03 जनवरी, 2014

लोग !





लोग पूछते हैं - नकारात्मक सोच क्यों है तुम्हारी ?
प्रश्नों से अनमना हुआ मन सोचता है
-  इसका जवाब तो लोग ही अच्छी तरह दे सकते हैं !
लोग,
हर कदम के आगे नकारात्मक स्थिति पैदा करते हैं
तब तक
जब तक खुद पर संदेह न होने लगे !
और संदेह होते ही सबक
- आरम्भ से पहले ही अविश्वास सही नहीं  …
ये लोग,
आज तक मेरी समझ से बाहर रहे
जब डरोगे तो धिक्कारेंगे -'इस डर के आगे कौन मदद करेगा!'
और डर पर भविष्य की लगाम डालकर
तिनके सा हौसला
बरगद की जड़ों सा दिखाओगे
तो माथे पर बल डालकर यही सवाल करेंगे -
'यह सही होगा?
ज़िन्दगी बहुत लम्बी होती है  …
मुश्किलें कहीं भी किसी भी रूप में आ सकती हैं
जितनी आसानी से हम निर्णय लेते हैं
ज़िन्दगी उतनी ही कठिन
और रहस्यात्मक होती है '  ....
वाकई -
मैंने लोगों से अधिक ज़िन्दगी को कठिन नहीं पाया
और रहस्य जो भी थे
उसके पीछे शुभचिंतक लोगों के घातक चेहरे थे
जिनकी रहस्यात्मक मंशा यही रही
कि जिसके घर पर बिजली गिरी है
वह घर जलकर राख हो जाए
ताकि
शायद राख से कोई मुनाफा हो जाए
न भी हो तो आगे के लिए कोई कहानी तो होगी !
लोग !

29 दिसंबर, 2013

कितने दोहरे मापदंड !





व्यक्ति व्यक्ति से बने समाज के 
कितने दोहरे मापदंड हैं !
पत्नी की मृत्यु होते 
उम्र से परे,बच्चों से परे 
पति के एकाकी जीवन की चिंता करता है 
खाना-बच्चे तो बहाना होते हैं 
.... 
पत्नी पर जब हाथ उठाता है पति 
तो समवेत स्वर में प्रायः सभी कहते हैं 
"ज़िद्दी औरत है 
…………"
किसी अन्य स्त्री से जुड़ जाए पति 
तो पत्नी में खोट !
पत्नी को बच्चा न हो 
तो बाँझ' बनी वह तिरस्कृत बोल सुनती है 
दासी बनी दूसरी औरत को स्वीकार करती है 
वंश" के नाम पर !

वंश' भी पुत्र से !!!

निःसंदेह, पुरुष एक ताकत है 
शरीर से सक्षम 
पर स्त्री के मन की ताकत को अनदेखा कैसे कर सकते हैं !
या फिर कैसे उस अबला (!!!) के साथ 
न्याय को बदल देते हैं ?

जिस वंश को 9 महीने खुद की शक्ति देती है स्त्री 
और मृत्यु समकक्ष दर्द से जूझकर 
जिसे धरती पर लाती है 
जिसके रुदन को अपने सीने में जब्त करती है 
और प्राणों में ममता का सामर्थ्य भरती है 
उसके साथ सोच की हर कड़ी दूसरा रूप लेती है  .... 

पति की मृत्यु - स्त्री अभागी 
किसी का बेटा खा गई !
विवाह कर लिया तो कलंकिनी !
खुद की रक्षा में हाथ उठा दिया 
तब तो राक्षसी !
पति बच्चा नहीं दे सकता 
तो उसकी इज्जत पत्नी की ख़ामोशी में 
!!!!!!!!!!!!!
परिवार स्त्री-पुरुष से 
समाज स्त्री-पुरुष से 
संतान स्त्री-पुरुष से 
तो कुछ गलत होने का कारण सिर्फ स्त्री क्यूँ ?

पुरुष रक्षक है स्त्री का 
पर जब भक्षक बन जाए 
तो स्त्री के प्रति नज़रिया क्यूँ बदल जाता है ?
कम उम्र में स्त्री विधवा हो जाए 
या तलाकशुदा 
तो उसके विवाह पर आपत्ति क्यूँ ?
उसकी जिंदगी में तो गिद्ध मँडराने लगते हैं 
ऊँगली उठाते लोग 
उसे खा जाने का मौका ढूँढ़ते हैं 
दूर की हटाओ 
घर बैठे रिश्तों की नियत बदल जाती है 
फिर यह दोहरा मापदंड क्यूँ ???

