26 मार्च, 2011

तुम्हारे लिए !



वह सन्नाटा
जो तेरे दिल में नदी की तरह बहता है
उसके पानी से मैं हर दिन
अपने एहसासों का घड़ा भरती हूँ
उस पानी की छुवन से
मिट्टी से एहसास नम होते हैं
और तेरे चेहरे की सोंधी खुशबू
उस घड़े से आती है ...

दूर दूर तक खाली तैरती
तुम्हारी पुतलियों को
अक्सर मैंने छुआ है यह सोचकर
कि कुछ ना सही
मेरे स्पर्श की लोरी तो तुम्हें मिल जाये !

वो जिन यादों की पोटली खोल
तुम मुस्कुराते हो
उस मुस्कान को
और देर तक रखने की ख्वाहिश में
मैं धीरे से कुछ यादें
उस पोटली में छुपा आती हूँ ...

जब जब तुम्हें लगता है
तुम बदल गए हो
मैं बचपन की मोहक गलियों से
वह सारे सपने ले आती हूँ
जिनको मैंने जागकर बुने थे - तुम्हारे लिए !

पहाड़ों के आगे 'माँ' कहकर जब भी पुकारोगे
प्रतिध्वनि बन माँ की अनुगूँज
तुम्हारे रोम रोम में प्रवाहित होगी
और पहाड़ों से देव स्वर सजीव हो उठेंगे ..

सोचो यह कितनी बड़ी बात है
अकेले में इस जादू को
बस तुम देख सकते हो ...!!!

22 मार्च, 2011

सत्य की जीत



पायल उतार दबे पाँव
तुम हर रोज मेरे घर आती हो
हर कमरे का मुआयना करती हो
और आखिरी सूई निकालने के क्रम में
मेरी डायरी के पन्नों से
कुछ शब्दों की चोरी करती हो
और कुछ अल्फाज़ आईने से ...
मैंने एक कैमरा लगा रखा है
अपनी दहलीज़ पर
न भी लगाऊं तो भी
तुम जो एहसास उकेरती हो
उसके पैरों के निशान
मेरे कमरे में मिल जाते हैं
जो हर राज़ खोलते हैं !
ना ना
आश्चर्य से आँखें ना बड़ी करो
घबराओ भी मत -
मैं तुम्हारी तरह
पीछे से वार नहीं करुँगी
ना ही कोई छद्म रूप लूँगी ...
तुम्हें एक बात बताऊँ ,
यह घर मेरा है
इसमें झाड़फानूस नहीं लगे हैं
बस भावनाओं की दीवारें हैं
...
इन दीवारों को खुरचकर
तुम भावनाओं की नाव नहीं चला सकती
क्योंकि जब भी तुम खुद चलोगी
सच्चाई सामने होगी ...
भूलना नहीं
बाज़ी अंग्रेजों की नहीं
भारतीयों की दृढ़ता ही काम आती है
जीत सत्य की ही होती है !

21 मार्च, 2011

प्रेम



.........
जोड़े थे दिन उँगलियों पर
बड़ी ऐंठन हुई थी अन्दर
फिर धीरे धीरे मान लिया था मैंने
प्यार एक इबादत है
ज़रूरी नहीं कि इबादत करने पर
खुदा आँखें खोल ही दे !
..........
फिर मैंने अपने चेहरे के आईने से
तेरा अक्स हटा दिया
पर मन की स्लेट से
तेरे नाम को मिटाना आसान न था
यूँ कहो
मुझे गवारा न था
.....
अपनी धड़कनों में मैंने तेरा नाम
मंत्र की तरह
धड़कने को छोड़ दिया
अच्छा लगता था
बेखबर अपनी दुनिया में
बेमानी ठहाके लगाते तुम
मेरे भीतर ही धड़कते हो !
.........
दिल पर रखकर हाथ
मैंने वह हर हौसला लिया तुमसे
जिन्हें तुम सोच भी नहीं सकते थे
...
दुनिया भला क्या हिसाब करेगी इसका
वह तो रुद्राक्ष के 108 मनके में
प्रभु का नाम लेने में भटकती है
खामखाह उसने आँखों में पट्टी बाँध
खुद को कानून की मूर्ति बना लिया
उन्हें क्या मालूम -
प्रेम किसी की नहीं सुनता
प्रेम आत्मा है
और आत्मा में प्रवेश संभव ही नहीं !
.......
उन्हें क्या मालूम
प्रेम का लक्ष्य प्रेम है
वह जब भी अपनी प्रत्यंचा खींचता है
दिशाएं पिघलकर नदी की तरह बहती हैं
और बंजर धरती में
हरियाली दिखती है ...

18 मार्च, 2011

'रंग दूँ तुम्हें ....






