18 अगस्त, 2025

गंगा

गंगा !

तुम परंपरा से बंधकर बहती, 

स्त्री तो हो

किंतु परंपरा से अलग जाकर 

अबला अर्थ नहीं वहन करती 

वो रुपवती धारा हो

जिसका वेग 

कभी लुप्त नहीं होता ।

हां, किनारों का साथ पाकर

तुम ठहर जरुर जाती हो,

पर वह ठहराव,

तुम्हारे भीतर बहते सत्य को

कम नहीं करता।

शिव ने तुम्हें अपनी जटाओं में बांधा,

तुमने स्वयं को संयमित किया 

पर जब त्रिनेत्र खुला,

 तांडव की लय फूटी,

तब तुम्हारा प्रचंड प्रवाह

किसी के वश में नहीं रहा।

तुम मेरे भीतर की वही शक्ति हो

जो धैर्य रखती है,

पर समय आने पर

अपने सम्पूर्ण रूप में

सब कुछ बहा ले जाने की क्षमता से अनभिज्ञ नहीं रहती ।


रश्मि प्रभा

8 टिप्‍पणियां:

  1. स्त्री और गंगा...वाह्ह.. बेहद सुंदर अभिव्यक्ति।
    सादर।
    -----
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार १९ अगस्त २०२५ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  2. वाक़ई नारी गौरी भी है और काली भी

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  3. नारी के इस रूप को सादर प्रणाम... बहुत सुंदर

    जवाब देंहटाएं
  4. आपने अपनी कविता में गंगा को सिर्फ नदी नहीं, एक जीवंत स्त्री की तरह दिखाया है, जो अपने भीतर शक्ति, धैर्य और विद्रोह तीनों रखती है। मुझे खासतौर पर वह हिस्सा पसंद आया जहाँ आप ठहराव को कमजोरी नहीं, बल्कि संतुलन मानते हो।

    जवाब देंहटाएं

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