22 दिसंबर, 2013

प्राकृतिक उद्देश्य




मैं जमीन पर ही कल्पना करती हूँ 
जमीन पर ही जीती हूँ 
यूँ कई बार 
हौसलों की खातिर 
क्षितिज से मिल आती हूँ :) … 
ले आती हूँ थोड़ी चिंगारी 
जंगल में फैली आग से 
समेट लाती हूँ कुछ कतरे 
जमीन पर खड़े रहने के लिए 
जल,वायु,अग्नि,धरती - आकाश से  
सूरज से वाष्पित कर अपने को 
मैं आकाश से जमीन पर उतरती हूँ 
और गंगा बनने का हर सम्भव प्रयास करती हूँ  … 
क्षितिज खुले आकाश में 
धरती के सीने से दिखता है 
सूरज को मुट्ठी में भरने की ख्वाहिश 
धरती से होती है 
तो जमीनी कल्पना में ही 
मुझे जमीनी हकीकत मिलती है 
जमीनी ख़ुशी जमीनी दुःख 
जमीन से जुड़ा ज़मीर 
जमीन से उगती तक़दीर 
यही मेरी सम्पत्ति है 
इसी सम्पत्ति से मैं स्वयं का निर्माण करती हूँ 
और शिव की जटाओं से निःसृत होती हूँ 
……… धरती के गर्भ में पावन गंगा सी बहती हूँ 
जमीनी हकीकत जब पवित्र नहीं रह जाती 
तब काल्पनिक पाताल में अदृश्य हो 
शिव तांडव में प्रगट होती हूँ 
न स्वयं को खोती हूँ 
न स्वयं में खोती हूँ 
मैं जमीनी कल्पना और हकीकत के बीच 
निरंतर जागती हूँ 
भयाक्रांत करती लपटों से घिरकर 
अविचल 
कल्पनाओं का जाप 
हकीकत के तपिश में करती हूँ 
हकीकत का जीर्णोद्धार 
कल्पनाओं के रंगों से करते हुए 
सृष्टि के गर्भ में अदृश्य कारीगरों का आह्वान करती हूँ 
कल्पना और हकीकत को एकसार करने में 
मैं पल पल जीती हूँ 
पल पल अपने जन्म को एक काल्पनिक सार्थकता देते हुए 
मैं हकीकत के ऐतिहासिक पन्नों में उतरती हूँ 
कल्पना को हकीकत 
हकीकत को कल्पना 
- जमीन से जुड़ा मेरा प्राकृतिक उद्देश्य है 

15 दिसंबर, 2013

मौसम ....! और आदमी !!







मौसम  ....!
और आदमी  !
हर साल गर्मी,बारिश और ठण्ड का कहर होता है
टूटी झोपड़ियाँ,
फुटपाथ पर ठिठुरती ज़िन्दगी
हर साल की खबर है
मरनेवाला यूँ ही बेनाम मर जाता है  …
म्युंसिपैलिटी वाले ले जाते हैं लाश को
कई चेहरों की कोई शिनाख्त नहीं होती
ना ही होती है कोई फ़ाइल
जिसमें कोई पहचान हो

किसी गटर में होता है रोता हुआ बच्चा हर साल
लोग भीड़ लगाकर देखते हैं
बुद्धिजीवी बने कहते हैं
- लावारिस, होगा किसी का नाजायज पाप !
क्या सच में ?
बच्चे नाजायज होते हैं क्या ?
ओह ! यह प्रश्न मैं किसी से भी नहीं उठा रही
कर रही हूँ प्रलाप
क्योंकि हर साल जो घटित होता है
उसपर चर्चा कैसी !

बात तो इतनी है
कि गरीब न हो तो अमीर की पहचान कैसी
फुटपाथ पर कोई बेसहारा न हो
तो विषय क्या
बच्चे को नाजायज न कहें
तो नाजायज पिता की शादी कैसे होगी
जायज बच्चों की परवरिश कैसे होगी
और नाजायज माँ का जनाजा कैसे निकलेगा
या फिर वह नई नवेली अल्हड दुल्हन कैसे बनेगी !

घोटाले मौसम और आदमी के
हर साल होते हैं
बस आकड़े बढ़ते-बढ़ते हैं
घटने के आसार न कभी थे,न होंगे !!!