होली का आना
और बहाना
लग जाये अबीर मांग में
भाव ऐसा
कि भूले से भर गई मांग !....
और चेहरे की रंगत
एक ख्याल दे जाये - साथ होने का !
उस उम्र में फागुन की गंध में
अल्ल्हड़ता की भांग मिली होती थी
एक चुटकी अबीर
आईने में चेहरे को कैद कर देती थी
....
फागुन के आते
आज भी वो चेहरा आईने से झांकता है
एक चुटकी अबीर गालों पे
और मांग में -( भूले से )... याद दिलाता है
वह रंग बड़ा पक्का था
उम्र का नशा बड़ा गहरा था
तभी तो खिलखिलाते हुए थाम कर हाथ
आज भी कोई कहता है
'रंग दूँ तुम्हें ....'

16 मार्च, 2011

कुछ और की चाह !



पेन्ट जो सालों चलता है
जिसका बाह्य सौन्दर्य आकर्षित करता है
सीमेंट भी जिसके अन्दर पक्के होते हैं
होती हैं ख़ास ईंटें
उस मकान को
कोई घर नहीं बना पाता
न वक़्त होता है न सुकून
मोटे गद्दों पर बेचैन करवटें लेता इन्सान
कई मंजिलों से नीचे देखता है हतप्रभ
टूटी फूटी झोपडी का इन्सान
खुली ज़मीन पर
कैसे इतने सुकून से सोता है !
उसे भी भरनी होती है फीस
कमाए गए चंद रुपयों से
निकलते हैं उसके घर से
इंजिनियर , डॉ०, ....बड़े आराम से
....कैसे होता है यह चमत्कार
मुट्ठियों में रूपये मसलते वह सोचता रहता है
जब उत्तर में कुछ हाथ नहीं आता
या प्रतिस्पर्धा का जवाब रास नहीं आता
तो फिर
सुबह अपनी लम्बी सी कार में
हिकारत से उन्हें देखता
वह सर्र से निकल जाता है
... कुछ और की चाह में !




02 मार्च, 2011

भूमिका कैसी !



तुम्हारे माथे पर उभरे स्वेद कण
तुम्हारी आवाज़ का कम्पन
तुम्हारी लम्बी साँसें
और इर्द गिर्द मकड़ी के जाले
और ......
इस और के मध्य कई एहसास हैं
कुछ कहे कुछ अनकहे
पर जो भी है
पसीनों की बूंदों संग बह रहा है !
मैं चाहती हूँ इन कणों को आँचल में भरना
सच की मौन दृष्टि से साँसों को थामना
लेकिन इस जाल को हटाना तुम्हारे ऊपर है
जब तक इसे हटाओगे नहीं
प्रश्नों के उत्तर मिलेंगे नहीं
और सबकुछ करके भी
नगण्य कहे जाओगे !
हाँ हाँ आसान है कहना ,
कि 'सब ठीक है '
भूलो मत गुरु की वाणी
.... गुरु ने कभी नहीं कहा
कि सबकुछ समय पर छोड़ दो
और खुद को बीमार कर लो !
.... पौधों को दीर्घायु बनाने की खातिर
कीटनाशक दवा भी देनी होती है
तेज धूप , गर्म हवा , आँधी तूफ़ान से
बचाना होता है
याद रखो ...
सकारात्मक सुबह के लिए
अक्सर सकारात्मक कदम ही उठाने होते हैं
ज़बरदस्ती भूखे रहकर तो हम
भगवान् की आराधना भी मन से नहीं कर पाते
फिर जिस जीवन चक्र को ईश्वर ने बारीकी से बनाया है
उसे झूठी हँसी से सकारात्मक बनाना मुमकिन नहीं
.....
भूमिका तो वे बनाते हैं जिन्हें ज़मीन खींचनी होती है
जिनकी ज़मीन है
उनके लिए भूमिका कैसी !

25 फ़रवरी, 2011

कशिश




माना - ज़िन्दगी भाग रही है
माना - कहीं कोई ठहराव नहीं है
माना - भौतिकवादी हो गए हैं सब
माना - good morning से good night तक कोई तालमेल नहीं रहा
माना - भावनाओं से पेट की आग नहीं बुझती
माना - "स्व" की संकुचित भाषा पैनी हो गयी है

पर मानो -

आज भी ॐ से शुभप्रभात की ज्योत जलती है
आज भी आशीर्वाद की ज़रूरत है
आज भी ज़रूरत है उन भावनाओं की
जो दूसरो की भूख को समझते हैं
आज भी, इस भाग-दौड़ में
कई विस्मित,खाली आँखें कुछ ढूंढ रही हैं
आज भी, मेहमान को देवता मानने वाले दुर्बल शरीर हैं
आज भी कुछ घरों से कोई खाली हाथ नही जाता
आज भी,
जिसे तुम राख मान रहे हो
उसके अन्दर अब भी चिंगारी है
संस्कारों के पदचिह्न आज भी हैं,
मूल्यांकन की तदबीर आज भी है
और मानो
आज भी इसमें ही कशिश है....

