09 अगस्त, 2012

!!! ये तो मैं हूँ !!!





आज मैं उस मकान के आगे हूँ
जहाँ जाने की मनाही थी
सबने कहा था -
मत जाना उधर
कमरे के आस पास
कभी तुतलाने की आवाज़ आती है
कभी कोई पुकार
कभी पायल की छम छम
कभी गीत
कभी सिसकियाँ
कभी कराहट
तो कभी बेचैन आहटें .....
..............
मनाही हो तो मन
उत्सुकता की हदें पार करने लगता है
रातों की नींद अटकलों में गुजर जाती है
किंचित इधर उधर देखकर
उधर ही देखता है
जहाँ जाने की मनाही होती है !
...........
आज मन की ऊँगली पकड़
और मन ने मेरी ऊँगली पकड़
एकांत में उधर चल पड़े
जहाँ डर की बंदिशें थीं हिदायतों में ...
.........
मकान के आगे मैं - मेरा मन
और अवाक दृष्टि हमारी
यह तो वही घर है
जिसे हम अपनी पर्णकुटी मानते थे
जहाँ परियां सपनों के बीज बोती थीं
और राजकुमार घोड़े पर चढ़कर आता था
....
धीरे से खोला मैंने फूलों भरा गेट
एक आवाज़ आई -
'बोल बोल बंसरी भिक्षा मिलेगी
कैसे बोलूं रे जोगी मेरी अम्मा सुनेगी '
!!! ये तो मैं हूँ !!!
आँखों में हसरतें उमड़ पड़ी खुद को देखने की
दौड़ पड़ी .... सारे कमरे स्वतः खुल गए
मेरी रूह को मेरा इंतज़ार था
इतना सशक्त इंतज़ार !
कभी हंसकर , कभी रोकर
कभी गा कर ......
बचपन से युवा होते हर कदम और हथेलियों के निशां
कुछ दीवारों पर
कुछ फर्श पर , कुछ खिड़कियों पर थे जादुई बटन की तरह
एक बटन दबाया तो आवाज़ आई
- एक चिड़िया आई दाना लेके फुर्र्र्रर्र्र...
दूसरे बटन पर ....
मीत मेरे क्या सुना , जा रहे हो तुम यहाँ से
और लौटोगे न फिर तुम .....'
यादों के हर कमरे खुशनुमा हो उठे थे
और मन भी !
..... कभी कभी .... या कई बार
हम यूँ हीं डर जाते हैं
और यादों के निशां पुकारते पुकारते थक जाते हैं
अनजानी आवाजें हमारी ही होती हैं
खंडहर होते मकान पुनर्जीवन की चाह में
सिसकने लगते हैं
...... भूत तो भूत ही होते हैं
यदि हम उनसे दरकिनार हो जाएँ
मकड़ी के जाले लग जाएँ तो ....
किस्से कहानियां बनते देर नहीं लगती
पास जाओ तो समझ आता है
कि - ये तो मैं हूँ !!!

36 टिप्‍पणियां:

  1. अंतरात्मा की आवाज को भी हम अक्सर अनसुना कर देते हैं...

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  2. मनाही हो तो मन
    उत्सुकता की हदें पार करने लगता है
    रातों की नींद अटकलों में गुजर जाती है
    किंचित इधर उधर देखकर
    उधर ही देखता है
    जहाँ जाने की मनाही होती है !
    ...........
    खंडहर होते मकान पुनर्जीवन की चाह में
    सिसकने लगते हैं
    ....अह्हह्ह अक्षर अक्षर सच और अनुभव के लिबास को पहने .....

    उत्तर देंहटाएं
  3. .. भुत तो भूत ही होते हैं
    यदि हम उनसे दरकिनार हो जाएँ
    मकड़ी के जाले लग जाएँ तो ....
    किससे कहानियां बनते देर नहीं लगती
    पास जाओ तो समझ आता है
    कि - ये तो मैं हूँ !!!खुद से मिलना ,साक्षात्कार करना अच्छा रहा ,बढ़िया प्रस्तुति "ये तो मैं हूँ "कृपया "भुत " को भूत और किससे को क़िस्से कर लें.शुकिया और यहाँ भी दस्तक आपकी ज़रूरी है -
    बृहस्पतिवार, 9 अगस्त 2012
    औरतों के लिए भी है काइरोप्रेक्टिक चिकित्सा प्रणाली
    औरतों के लिए भी है काइरोप्रेक्टिक चिकित्सा प्रणाली

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  4. और यादों के निशां पुकारते पुकारते थक जाते हैं
    अनजानी आवाजें हमारी ही होती हैं
    खंडहर होते मकान पुनर्जीवन की चाह में
    सिसकने लगते हैं
    ...... भुत तो भूत ही होते हैं
    यदि हम उनसे दरकिनार हो जाएँ
    मकड़ी के जाले लग जाएँ तो ....
    किससे कहानियां बनते देर नहीं लगती
    पास जाओ तो समझ आता है
    कि - ये तो मैं हूँ !!!ji ...sahi hai ...dhyan me aksar ek badaa sa makaan dikhaaii deta hain ..vahaa par pahuchne se achchha lagta ..lagta hai jaese vah mere purv jnm ka gha r ho ..lekin aapne bataayaa ..aesa kuchh nahi vah to ham khud hote hai ..bahut khub

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  5. अपने से बात करते करते लगता है कि अपने ही खंडहरों में पहुँच गये..