06 दिसंबर, 2013

कुछ झूठ कुछ लीपापोती सबसे बड़ी पूजा होती है






अम्मा का लिखा हर दिन टाइप करती हूँ  … 

जितनी बार किसी किताब को पढ़ो 
अर्थ उतने ही स्पष्ट होते हैं !
एक क्षण में हम निर्णयात्मक धारणा नहीं बना सकते 
यूँ वह तो वर्षों तक नहीं बनाया जा सकता 
क्योंकि हमारी किसी भी सोच में 
कई सोच का छौंक लगा होता है 
.... !!! पर, जब पूरी पुस्तक खत्म हो जाती है 
तो एक सार जो रह जाता है 
वह सिर्फ अपना होता है 
और वही सार उस व्यक्ति,उसके व्यक्तित्व की 
असलियत होती है - हमारे लिए !
हाँ तो रोज एक याद को टाइप करते 
मैं स्वतः अम्मा बन जाती हूँ (अगर तुम टाइप करो तो तुम भी बन जाओगे)
और साल 64 से 
एक विक्षिप्त माँ की सोच को 
जिसका 4 साल का बेटा 
कहकर गया -'ठहरो माँ,मैं अभी आया'
और  … 
हर सुबह,हर दिन 
हर शाम,हर रात महसूस करती हूँ !
.... 
ज़िन्दगी में जब हम किसी गहरे आघात से गुजरते हैं 
तो उसके छींटे 
ख़ुशी,दुःख सबमें नज़र आते हैं 
नहीं चाहते हुए भी कई बार मुँह से निकल जाता है !
इसमें सही-गलत की परिभाषा नहीं लागू हो सकती 
 क्योंकि थोडा-बहुत हर कोई इस रास्ते पर होता है 
.... 
पापा कहते थे -
किसी गहराई को मापने के लिए 
उस जगह खुद को रखो 
रखते रखते उम्र निकल गई 
और हम वहीँ अडिग नहीं खड़े रह सके 
जहाँ होना चाहिए था 
उल्टे हम उन लोगों की तरफ से बोलने लगे 
जिनकी नियत थी - हम उलझ जाएँ !
आह - 
हम उलझते गए 
और अपना मूल्यवान वक़्त खोते गए 
और सबकुछ होते हुए भी 
अम्मा की तरह खोने के गम जैसे धागे से 
कुछ बुनते गए 
यह कुछ - कितना खोखला है 
इससे न ठण्ड जाती है 
न ओढ़कर मीठे सपने आते हैं 
.... 
अब जाना, 
तुम भी जानो 
(सम्भवतः जानते भी होगे)
कि लीपापोती एक ज़रूरी पूजा है 
झूठ के अर्घ्य से यदि हम खुलकर हंस लेते हैं 
तो हर्ज ही क्या है मान लेने में 
!
ज़िन्दगी की चाल बड़ी तेज और रहस्यात्मक है 
कहीं जगमगाती धरती मिलती है 
तो कभी - एक क्षण में पैरों के नीचे से धरती हट जाती है 
किस उहापोह में हम अपने ही आगे मकड़ जाल बुन रहे हैं 
कौन फँसेगा ? 
फंस भी गया तो न हर्ष मना सकोगे 
न दुःख  … 
क्योंकि फिर हम तुम 
किसी और धारा में बह जायेंगे !!!!!!!!!!!!!!!!!!

श्रेष्ठता की चाभियों का गुच्छा 
कमर से लगाकर क्या होगा 
यदि एक झूठ को झूठ जानते हुए भी 
सच मानकर 
हम गले लगकर रो नहीं सके 
तो - सबकुछ व्यर्थ है 
रिश्तों की मजबूती धैर्य देती है 
और इसके लिए कुछ झूठ 
कुछ लीपापोती सबसे बड़ी पूजा होती है 
 

30 नवंबर, 2013

ज़िन्दगी फिर से चले !






रात गए नींद नहीं आती
उम्र का असर है
या अनुभवों का तनाव
घड़ी की टिक टिक की तरह
हर दौर की सीढ़ियाँ चढ़ती-उतरती हूँ
साँसें चढ़ जाती हैं
तो बचपन के तने से टेक लगा
बैठ जाती हूँ
आँखें दूर कहीं लक्ष्य साधती हैं
कभी चेहरे पर मुस्कान तैरती है
कभी भय
कभी उदासी
कभी  … निर्विकार होना ही पड़ता है !
.... !
बचपन के तने से टिके शरीर के मन में
कई सवाल उठते हैं
एक के बाद एक  .... लहरों की तरह !
मन से बड़ा समंदर और कहाँ
और उसमें मोती मिल जाए
तो बात ही अलग है !
हाँ तो इस समंदर की कई लहरों के बीच
एक लहर करती है तुमसे सवाल
- तुम तो बिना हाथ पकड़े नहीं चल पाती थी
तो गई कैसे ?
कितनी सीढ़ियाँ उतरनी पड़ी होंगी
डर भी लगा होगा
.... दूर दूर तक  …
हम होकर भी नहीं थे
फिर भी -
तुम चली गई !