20 फ़रवरी, 2011

फिर एक युग का इंतज़ार



खबर क्या आई
'कृष्ण आ रहे हैं .....'
अल्हड़ उम्र सी
निकल पड़ी थी राधा
बृज की गलियों में
पायल पहन छम छम
बिखरा बिखरा रूप
पसीने की कुछ बूंदें चेहरे पर
सुधबुध खोयी , बावली सी
....
आज भी कुछ आँखें थीं साथ
बातें थीं ज़ुबान में
ठिठकी थी राधा
लौटी वर्तमान में .....
संभाला खुद को
अपने मान के सर पे आँचल रखा
खामोश सी धूल उड़ते रास्ते के किनारे
वृक्ष की ओट लिए खड़ी हो गई ....
...
'मुझसे मिले बगैर कृष्ण की यात्रा अधूरी होगी'
सोचकर आँखें मूंद लीं
प्रतीक्षा के पल पलकों का कम्पन बन गए
कृष्ण के नाम के पूर्व अपने नाम को रटती
प्रेममई राधा कैसे विश्वास तजती
.....
किसी सहेली ने झकझोरा ...
'कृष्ण मथुरा लौट रहे ;'
सन्नाटे सी चित्रलिखित राधा ने
पलकें उठाईं
भरमाई सी
खुद में बिखरती हुई
' कान्हा'
बस यही तो कह पाई ,
कृष्ण की एक झलक ...एक पल
और फिर एक युग का इंतज़ार
....

14 फ़रवरी, 2011

आओ एक अपना घर बना लें हम भी !



कच्ची मिटटी से
जो ख़्वाब कल बनाए थे,
चलो आज पका लें उनको
आओ एक अपना घर बना लें हम भी !

रिश्तों की उम्र बड़ी छोटी है
कोई एक पल के लिए
कोई दो पल के लिए
वक़्त खो जाये उससे पहले
आओ एक अपना घर बना लें हम भी !

आदतन कोई वादा मत करना
वादे कभी साथ नहीं चलते
वक़्त जब सामने खड़ा होता है
अपना ही ऐतबार होता है
वादे टूट जाएँ उससे पहले
आओ एक अपना घर बना लें हम भी !

कितने सालों दिन महीनों से
हरी पगडंडियों के पाँव भी मचलते हैं
सितारे आसमां से लटके हैं
हवाएँ खिलखिलाके चलती हैं
जाने कब आखिरी मौसम आए
आओ एक अपना घर बना लें हम भी !

10 फ़रवरी, 2011

पहले जी लो ..



सत्य से भाग कर क्या होगा
खुद को उलझाकर क्या होगा
दिल जो चाहता है
वही करो
दिल के आगे कभी हार नहीं होती ...
कारण किसी को मत बनाओ
क्योंकि कोई भी कारण
किसी की प्रतीक्षा नहीं करता

हाँ उस रौशनी पर यकीन रखो
जो तुम्हारे बिना चाहे भी
तुम्हें राह दिखाती है
अनवरत जलती रहती है !

अपने स्व की तुष्टि के आगे
वक़्त जाया मत करो
एहसान से ऊपर
आईने में खुद को देखो
क्या हर एहसान
तुम्हारा अभिमान नहीं है
या खुद को जिंदा रखने का अभियान ?

अक्सर मरे हुओं को पाने के लिए
तुम खुदा को बुत बना देते हो
फिर उसके होने का प्रमाण मांगते हो
सोचो ....
क्या तुम हो ?

तुम तो अप्राप्य के पीछे
प्राप्य से अलग दौड़ लगा रहे हो
खुद को दोष ना देकर
दूसरों को कारण बता रहे हो
हर धागे से खुद को खुद ही उलझाकर
उसे तोड़ते जा रहे हो

...दिल कभी गूंगा नहीं होता
शोर से परे उसकी सुनो
मरने से पहले जी लो ...

15 जनवरी, 2011

ब्रैंडेड चादर



धूप सिमटी पड़ी है
सूरज की बाहों में
कुहासे की चादर डाल
अधखुली आँखों से मुस्कुराती है ...
थरथराते हाथों से अलाव जला
सबने मिन्नतें की हैं धूप से
बाहर आ जाने की ...
अल्हड़ नायिका सी धूप
सूरज की आगोश में
कुनमुनाकर कहती है -
'साल में दो बार ही तो
बमुश्किल यह सौभाग्य जागता है
... कैसे गँवा दूँ !'
सूरज ने बावली धूप के प्यार में
कई दिनों का अवकाश ले रक्खा है
.......
कुहासे की चादर भी ब्रैंडेड है !!!

प्रीतम एंड पेद्रो

 कभी किसी से माफ़ी मांग लो,कभी किसी को माफ़ कर भी दो... यही शायद प्रीतम एंड पेद्रो की सबसे बड़ी सीख है। यह फिल्म सिर्फ़ एक कहानी नहीं सुनाती...