
तुम जब कुछ कहते हो
तो अनायास वह संवाद तुम्हारा
तुम्हारे स्व से होने लगता है
कथ्य भी तुम
जवाब भी तुम !
आश्चर्य की बात नहीं
बिल्कुल सहज बात है
तुम्हें भी पता है सही गलत
तुम जानते हो मेरी भी दृढ़ता
और अचानक तुम्हारे अन्दर
कुछ गिरने लगता है
वह कुछ तुम्हारा ही स्वत्व ....
मैं सहजता के लिए खामोश रहती हूँ
फिर मोड़ देती हूँ बातों की दिशा
क्योंकि मुझे अच्छा नहीं लगता
तुम्हारा खुद को खुद से सफाई देना !
तुम्हारी कमजोरी मुझे मालूम है
तुम्हारे हर बदलते तेवर की पहचान भी मुझे है
.... मुझे मालूम है विचलित शब्दों की
अन्यमनस्क दशा
तो मुझे सही लगता है अपना मौन
क्योंकि अगर कुछ भी कहा ..
तो तुम्हारे मन की ही शक्ल ले लूँगी
और तब बुरा होगा !
मन तो अन्दर ही अन्दर सवाल खड़े करता है
मन के लिबास में मैं
सुनाई देने लगूंगी
और तब तुम सारी चीजें पलट दोगे
गतांक से तुलना करने लगोगे
और मैं ... एक कतरा और खो जाऊँगी
क्योंकि मेरे किसी गतांक में तुम नहीं
तो मैं भी नहीं ...
.............
हमारे हिस्से तो महज पगडंडियाँ थीं
जिन्हें हम अर्थ नहीं दे सके
रास्ते बनाना मुमकिन नहीं हुआ ...
लेकिन पगडंडियों पर 'उसकी' कृपा रही
तभी
'वह ' अपनी हथेली की लकीरों में
उन पगडंडियों को लेकर आया
अब हमें उन लकीरों को रास्ते बनाने हैं
यानि 'उसकी' हथेली पर चलना है !
मेरे भीतर कोई सवाल नहीं
स्पष्ट हैं दिशाएं
प्रयोजन तो 'उसने' खड़े किये हैं
तर्क कैसा और किससे ?
तो अच्छी लगने लगी है
फिर ये ख़ामोशी .......
रास्ते बने तो बेहतर
वरना पगडंडियाँ तो आज भी अपनी ही हैं !!!



प्रेम मुखर कभी
हरि के विराट स्वरुप सा 
पौ फटा , सूरज उगा
........... क्या नाम दूँ उसे ?




