हमने अपनी क़लम की दुनिया ब्लॉग से शुरू की थी। वह समय ऐसा था जैसे किसी शांत दोपहरी में अपनी डायरी खुली छोड़ दी जाए और कोई अनदेखा पाठक चुपचाप उसे पढ़कर कोने में 'सुंदर' लिख जाए। ब्लॉग पर लिखना, पढ़ना, टिप्पणी करना - सब एक संस्कार की तरह था। शब्दों का लेन-देन होता था, भावनाओं का व्यापार नहीं।
उस दौर में जो भी लिखा जाता, वह विचार होता था । प्रतिक्रिया भी विचार ही होती थी। कमेंट बॉक्स में बहस होती थी, बहसबाज़ी नहीं। मर्यादा लक्ष्मण रेखा नहीं, बल्कि स्वभाव थी।
फिर हम पहुंचे Orkut पर। वहां मित्रता का प्रस्ताव “फ्रेंड रिक्वेस्ट” कहलाता था और अस्वीकृति भी शांति से स्वीकार ली जाती थी। स्क्रैपबुक में संदेश छोड़ना ऐसा था जैसे किसी के दरवाज़े पर्ची चिपका देना - पढ़े तो अच्छा, न पढ़े तो भी शिकायत नहीं।
इसके बाद आया Facebook। अब दुनिया थोड़ी और खुल गई। ब्लॉग का नशा बहुत हद तक कम हुआ, क्योंकि यहां प्रतिक्रिया तुरंत मिलने लगी। लाइक की संख्या ने विचारों की गुणवत्ता पर हल्का-सा कुहासा डालना शुरू किया। और वहीं से इनबॉक्स में एक सर्वकालिक शाश्वत शब्द का जन्म हुआ -
“हाय…”
इसके साथ प्रश्नों की एक पोटली आती
“क्या करते हो?”
“कहां से हो?”
“दिनचर्या?”
इन प्रश्नों का उद्देश्य उतना ही स्पष्ट होता था जितना सरकारी फ़ॉर्म में 'अन्य' का कॉलम।
और तभी डिजिटल देवताओं ने अगला उत्सव उतारा
Instagram।
यह प्लेटफ़ॉर्म कम, चलती-फिरती प्रदर्शनी अधिक है। यहां लोग बोलते कम हैं, दिखाते अधिक हैं। शब्द छोटे हुए, स्टोरी चौबीस घंटे में समाप्त होने लगी, और धैर्य पंद्रह सेकंड का रह गया।
मैंने भी सोचा कला से जुड़े लोगों को फ़ॉलो करना चाहिए, उन्होंने भी किया... एक परस्पर सम्मान जैसा भाव बना।
पर कुछेक को जैसे ही फ़ॉलो बैक किया, इनबॉक्स ने फिर दस्तक दी,
“हाय…”
संस्कारों ने कहा - नमस्ते लिख दो।
मैंने लिखा।
उत्तर आया — “हाँ, तो कुछ बोलो!!!”
अब यह आधुनिक संवाद शास्त्र का नया सूत्र है,
प्रारंभ वह करेगा, विस्तार आप करेंगे।
उत्सुकता उसकी होगी, उत्तरदायित्व आपका।
ऐसे क्षणों में मेरे मस्तिष्क में सचमुच टॉम और जेरी दौड़ने लगते हैं। एक कहता है 'सहनशील बनो।' दूसरा कहता है - 'ब्लॉक बटन भी ईश्वर का ही दिया वरदान है।' और मैं मध्यम मार्ग चुनती हूँ - न क्रोध, न संवाद।
दरअसल, समस्या 'हाय' की नहीं है। समस्या उस अपेक्षा में है कि सामने वाला अनजाना व्यक्ति तत्क्षण आत्मीयता का दरवाज़ा खोल दे। फ़ॉलो का अर्थ मित्रता, मित्रता का अर्थ उपलब्धता, और उपलब्धता का अर्थ उत्तरदायित्व - यह गणित डिजिटल युग ने गढ़ा है, जो मेरी समझ में कभी आया ही नहीं।
ब्लॉग ने हमें धैर्य सिखाया,
ऑर्कुट ने परिचय सिखाया,
फेसबुक ने प्रतिक्रिया सिखाई,
इंस्टाग्राम ने प्रस्तुति सिखाई ।
पर शिष्टाचार?
वह अब भी ऑफलाइन ही डाउनलोड होता है।
खैर अब मैं 'हाय' को निजी आपातकाल नहीं मानती। इनबॉक्स एक सार्वजनिक चौक है, पर हर आवाज़ पर ध्यान देना आवश्यक नहीं है। कुछ संवाद महत्वपूर्ण होते हैं, बाकी नोटिफिकेशन।
डिजिटल दुनिया बदलती जा रही है, पर मैंने एक बात नहीं बदली - लिखना।
क्योंकि शोर चाहे जितना भी हो,शब्द यदि सधे हुए हैं, तो वे अपना रास्ता बना ही लेते हैं।
रश्मि प्रभा