12 जून, 2014

असली जीवन शब्दों में असली मृत्यु शब्दों से !





जिन पर शब्दों का जादू चलता है,
वे शाब्दिक अस्त्र से मारे जाते हैं
शब्द खुद ही होते हैं द्रोण - एकलव्य
अर्जुन-कर्ण
सारथि-भीष्म
शब्द ही पासे
शब्द ही शकुनि
शब्द ही करते हैं चीरहरण
शब्द ही संकल्प उठाते हैं
शब्द ही चक्रव्यूह - अभिमन्यु
और मारक प्रिय जन
असली जीवन शब्दों में
असली मृत्यु शब्दों से !

हास्य एक मृदु रिश्ता भी
हास्य मखौल भी
शब्द और शब्दों के साथ चेहरा
गहन शाब्दिक मायने देते हैं
शब्द शब्द सहलाता है मौन होकर
तो शब्द शब्द नश्तर भी चुभोता है मौन हाहाकार कर
हँसता है शब्द विद्रूप हँसी
रोता है शब्द कातर होकर
शब्दों की अमीरी
शब्दों की गरीबी
आदमी को आदमी बनाती है
आदमी को प्रश्न बनाती है
आदमी को हैवान दिखाती है

तो - शब्दों के ब्रह्ममुहूर्त से
प्रार्थना के शब्द लो
अर्घ्य में अमृत से शब्दों का संकल्प लो
फिर दिन की,जीवन की शुरुआत करो  … 

30 मई, 2014

बंधन और बाँध - में फर्क है !



कोई बंधन में डाले
या हम स्वयं एक बाँध बनाएँ
- दोनों में फर्क है !
तीसरा कोई भी जब रेखा खींचता है
तो उसे मिटाने की तीव्र इच्छा होती है
न मिटा पाए
तो एक समय आता है
जब वह बोझ लगने लगता है !
प्यार, विश्वास का रिश्ता हो
हम उसकी महत्ता समझें
तो हम स्वयं बंध जाते हैं
कोई रेखा खींचने की ज़रूरत नहीं होती !
प्यार और अंकुश का अंतर समझना चाहिए  …
अंकुश की ज़रूरत
वो भी एक हद तक
बचपन में ही होती है
उसके बाद का प्रयास व्यक्ति को
अनायास उच्चश्रृंखल बना देता है
झूठ की उतपत्ति होती है
सम्मान खत्म हो जाता है
....
शर्त,वादे क्यूँ ?
जीतकर क्या ?
वादे ? - न निभाया जाए
तो याद दिलाने
चीखने-चिल्लाने से भी क्या ?
 हम चाहें
तो बिना किसी वादे के
बहुत कुछ कर सकते हैं  !
यह चाह अपनी होती है
यदि कोई और करवाए
फिर - आज न कल
विस्फोटक स्थिति आती ही है !
संस्कार
उदहारण
सब एक विशेष उम्र तक ही दिए जाते हैं
बाद में व्यक्ति स्वयं उदहारण होता है
जय या क्षय का  …

23 मई, 2014

याद है …?


याद है तुम्हें ?
जब पहली बार हमारा परिचय हुआ
तुम खुद में थी
मैं खुद में
फिर भी हम साथ चल पड़े थे  …

याद है न  …

तुम्हें याद है ?
तुम्हारे टिफिन और मेरे टिफिन में कितना फर्क होता था
तुम पूरियाँ लाती थी
मैं रोटी
तुम्हारे टिफिन से खाना मुझे अच्छा लगता था
लेकिन मेरी रोटियों को तुम नहीं छूती थी
मुझे गुस्सा आता
बुरा लगता
और मैं गर्व से कहती
- स्वास्थ्य के लिए यह अच्छा है
तुम्हारी पूरियों को कई बार मैंने भी ठुकराया  …

याद है न  …

क्या कहूँ ?
तुम्हारी सेहत भरी ज्ञान के आगे
मेरी पूरियों का मज़ा किरकिरा हो जाता था !
खैर छोड़ो,
वो समय कितना अच्छा था
विद्यालय का वार्षिक कार्यक्रम था
तुम मद्रासन लड़की बनी थी
मैं काश्मीरी
हम खाने की चीजें बेच रहे थे
खेल में हमने शतरंज चुना
हाहाहा - दो ही थे हम
तुम फर्स्ट हुई
मैं सेकेण्ड
रंगमंच पर जो काव्य-गोष्ठी हुई
तुम हरिवंशराय बच्चन बनी
मैं नीरज
कितना खुशनुमा था सबकुछ - है न ?

