12 नवंबर, 2019

मेरे सहयात्री




मन को बहलाने
और भरमाने के लिए
मैंने कुछ ताखों पर
तुम्हारे होने की बुनियाद रख दी ।
खुद में खुद से बातें करते हुए
मैंने उस होने में प्राण प्रतिष्ठा की,
फिर सहयात्री बन साथ चलने लगी,
चलाने लगी ...
लोगों ने कहा, पागल हो !
भ्रम में चलती हो,
बिना कोई नाम दिए,
कैसे कोई ख्याली बुत बना सकती हो !
लेकिन मैंने बनाया था तुम्हें
ईश्वर की मानिंद
तभी तो
कई बार तुम्हें तोड़ा,
और तुम जुड़े रहे,
किसी भी नाम से परे,
रहे मेरे सहयात्री,
मेरी हार-जीत का अर्थ बताते रहे,
शून्य की व्याख्या करते हुए
अपने साथ मुझे भी विराट
और सूक्ष्म बना दिया ।

12 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (13-11-2019) को      "गठबन्धन की नाव"   (चर्चा अंक- 3518)     पर भी होगी। 
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
     --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  

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  2. कई बार खुद का साथ होना ... किसी के नाम के साथ होना बहुत जरूरी हो जाता है जीवन में ... तन्हाईयाँ कचोटती हैं नही तो ...

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  3. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में बुधवार 13 नवम्बर 2019 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  4. लेकिन मैंने बनाया था तुम्हें
    ईश्वर की मानिंद
    तभी तो
    कई बार तुम्हें तोड़ा,
    और तुम जुड़े रहे,

    निःशब्द हो जाती हूँ आपकी भावाभिव्यक्ति पर

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  5. लाजवाब ... यात्रा जारी रखने की शुभकामना ।

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  6. इसी का नाम आत्मदर्शन है।
    ये विचार किसी गहरे में उतने वाले इंसान के हो सकते है।
    आप सुलझे हो मालूम पड़ते हैं।
    ऐसे ही अनछुए पहलू से अवगत कराते रहें।

    कुछ पंक्तियां आपकी नज़र 👉👉 ख़ाका 

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  7. कोई साथ है अपना कोई यह सहारा ही काफी होता है जिंदगी में
    बहुत अच्छी रचना

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