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  6. आँखों में हसरतें उमड़ पड़ी खुद को देखने की
    दौड़ पड़ी .... सारे कमरे स्वतः खुल गए
    मेरी रूह को मेरा इंतज़ार था
    इतना सशक्त इंतज़ार !
    :)

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  7. बेहतरीन कविता ....खुद में ही खो जाने पर यह स्थिति भी आ ही जाती है.....

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  8. मनाही हो तो मन
    उत्सुकता की हदें पार करने लगता है
    ये तो मैं हूँ !!!

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  9. बहुत सुंदर रचना
    कम ही ऐसी रचनाएं पढने को मिलती हैं

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  10. आपकी कविता को पढ़ने के बाद बहुत देर तक ऐसे ही चुपचाप बैठी में अपने बचपन वाले घर में वैसे ही घूम आई जैसे मैं उस वक्त घूमा करती थी


    वो मकान अब खँडहर भी नहीं हैं शेष ...

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  11. सशक्त सुंदर अभिव्यक्ति,,,,

    श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ
    RECENT POST ...: पांच सौ के नोट में.....

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  12. खंडहर होते मकान पुनर्जीवन की चाह में
    सिसकने लगते हैं...

    bahut sundar bhaav

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  13. भूत को भूत बनने से बचाकर वर्त्तमान में आकर आपने जिस मकान का दरवाजा खोला है, परमात्मा करे उसमें भटकती उस "मैं" को मुक्ति मिले और शान्ति नसीब हो!! हे परमात्मा मंजूर कर मेरी प्रार्थना!!

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  14. मनाही हो तो मन
    उत्सुकता की हदें पार करने लगता है...
    बिलकुल सही कहा,आपने.जिस काम से करने को रोका जाए ,वही करने का मन करता है

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  15. बहुत ही बेहतरीन और प्रभावपूर्ण रचना....
    जन्माष्टमी की शुभकामनाएँ
    मेरे ब्लॉग

    जीवन विचार
    पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  16. ब्लॉग जगत के सभी मित्रों को कान्हा जी के जन्मदिवस की हार्दिक बधाइयां ..
    हम सभी के जीवन में कृष्ण जी का आशीर्वाद सदा रहे...
    जय श्री कृष्ण ..
    kalamdaan

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  17. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति.
    अदभुत अनुभूति का अनुभव कराती.



    ऐसी लागी लगन, मीरा हो गयी मगन
    वो तो गली गली हरि गुण गाने लगी...

    श्रीकृष्णजन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ,रश्मि जी.

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  18. बहुत सुन्दर कविता है ...असल में इंसान को जान ना हो तो उसके बचपन को जानना समझाना चाहिए ..बाकी जो दिखता है वो तो सिर्फ मुखौटा है .जो ओढ़ते हैं हम , बचाने दुनिया से , उस शिशु को जो सहमा रहता है हमारे ह्रदय के सबसे नाजुक कोने में

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  19. कभी कभी बंद दरवाज़ों पर हुई दस्तक जीने के सबब दे जाती है।

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  20. उत्सुकता की हदें पार करके ही अपना जहां खुलता है फिर उसी में हम गुम भी हो जाते हैं..

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  21. बड़ा सुखद होगा अपने आप से मिलना....
    जाने कब मिल पाऊं...

    सादर
    अनु

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  22. खंडहर होते मकान पुनर्जीवन की चाह में
    सिसकने लगते हैं...वाह: बहुत सुन्दर.......श्रीकृष्णजन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ,रश्मि जी.

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  23. किसी काम की मनाही हो मन उत्सुकता की सभी सीमा लांघने की कोशिश करता है ...सच्ची )
    स्वयं को पाया तो जाना कि स्वयं को कितना खोया !!

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  24. भूत से नहीं...अब जिंदा आदमी से डर ज्यादा है...पता नहीं वो क्या सोच रहा है...क्या कह रहा है...और क्या करेगा...साहेब...

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  25. बहुत बढ़िया प्रेरक प्रस्तुति ..
    आभार

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  26. mann ki baat...sehajta se...ye bhi bas aap hi kar sakti hain

    abhaar

    naaz

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  27. मनाही हो तो मन
    उत्सुकता की हदें पार करने लगता है

    यह मानवीय प्रवृति ही है ...

    आँखों में हसरतें उमड़ पड़ी खुद को देखने की
    दौड़ पड़ी .... सारे कमरे स्वतः खुल गए
    मेरी रूह को मेरा इंतज़ार था
    इतना सशक्त इंतज़ार !

    अद्भुत .... बस मैं भी आपके साथ खंडहरों मेंघूम आई हूँ ॥

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  28. बचपन की पुकार अनजानी लगती है और हम डर जाते हैं. क्योंकि वक्त के साथ हम खुद से ही बहुत दूर जा चुके होते हैं. एक बार अतीत को झांके तो पता चले कि ये तो मेरी ही आत्मा है... बहुत सुन्दर, बधाई.

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  29. अध्यात्म कि ओर ले जाती सार्थक अभिवयक्ति......

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  30. मनाही हो तो मन
    उत्सुकता की हदें पार करने लगता है
    रातों की नींद अटकलों में गुजर जाती है
    किंचित इधर उधर देखकर
    उधर ही देखता है
    जहाँ जाने की मनाही होती है !
    सबके मन का सच ... सशक्‍त भावों के साथ उत्‍कृष्‍ट प्रस्‍तुति ...आभार

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  31. मन तो वैसे ही विद्रोही होता है .. जो न करो वही करता है ... दर्शन का पुट लिए सुन्दर रचना ...

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