08 अक्तूबर, 2012

जब तक गति है - पाना है खोना है




खुद को ढूंढना,तौलना...
पाकर खुद से खुद को खोना,
असली जीवन है- और ख़ुशी भी .
पा लो खुद को
रख लो संजो के
फिर खोज ख़त्म हो जाती है
विराम हो जाए
तो जो प्राप्य है
वह एकबारगी अधूरी हो जाती है !
लम्हा लम्हा कोई पाता है खुद को
फिर अचानक उस पर
डाल देता है एक झूठा आवरण
तो वहाँ से उत्पन्न होता है
एक और सत्य -
जिसकी परिधि में
विस्तार में
स्व और स्व की छाया
घटती बढ़ती रहती है ...
छाया घटे या बढे
है तो असत्य और अपूर्ण ही
और पूर्णता के लिए निरंतरता तब तक ज़रूरी है
जब तक साँसें हैं !
न प्रश्न, न उत्तर
स्व की क्रिया प्रतिक्रिया
आतंरिक होती है
जो अर्धमुर्छावस्था में भी सक्रिय है
मृत दिमाग
यदि साँसें ले रहा है
तो वह
निःसंदेह -
एक अकथनीय जीवन जी रहा है
व्यक्तिविशेष और उसका शरीर
भले ही उत्तर ना दें
पर उसके अर्थ उसके साक्ष्य मृत दिमाग में
असाक्ष्य भाव से गतिशील होते हैं
और जब तक गति है
पाना है
खोना है
घड़े के पानी की तरह !
घड़ा यदि भरा रह जाए
तो कोई प्यासा रह गया - तय है
कालांतर में जल पीने योग्य नहीं रहा
तो सहज भाव से रिक्त होना है
ताकि फिर भर सकें !
................
सूर्य के अस्त होने में ही उदय भाव है
और प्रकृति की नवीन गतिशीलता .......

28 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद गहन रचना दी......
    समझ रही हूँ....गहरे उतर रही हूँ....और डूबती जा रही हूँ.........

    सादर
    अनु

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  2. एक अकथनीय सूक्ष्मता को प्रगाढ़ शब्द देती अति प्रभावी रचना..

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  3. वाह... वाकई घड़ा का खाली होना जरुरी है प्यास बुझाने के लिए.... अस्त में उदय का भाव... बेहतरीन...

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  4. पूरा ही जीवन ...गति पर निर्धारित है ...
    एक और खूबसूरत रचना

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  5. सच है गति पर ही हमारा आज कल और खोना पाना छुपा है..गहन रचना..आभार

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  6. गहन और उत्तम रचना...हमेशा की तरह

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  7. जीवन क्रम है चलते जाना है.बहुत सुन्दर.

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  8. घड़े के पानी की तरह !
    घड़ा यदि भरा रह जाए
    तो कोई प्यासा रह गया - तय है
    कालांतर में जल पीने योग्य नहीं रहा
    तो सहज भाव से रिक्त होना है
    ताकि फिर भर सकें !

    सटीक उदाहरण .... कितनी गहन बात काही है इन पंक्तियों में.... खुद को पाना भी कहाँ सहज है ?

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  9. और पूर्णता के लिए निरंतरता तब तक ज़रूरी है
    जब तक साँसें हैं !
    न प्रश्न, न उत्तर
    स्व की क्रिया प्रतिक्रिया
    आतंरिक होती है,,,,,

    उत्कृष्ट प्रभावी रचना..,,,,,

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  10. बहुत गहन विचार, स्वयं को पहचानने का खोज आध्यात्मिकता का प्रथम सोपान है.

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  11. बहुत गहन विचार, स्वयं को पहचानने का खोज आध्यात्मिकता का प्रथम सोपान है.

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  12. बहुत सुन्दर शब्दों में गहन पोस्ट....शानदार ।

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  13. सूर्य के अस्त होने में ही उदय भाव है
    और प्रकृति की नवीन गतिशीलता ..

    क्योंकि ठहराव तो मौत है

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  14. सूर्य के अस्त होने में ही उदय भाव है
    और प्रकृति की नवीन गतिशीलता .......yahi sty hai

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  15. आपकी इस उत्कृष्ट प्रस्तुति की चर्चा कल मंगलवार ९/१०/१२ को चर्चाकारा राजेश कुमारी द्वारा चर्चामंच पर की जायेगी

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  16. नवीनता के लिए पुरातन को त्यागना जरूरी है...नई काया के लिए जीर्ण का त्याग...खोना पाना गति ...सब तभी है जब तक जीवन है|
    हम भी थोड़ा-थोड़ा दार्शनिकता की ओर बढ़ रहे हैः)

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  17. घड़े के पानी की तरह !
    घड़ा यदि भरा रह जाए
    तो कोई प्यासा रह गया - तय है
    कालांतर में जल पीने योग्य नहीं रहा
    तो सहज भाव से रिक्त होना है
    ताकि फिर भर सकें !

    गहन भाव

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  18. पाना है
    खोना है
    घड़े के पानी की तरह !
    घड़ा यदि भरा रह जाए
    तो कोई प्यासा रह गया - तय है
    कितनी गहरी सोच
    आपकी लेखनी को सादर नमन

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  19. सूर्य के अस्त होने में ही उदय भाव है
    और प्रकृति की नवीन गतिशीलता ......

    यही ज़िंदगी है.परिवर्तन ही सच है.

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  20. गहन भाव लिए अति उत्तम रचना ..
    :-)

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  21. गहन आत्म-मंथन!
    अनुपम श्रेष्ठ रचना..

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  22. घड़े के पानी की तरह !
    घड़ा यदि भरा रह जाए
    तो कोई प्यासा रह गया - तय है
    कालांतर में जल पीने योग्य नहीं रहा
    तो सहज भाव से रिक्त होना है
    ताकि फिर भर सकें !
    ................
    सूर्य के अस्त होने में ही उदय भाव है
    और प्रकृति की नवीन गतिशीलता .......
    बहुत गहन अभिव्यक्ति दी ....!!

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  23. घड़ा यदि भरा रह जाए
    तो कोई प्यासा रह गया - तय है
    कालांतर में जल पीने योग्य नहीं रहा
    तो सहज भाव से रिक्त होना है
    ताकि फिर भर सकें !

    गहरे पानी पैठ के लिखा है रश्मि जी ।

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