साँस रुक जाने से कहानी खत्म हो जाती है क्या  ?
साँसों को रोकने का खेल तो हम बचपन से खेलते आये हैं
फिर ये क्या बात हुई
और कैसे - कि अब तुम नहीं कहीं !
मुझे शक़ होता है
तुम हमें जाँच रही हो  ....
मुझे विश्वास है - तुम पास में रहती हो खड़ी
कभी झुककर अपने मोबाइल पर लिखती हो कुछ
सेंड' नहीं कर पाती
हाथ हिलता है न तुम्हारा
तो ऑफ बटन दब जाता है
और तुम उकताकर लेट जाती हो  …।

सवाल सवाल सवाल  …… एक आता है
एक जाता है
कभी कुछ सकारात्मक ले जाता है
कभी कुछ नकारात्मक से ख्याल ले जाता है !
मन के समंदर के इस किनारे मैं
- चाहती हूँ
बन जाऊँ गोताखोर
सम्भव है मेरे ही मन के एक सीप में तुम मिल जाओ
और -
ज़िन्दगी फिर से चले !

इस बार हम एक एक कदम
सोच-समझकर उठायेंगे
उन लोगों से कोसों दूर रहेंगे
जिनका मन हम सा नहीं था
थोड़ी व्यवहारिकता भी लाएँगे अपने व्यवहार में
सिर्फ मन से चलते रहने पर
बहुत ठोकर लगती है
और खामखाह बीमारी
इलाज़
और अंत में - सबकुछ मानसिक कहा जाये
इस बात का एक भी मौका हम नहीं देंगे

आओ अब सो जाएँ !

23 नवंबर, 2013

लड़ना प्यार है





लड़ने से रिश्ते नहीं खत्म हो जाते  ...
शिकायत  होती ही रहती है आपस में
उसे मन में रखना
सड़ांध पैदा करता है  …
अगर नहीं कह सके अपनी बात
रोकर-झगड़ कर
तो मन के अंदर विषबेल  फैलता है  ....
यूँ भी
विष के बीज मन कभी नहीं बोता
उसे दूसरा कोई बोता है
....
ऐसे में छानबीन तो होनी चाहिए न
किसने भेजा,किसने लगाया
नाम मिल जाए तो पूछो उससे
सम्भव है, सारी बातें झूठी हों
और हम-तुम दूर हो गए हों !!
....
भाई बहन
माँ बच्चे
दोस्त
पति-पत्नी
प्रेम
…… इनसे ही तो लड़ाईयाँ होती हैं
क्योंकि इनसे प्यार होता है
ख़्वाबों जैसे प्यार की उम्मीद होती है
……
(बकवास करते हैं लोग
कि प्यार में उम्मीद नहीं होनी चाहिए )
रूठना-मनाना, फिर खिलखिलाना
इसकी साँसें होती हैं
किसी तीसरे की ज़रूरत नहीं होती
तीसरा !!!
सारी बातें बिगाड़ देता है
………
पर बातों को लड़कर
सवालों से
ठीक कर सकते हैं हम
कर भी लेते हैं
यही नोक-झोंक तो अनुपस्थिति में गहराती है
!!!
ज़िंदगी सवालों का पन्ना है
जो सबसे तेज होता है
उसी से हम सवाल पर सवाल करते हैं
उसकी हार पर खुश होते हैं
अपनी जीत पर इतराते हैं
!!! पन्ना गुम होते
न जीत,न हार  .... किससे लड़ें !
तो मानो -
लड़ना स्वास्थ्य के लिए दवा है
जो जोड़ता है
तोड़ता नहीं
जो तोड़ दे वह लड़ाई नहीं
एक विध्वंसात्मक सोच है !!!
....
इसी फर्क को समझना है
जुड़ने और तहस-नहस करके मिटा देने का  !!!!!!!!!!!!!!!

……… लड़ने से रिश्ते खत्म नहीं होते
न कोई गाँठ पड़ती है
मीलों की दूरी में भी नज़दीकियाँ होती हैं
जब हम एक कॉल,
मेसेज
और चिठ्ठी के लिए लड़ते हैं  …
लड़ना प्यार है
सिर्फ प्यार !