हाँ,  …।
आज भी वर्तमान सा सब याद आता है !
पर उसके बाद हम अपनी पढ़ाई को लेकर अलग हो गए
पर डाकिया हमारे खत
एक-दूसरे को देता था

वक़्त द्रुत गति से भागता गया  ....
अब हम सास हैं,नानी-दादी हैं
पर इन झुर्रियों की अनुभवी रेखाओं के पीछे
आज भी वह अल्हड़ शरारती लड़की है
जो बिना शरारत किये नहीं रहती थी  …
… याद है न ?
हाहाहाहा बिलकुल याद है

19 मई, 2014

पहले कोशिश करो



तुमने देखी है दुनिया,
महसूस किया है प्रकृति को,
खुली हवा में ध्यान किया है,
सूक्ष्म से सूक्ष्मतर की तलाश भी की है 
पढ़ा है बहुतों को 
लिखा भी है बहुतों को 
आओ आज एक दिन के लिए हेलेन कीलर बनो 
एक अँधेरे कमरे में बन्द हो जाओ 
कोई सुराख न हो रौशनी की  
बंद कर लो कान 
जिह्वा को कैद कर दो 
और पंछी के परों पर रखो हथेलियाँ 
गर्मी से सूखे होठों पर 
पानी की एक 
बस एक बूंद रखो 
………………फिर  सन्नाटे को बिंधती अपनी धड़कनो के साथ 
उसे सोचो  … सोचते जाओ 
शायद पूरे आकाश का आभास हो 
या पूरी नदी का 
छोड़ दो  खुद को निःशब्द अँधेरे समंदर में  … 
… हेलेन कीलर तो नहीं हो सकोगे 
पर पंछी के परों की अद्भुत व्याख़्या कर सकोगे 
पानी की शीतलता रूह तक जानोगे 
एक अंश हेलेन की दुनिया लिख सकोगे - 
वो भी शायद !
पढ़ना, लिखना, और जीना - 
तीन आयाम हैं - तीनों अलग 
सुनना, और उसे दुहराना - पूरी कहानी बदल जाती है 
…
हम न एक जैसा देखते हैं 
न एक जैसा पढ़कर, सुनकर लेते हैं 
फिर हेलेन का शाब्दिक चित्र कैसे बना सकते हैं  ?
एक अंश हुबहू के करीब जाने के लिए 
वक़्त,परिवेश  … बहुत कुछ खोना पड़ता है 
पहले यह तो कोशिश करो !

12 मई, 2014

आम और खास से परे - सच कहा न ?



