
समय कहता रहा
मैं सुनती रही
समझा तब -
जब सुनामी से बचे अपने विचारों से
मेरी पहचान हुई !
वक़्त को रोकने की कोशिशों मेंकई पल कई दिन
कई महीने कई साल गुजर गए
तब जाना - फिसलते वक़्त
बस याद बन रुकते हैं हर बार !
खाली मन से
अनायास उमड़ते आंसुओं को रोक
यादों को चूम
मैंने हर कमरे में
पूजा की जगह पर इनको रखा
और उनके साथ खुद को सहज किया !
पर यह सोच हमेशा रखती हूँ ..
अगली बार... हाँ अगली बार
वक़्त को कसके मुट्ठी में बांधूंगी !
जानते हुए भी -
कि न रात रूकती है न सुबह
न दिन न शाम
फिर भी !!!....