08 नवंबर, 2013

अम्मा तुम गीता का एक महत्वपूर्ण पन्ना हो




पहलू ….
किसी का भी एक नहीं होता
कृष्ण के भी कई पहलू हैं
अलग अलग पहलुओं का जिम्मेदार
न भगवान् होता है न इंसान !
कृष्ण के पहलू यशोदा की दृष्टि से जो होंगे
वो नन्द बाबा की दृष्टि से अलग ही होंगे
गोपिकाओं की अपनी बात
राधा का अपना प्रेम
ऊधो का अपना ज्ञान
ताड़का,कंस,शकुनी की अपनी सोच !
दुर्योधन ने तो बाँध लेने की धृष्टता दिखाई
कृष्ण के पहलू को कमज़ोर समझा !!
जिस कृष्ण के आगे पूरी सभा स्तब्ध थी
वहां दुर्योधन ने उन्हें 'ग्वाला' कहकर सोचा
कि वह श्रेष्ठ है !!!
कृष्ण तो गीता हैं
और मेरी अम्मा तुम उस गीता का एक महत्वपूर्ण पन्ना हो
जिसने पढ़ा ही नहीं
वह व्याख्या क्या करेगा
और कितनी करेगा !!!
हम तो गोपिकाओं की तरह तुम्हारी शिकायत भी करते रहे
और रहे प्रतीक्षित
कि कब तुम हमारी मटकी का उद्धार करो
ऊधो का ज्ञान हमारे लिए निरर्थक था
हम तो गोपिकाओं की झिड़कियों पर निहाल थे
…………।

अब जब तुम गोकुल छोड़ गई हो
तो जाना - तुम्हारे बिना कैसे रहेंगे !!!!!!!!!!!!!!!

25 अक्टूबर, 2013

उत्तर के बियाबान में बस सिर्फ तुम्हारी तलाश है !!!


आँचल की गांठ से 
चाभियों का गुच्छा हटा 
हर दिन 
तुम एक भ्रम बाँध लिया करती  
सोने से पहले 
सबकी आँखें पोछती 
थके शरीर के थके पोरों के बीच 
भ्रम की पट्टी बाँध  …
हमारे सपनों को विश्वास देती  
. !!!
अब जब भ्रम टूटा है 
सत्य का विकृत स्वरुप उभरा है 
तब  …
एथेंस का सत्यार्थी बनने का साहस 
तुम्हारे कमज़ोर शरीर के सबल अस्तित्व में 
पूर्णतः विलीन हो चुका है !
तुम सच कहा करती थी -
अगर हर बात से पर्दा हटा दिया जाये 
तो जीना मुश्किल हो जाये  …. 
तुम्हारे होते सच को उजागर करने की 
सच कहने-सुनने की 
एक जिद सी थी 
अब - एक प्रश्न है कुम्हलाया सा 
कि सच को पाकर  होगाभी क्या !!!
कांपते शरीर में 
न जाने कितनी बार 
कितने सत्य को तुमने आत्मसात किया 
दुह्स्वप्नों के शमशान में भयभीत घूमती रही 
और मोह में बैठी 
हमारे चमत्कृत कुछ करगुजरने की कहानियाँ सुनती गई 
जो कभी घटित नहीं होना था  … 
तुम्हारा सामर्थ्य ही मछली की आँखें थीं 
जो हमें अर्जुन बनाती 
तुम्हारी मुस्कान - हमारा कवच भी होतीं 
और हमारे मनोरथ की सारथि भी 
… अब तो न युद्ध है 
न प्रेम 
है - तो एक सन्नाटा 
जिसे मैं तुमसे मिली विरासत की खूबियों से 
तोड़ने का प्रयास करती हूँ 
…. 
कृष्ण,पितामह,कर्ण,अर्जुन,विदुर  …. 
सबकी मनोदशा चक्रव्यूह में अवाक है 
प्रश्नों का गांडीव हमने नीचे रख दिया है 
क्योंकि  ……
अब कहीं कोई प्रश्न शेष नहीं रहा 
उत्तर के बियाबान में हमें सिर्फ तुम्हारी तलाश है !!!