मैं आम नहीं
पर उसी समूह में रहती हूँ
दिन और रात को जीने के लिए !
मैं खास भी नहीं
जिसे तुम नाम से पहचान लो …
मैं -
आम और खास से परे एक रहस्य हूँ !
ढाल लिया है मैंने अपने आप को
एक किताब में
जिसके पन्नों से आवाज आती है  …
मैं एक बोलनेवाली किताब हूँ
जिसे तुम चाहोगे पढ़ना
पर वह तुम्हें सुनाई देगा
वह भी, मेरी आवाज में !
तुम पढ़कर सुनाना भी चाहो किसी को
तो तुम्हारी धड़कनों से प्रतिध्वनित होकर
तुम्हारे स्वर में मेरी ही आवाज गूँजेगी  !
मेरे शब्द तुम्हारे अन्तर में समाहित होकर
उसकी बनावट बदल देंगे
तब तक -
जब तक तुम मुझे पढ़ोगे
और सोचोगे
… अतिशयोक्ति नहीं होगी
यदि कहूँ
कि खुद को ढूँढ़ते रह जाओगे !
उदहारण ले लो -
प्रेम !
कहते हैं लोग,
प्रेम फूल और भँवरा है
यह कथन
मात्र एक अल्हड़ उम्र का ख्याल है
उस उम्र से आगे
समय कहता है
प्रेम ईश्वर भी है,राक्षस भी
प्रेम अनश्वर है तो नश्वर भी
चयन तुम्हारा
नियति तुम्हारी
परिणाम अदृश्य  …
विश्वास हो तो भी प्रेम मर जाता है
शक हो तो भी प्रेम जी लेता है
प्रेम वक़्त का मोहताज नहीं
प्रेम अकेला भी सफ़र कर लेता है
कोई प्रेम के बाद भी प्रेम करता है
तार्किक अस्त्र-शस्त्रों से
सही होता है
पूर्ण होता है
दूसरी तरफ
कोई एक प्रेम का स्नान कर अधूरा होता है !
हम क्या चाहते हैं, क्या नहीं चाह्ते
इससे अलग एक पटरी होती है ज़िन्दगी की
जिसके समतल-ढलाव का ज्ञान मौके पर होता है
दुर्घटना - तुम्हारी असफलता हो
ज़रूरी नहीं
अक्सर सफलता के द्वार उसके बाद ही खुलते हैं
.... पर अगर तुमने असफलता को स्वीकार कर लिया
तो मुमकिन है
सफलता तुम्हारे दरवाजे तक आकर
बिना किसी दस्तक के लौट जाये !
आश्चर्य की बात मत करो
हतोत्साहित सिर्फ़ तुम नहीं होते
सफलता भी हतोत्साहित होती है
उसका इंतजार न हो
तो वह अपना रूख मोड़ लेती है !
पाना-खोना
हमारे परोक्ष और अपरोक्ष सत्य पर निर्भर है !
तुम-हम जो सोचते और देखते हैं
वह सच हो - मुमकिन नहीं
.... सच को देखना
सच का होना
दृष्टि,मन, मस्तिष्क की चाक पर
घूमता रहता है
रुई की तरह धुनता जाता है
अंततः जब उसका तेज समक्ष होता है
उसकी तलाश में रहनेवाले गुम हो जाते हैं
या याददाश्त कमजोर हो जाती है
या  … सत्य अर्थहीन हो जाता है !
आँख बंद होते
जिस सच को हम सजहता से कह-सुन के
स्वीकार करते हैं
वहाँ शरीर से पृथक हुई आत्मा
अट्टाहास करती है
फिर सिसकती है
इस अट्टाहास और रुदन में कई अबोले सच होते हैँ
जो दिल की धड़कन रोक कर
शरीर को साथ ले जाते हैं !
मैंने उस अट्टाहास और रुदन के बीच
अपने आप को एक गहरी खाई में देखा है
पहाड़ों से टकराकर आती प्रतिध्वनित सिसकियों में
स्नान किया है
फिर रेत में विलीन शब्द ढूँढे हैँ
एहसासों की चाक पर उन्हें आकृति दी है
… जो पूर्ण नहीं होते
कोई न कोई हिस्सा टेढ़ा रह जाता है
या दरका हुआ
पर शायद जीवन की पूर्णता इसी अपूर्णता में है
क्यूँ ? सच कहा न ?

08 मई, 2014

पाप पुण्य से परे



जीवन में सच हो या झूठ
- दोनों की अपनी अपनी कटुता है !

सच को अक्षरशः कहना संभव नहीँ होता
बात सिर्फ साहस की नहीं
दुविधा मर्यादा की होती है  …
फिर झूठ से सच की निर्मम हत्या हो ही जाती है !
सच सिर्फ़ यह नहीं
कि - सात फेरे सात वचन निभाने चाहिए
सच यह है कि इसे निभाने के लिए
झूठ की ऊँगली थामे
98 प्रतिशत लोग झूठे चेहरे लिए
चलते हैं,जीते हैं -
समाज,
परिवार,
बच्चे  .... इन कटु सच्चाईयों के लिए
और यह स्त्री-पुरुष दोनों की विडंबना है  !.
कारण भी पूर्णतः नहीं बता सकते
कभी जिह्वा कटती है
कभी हिम्मत नहीं होती
और कभी कहने की जुर्रत की
तो विरोध की हिकारत
- 'इस तरह खुद को जलील करने की ज़रूरत क्या है ?'
चुप्पी में सच की दर्दनाक स्थिति
हँसी में झूठ की निर्लज्जता
'काहू बिधि चैन नहीं'
…
हादसों का सच !!!
कौन कह पाता है ?
 खुलासे से तबीयत बिगड़ जाती है
यूँ भी खुलासे में सिर्फ़ अश्लीलता होती है
दर्द मर चुका होता है !
लोग नहीं जानें - इस ख्याल में
शहर बदल जाता है
नाम बदल जाता है
.... पूरा परिवेश बदल जाता है !
अंदर में सच हथौड़े चलाता है
झूठ
पत्थर और जीवन के बीच
भटकता जाता है !
…।
सच और झूठ - दोनों की अपनी मजबूरियाँ हैँ
पाप-पुण्य से परे

24 अप्रैल, 2014

ये जीना भी कोई जीना है !!!




