो वह निजी नहीं रह जातीं 
ऐसे में 
हारे लम्हों की हारी साँसों को कोई कहे 
तो सुनो
क्योंकि उन लम्हों में सरेआम सरेराह छीन लिए गए 
निजी एहसासों की थरथराती सिसकियाँ होती हैं 
उन पर ऊँगली उठाने से पहले 
उनसे सवाल करो 
जो निजी जीवन की परिभाषा से 
खुद तो गुमराह हैं ही
दूसरे का नाम घसीट रहे !
अन्याय कभी निजी नहीं होता 
होता तो न कैकेयी ज़ुबान पर होतीं
न कुंती !

वाल्मीकि ने अनुमानित रामायण नहीं लिखा 
सीता ने वाल्मीकि से अपनी कथा कही 

वेदना जब गहरी हो 
तो ..... सही गलत का पता नहीं चलता 
परिणाम सही तो चयन सही
परिणाम गलत तो सबकुछ गलत 
निजी दुःख भी गलत 
और हास्यास्पद !
पर इसके लिए उपयुक्त प्रावधान नहीं बनाये जा सकते 
ज़िन्दगी जुआ है 
जीत  गए तो सब सही
हार गए तो मूर्ख !!!
किसी ने बातों का मान रखा 
तो निजता का मान हुआ 
दुह्शासन बन गया 
तो .......... 
अंततः प्रश्न मानसिकता का शिकार होता है 
ये निजी और निजित्व है क्या !!!!!!!!!!!!!!!!!

40 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ कितना भी निजी क्यों हो ,परन्तु वह निजित्व सदैव सार्वजनिक होने को मचलता रहता है |

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  2. सही ...निजी कुछ भी नहीं...चौखट लाँघते सार्वजनिक|

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  3. निजित्व का प्रदर्शन उसे निजी नहीं रहने देता और कुछ निजी होकर भी सरेआम हो जाता है... गहन भाव... आभार

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  4. सही कहा आपने दीदी .....जो छिप गया वो निजी
    जो सबके सामने आ गया ????????

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  5. आपकी रचना गागर में सागर जैसी होती है ............ क्या-क्या समेटे होती है ........
    क्या-क्या लपेटे होती है ............. एक नजर में ताड़ लेना असंभव नहीं तो कठिन तो जरुर होता है ........

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  6. गहन भाव पिरोये एक बेहद उम्दा भावपूर्ण प्रस्तुति शुक्रिया बधाई

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  7. आप में रचनाकर्म की क्षमता, हतप्रभ करती है

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  8. निजी और निजित्व की बहुत ही गहरी अभिवयक्ति की है आपने.......

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  9. सुन्दर प्रस्तुति!
    ईद-उल-जुहा के अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएँ|

    उत्तर देंहटाएं
  10. सुन्दर प्रस्तुति!
    ईद-उल-जुहा के अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएँ|

    उत्तर देंहटाएं
  11. apake darshan ko mera naman. main apake isa darshan kee kaayal hoon.
    niji tab tak niji jab tak ki vah jubaan se bahar nahin aaya. jab jubaan par aa gaya to nijatva kho deta hai.

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  12. बहुत गहन चिंतन..आज के समय में क्या निजी रह गया है...आभार

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  13. वेदना जब गहरी हो
    तो ..... सही गलत का पता नहीं चलता
    परिणाम सही तो चयन सही
    परिणाम गलत तो सबकुछ गलत
    निजी दुःख भी गलत
    और हास्यास्पद !

    bilkul sach aur antarmn ko kuredane ke liye vivash karati rachana

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  14. प्रेम निजित्व है
    संबंध निजित्व है
    पर यदि वह है सरेआम
    तो गलत है
    अश्लील है
    निजी नहीं !..बहुत सही कहा..आभार

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  15. हम लिख ही रहे हैं अपनी निजता को सार्वजनिक करने के लिए...वरना सोच तो बहुत लोग रहे हैं...

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  16. वेदना जब गहरी हो
    तो ..... सही गलत का पता नहीं चलता
    परिणाम सही तो चयन सही
    परिणाम गलत तो सबकुछ गलत

    सच बिल्कुल सच...... सशक्त रचना

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  17. हम सब एक दुसरे से रिश्ते नातों से जुड़े है तो हर निजत्व भी कही न कही जुड़ा ही है .....

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  18. अन्याय कभी निजी नहीं होता .... सटीक कहा है .... गहन अभिव्यक्ति

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  19. प्रेम निजित्व है
    संबंध निजित्व है
    पर यदि वह है सरेआम
    तो गलत है
    अश्लील है
    निजी नहीं !

    बहुत बढ़िया लिखा आपने

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  20. जब कोई तथ्य सहन न हो, तो कह देना ही उचित..

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  21. प्रेम निजित्व है
    संबंध निजित्व है
    पर यदि वह है सरेआम
    तो गलत है
    अश्लील है
    निजी नहीं ! badi achchi vyakhya ki hain.....

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  22. वेदना जब गहरी हो
    तो ..... सही गलत का पता नहीं चलता
    परिणाम सही तो चयन सही
    परिणाम गलत तो सबकुछ गलत
    निजी दुःख भी गलत
    और हास्यास्पद !

    नहुत बड़ी बात कह डी आपने.

    घर के अंदर सबकुछ निजी है, घर के बाहर सब कुछ सार्वजानिक. हमें अपना जीवन दोनों ही जगह जीना होता हा, और घर के साथ बाहर भी आदर्श प्रस्तुत करना होता है.

    सुन्दर रचना.

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  23. गहन भाव समेटे बहुत
    ही बेहतरीन रचना...
    :-)

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  24. जब कुछ भी निजी ....किस न किसी रूप में...स्वयं या किसी और के द्वारा ........परोसा जायेगा ....वह निजी नहीं रह जायेगा .....फिर चाहे वह व्यथा हो, कोई सम्बन्ध हो, कोई कथा हो या कोई गाथा हो .....जो अंतर्मन की गहराईओं में अश्मिभूत हो ....जिसे हम कभी किसी हाल में किसी और के समक्ष क़ुबूल करने से डरें...सिर्फ वही निजी हो सकता है ....!

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  25. सुदूर अंतर्मन तक जाने वाली रचना. सच में जब तक जीत मिलती है सब ठीक लेकिन एक हार ही सब कुछ भुला देती है.

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  26. बहुत बढ़िया विचारशील प्रस्तुति ...

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  27. व्यक्ति और समष्टि का अंतर आपने बखूबी बताया है निजी और निजत्व की चर्चा करते हुए। पर निजत्व को निजित्व कहना थोड़ा खटका मुझे। रचना चिंतन करने को बाध्य करती है। अच्छी रचना के लिए मेरी बधाई स्वीकार करें।

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  28. बड़े ही तार्किक ढंग से आपने एक रेखा खींची है। बधाई।

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  29. बेहद गहन भाव लिए ... उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति
    आभार

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  30. जहाँ दूसरे के दर्द की एक सिसकी भी उठे, वहीं आपका निजत्व समाप्त हो जाता है...

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  31. अंतरतम को पुनः टटोलने और सोचने पर विवश करती रचना .. अंततः प्रश्न मानसिकता का शिकार होता है .. !!
    सादर
    मधुरेश

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