17 अक्टूबर, 2013

खोलो अपनी पिटारी



अपनी ख़ामोशी 
जो मैंने नहीं गढ़ी 
फिर भी 
वक़्त की माँग पर 
जिसे मैंने स्वीकार किया 
वहाँ मोह की आकृतियाँ 
मेरे कुछ कहने की प्रतीक्षा में बैठी होती हैं 
…. !
मैं तो बातों की पिटारी रही हूँ 
जब पिटारी में कुछ नहीं होता 
तो भी मनगढंत बातें सुनाती हूँ 
पता है मुझे -  
खालीपन कभी मुस्कुराता नहीं 
और मैंने हमेशा चाहा है 
कि शून्य में खिलखिलाहट भर जाए 
ताकि तुम्हारे एकांत में 
यादें मेरी बातों की 
तुम्हें गुदगुदा जाए 
तुम्हारा चेहरा खिल जाये 
और खालीपन भी आश्चर्य में पड़ जाये !!
…… 
गीत,कहानी,नकल,साहस, ……। 
जाने कितनी सारी बातें हैं 
फिर भी सन्नाटा !!!
एकटक देखती आँखों का इंतज़ार 
मैं समझती हूँ 
तभी तो आज  …………… 
दुलारती हूँ उन चेहरों को 
और कहती हूँ -
तुम भी तो कुछ कहो !
खोलो अपनी पिटारी 
कुछ नहीं तो वो जादू दिखाओ 
जो मैंने तुम्हें दिखाया,सिखाया 
गढ़ो कोई कहानी 
या कोई छोटी सी बात 
और खिलखिलाते जाओ मेरे संग 
तब तक 
जब तक 
झूठमुठ के खींचे गए सन्नाटे शर्मा न जाएँ 
डर कर भाग न जाएँ 
………………… 
पता है न 
पलक झपकते सारे दृश्य बदल जाते हैं 
इंतज़ार के सारे मौके ख़त्म हो जाते हैं 
और तब 
सन्नाटा बहुत भयानक होता है 
शून्य में कही अपनी बातें 
ख़ुद तक लौट आती हैं 
और  ……… !!!!!!!!
तो कहो कुछ तुम 
मैं तो पिटारी लिए खड़ी ही हूँ :)

06 अक्टूबर, 2013

समय और ईश्वर के आगे खुद को मुक्त कर दो





सन्देश तो बहुत मिले होंगे 
कुछ पोस्टकार्ड 
कुछ अंतर्देशीय 
कुछ लिफाफे 
कुछ मेल 
…………. पर 
आँखों की खामोश पुतलियों पर लिखे सन्देश 
मिले तुमको ?
किसी और ने गर पढ़ा भी 
तो क्या हुआ 
सन्देश के हर्फ़ तुम्हारे लिए थे 
तुम जानते हो - है न ? 

होठ सी लेने से 
अनभिज्ञता दिखाने से 
तुम मानते हो 
कि उसे मान लिया गया ?
नहीं  …. 
तुम्हारे चेहरे पर जाने कितने सन्देश हैं 
जिसे तुम्हारे अपने पढ़ते हैं 
अपने - जिनसे तुम्हारा रक्त सम्बन्ध है !
वे पढ़ते ही नहीं 
चुनते जाते हैं उन संदेशों को 
संभालकर रखने के लिए 
पर एक बार तुम्हें कहना होगा 
अपने होठों की सीलन खोलकर 
नाहक इधर-उधर भटकते क़दमों को रोककर !!!
…। 
यह समय का मौका है 
ईश्वर का करिश्मा है 
कि तुम्हारी बेचैनी एकत्रित हो गई है 
चुप्पी में जिस व्यक्तित्व को तुमने अनदेखा किया 
उसे बताने का वक़्त आ गया है 
एक विश्वास रखो -
क्षणांश को क्रोधित होकर भी 
प्यार की ताकत सबकुछ समेट लेती है 
परिस्थितिजन्य गलतियों पर 
स्नेहिल स्पर्श से क्षमा की अनुभूति देती है 
वे अपने - जो दूर नज़र आने लगे थे 
यक़ीनन उनका विश्वास - 
तुम्हें हँसने का 
बिलखकर रोने का 
कुछ भी कहने-सुनने का 
इत्मीनान भरा साहस देगी 
एक दूसरे की आँखों में उभरे संदेशों को 
बताने का मौका देगी  … 
बस-
समय और ईश्वर के आगे खुद को मुक्त कर दो 

प्रीतम एंड पेद्रो

 कभी किसी से माफ़ी मांग लो,कभी किसी को माफ़ कर भी दो... यही शायद प्रीतम एंड पेद्रो की सबसे बड़ी सीख है। यह फिल्म सिर्फ़ एक कहानी नहीं सुनाती...