हम जो बोलते हैं
उसे तौलते भी जाते हैं
मन इंगित करता रहता है
-ये है सही और ये गलत
गलत को दिखाती मन की ऊँगली
हम धीरे से हटा देते हैं
या फिर तर्कों से भरा ज़िद्दी अध्याय खोल लेते हैं
अपनी बात रखते हुए
सही को काटते हुए
अंततः हम वहाँ पहुँच जाते हैं
जहाँ से लौटना अपमानजनक लगने लगता है !
तटस्थता में हम घुटने लगने लगते हैं
'यह मेरी गलती थी' - इसे कहने में वर्षों लगा देते हैं
जानते हुए भी
कि इसकी घुटन हमें ही जीने नहीं दे रही !!
गलती का एक रास्ता भारी पड़ता है
फिर क्यूँ दोराहे, चौराहे बनाना ?
ज़िद्द की कोई उम्र नहीं होती
वह तो वही दम तोड़ देती है
जहाँ वह जन्म लेती है !
मृत भावनाओं को पालने से
उसकी राक्षसी भूख मिटाने से
कुछ नहीं मिलता
सिवाए बंजर जमीन के
और वहाँ कोई मृगतृष्णा भी नहीं होती
सारे जीवनदायी भ्रम तक खत्म हो जाते हैं
साँसें चलती हैं
तो जी लेते हैं
पर ये जीना भी कोई जीना है !!!

11 अप्रैल, 2014

किसे ?






एक लम्बी सी चिट्ठी लिखना चाहती हूँ 
बहुत कुछ लिखना चाहती हूँ 
पर कोई ऐसा नाम जेहन में नहीं 
जिससे धाराप्रवाह सबकुछ कह सकूँ  … 
 चीख लिखूँ 
 डर लिखूँ 
सहमे हुए सन्नाटे लिखूँ 
सूखे आँसुओं की नमी लिखूँ 
बेवजह की खिलखिलाहट लिखूँ 
लिखूँ आँखों में उतरे सपने  … 
सोच रही हूँ नाम 
कौन होगा वह 
जो बिना किसी प्रश्न,तर्क कुतर्क के 
पढ़ेगा मेरी चिट्ठी 
और समझेगा !
कुछ दूर चलकर ही 
सुनने-समझने की दिशा बदल जाती है 
क्योंकि हर आदमी 
अपना प्रभावशाली वक्तव्य सुनाना चाहता है !
चिट्ठी छोटी सही 
छोटा सा मेसेज ही सही 
पढ़ने की फुर्सत नहीं 
पढ़ने लगे,सुनने लगे 
तो सलाह-मशविरे बीच से ही शुरू 
- पूरा कोई नहीं पढता 
सुनना तो बहुत दूर की बात है -
ज़िन्दगी स्केट्स पर है 
यह काम,वह काम 
यह ज़रूरत,वह ज़रूरत 
भावनाओं को समझने की बात दूर 
कोई सुनता भी नहीं 
भावनाएँ - बकवास हैं !
फिर प्रश्न तो है न कि 
अपनी बकवास किसे सुनाऊँ ?!

01 अप्रैल, 2014

नफ़रत से विरक्ति




नफ़रत ....!!!
हुई थी एकबारगी मुझे भी
शायद उम्र का तकाजा था !
पर जैसे जैसे उम्र
या शायद अनुभवों की उम्र बढ़ी
मैंने खुद को टटोला
नफ़रत का कोई अंश नहीं मिला
व्यक्ति,स्थान,परिस्थिति..
जिनसे मुझे नफरत हुई थी
उनका नामोनिशां तक नहीं मिला
तब जाना -
उन सब से मुझे विरक्ति हो गई
!
न स्थान बदलता है
न परिस्थिति
न व्यक्ति ....
तो उदासीन,विरक्त होना ही जीने की कला है
प्रतिक्रिया से परे
न उसकी उपस्थिति असर डाले
न अनुपस्थिति
.....
नफ़रत एक आग है
जो बुझती नहीं
और जब तक वह जलती है
न हम खुद को जी पाते हैं
न दूसरों के जीने को सहज ढंग से ले पाते हैं
तो इस आग से विरक्त होना श्रेयष्कर है
विरक्त मन निर्विकार हो जाता है
और निष्क्रियता सक्रियता में बदल जाती है ...
....
आसान नहीं होता
पर समय के हथौड़े
अंततः बेअसर होने को बाध्य कर देते हैं
या ..... हम याददाश्त को बदल लेते हैं !
कारण जो भी हो ...
नफरत बीमारी है
और प्राकृतिक सोच की दवा विरक्ति
जहाँ सच सच होता है
झूठ .......... एक मुस्कान दे जाता है
और कभी कभी खिलखिलाहट -
सुकून होता है - कि मोह और वैराग्य दोनों का पलड़ा बराबर है !!!

16 मार्च, 2014

तुम्हारे नाम हस्ताक्षर



कुछ खुमारी में डूबे शब्द हैं 
कुछ अंगड़ाई लेते पल 
कुछ दिन हैं, कुछ शाम 
कुछ सुबह, कुछ जागी रात 
एक ही दिशा में अटके कुछ ख्याल 
कुछ धरती, कुछ आकाश 
चुटकी भर क्षितिज का मिलन 
पंछियों की उड़ान 
कबूतर की गुटरगूं 
…………… सपनों का मिश्रीवाला घर 
जलतरंग की मीठी धुन 
लहरों का आवेग 
नदी की कलकल ध्वनि 
संध्या की धीमी रागिनी 
पलकों का टिपिर टिपिर मटकना 
गौरैये का फुदकना 
मुर्गे की बाँग 
आम बौर की मादक सुगंध 
थोड़ी फागुनी भांग 
…… 
मेरा बचपन 
मुझमें जीनेवाली सपनोवाली लड़की 
बारिश में नंगे पाँव छप छप दौड़ती लड़की 
खुले बाल हवा में इठलाती लड़की 
तुम्हारे नाम अपने हस्ताक्षर करती है 
अपने सुकून के लिए !
संभव है -
 तुम्हें ज़रूरत न हो 
फिर भी ख्यालों की प्यास बुझाने के लिए 
और कालांतर में समझने के लिए 
… हस्ताक्षर का क्या हुआ !!!
 है एक हस्ताक्षर - तुम्हारे नाम 

12 मार्च, 2014

अंतर्द्वंद !



'अपशब्द' दिलोदिमाग में नहीं उभरते
ऐसी बात नहीं
पर कंठ से नहीं निकलते
व्यक्तित्व के गले में अवरुद्ध हो जाते हैं !
'जैसे को तैसा' ना हो
तो मन की कायरता दुत्कारती है
पर वक़्त जब आता है
तब  .... एक ही प्रश्न कौंधता है
'इससे क्या मिल जाएगा !'
सही-गलत के बीच
मन पिसता जाता है
अपने ही सवाल हथौड़े सी चोट करते हैं -
'क्या यह गलत को
अन्याय को बढ़ावा देना नहीं ?'
मन का एक कोना हकलाते हुए कहता है
'क्या फर्क रह जाएगा फिर उसमें और मुझमें !'
यह आदर्श है ?
संस्कार है ?
या है पलायन ?
रही बात रिश्तों को निभाने की
तो एकतरफा रिश्ते होते कहाँ हैं !
इसी उधेड़बुन में उड़ जाती हैं रातों की नींदें
'हैल्युसिनेशन' होता है
हर जगह 'मैं' कटघरे में खड़ा दिखता है !
मन न्यायाधीश
मन गवाह
आरोप-प्रत्यारोप - आजीवन !
सच भी बोला है,
झूठ भी  …
सच कहूँ तो पलड़ा बराबर है
तो,
मैं भी तो पूर्णतया सही नहीं
बस अपशब्द कहने की गुस्ताखी कभी नहीं की !
क्या सच में कभी नहीं ???

प्रीतम एंड पेद्रो

 कभी किसी से माफ़ी मांग लो,कभी किसी को माफ़ कर भी दो... यही शायद प्रीतम एंड पेद्रो की सबसे बड़ी सीख है। यह फिल्म सिर्फ़ एक कहानी नहीं सुनाती...