15 मई, 2020

हकीकत की शुक्रगुजार हूँ



सपने देखने में
उसके बीज बोने में
उसे सींचने में
आठवें रंग से उसे अद्भुत बनाने में
मैं सिर्फ माहिर नहीं थी
माहिर हूँ भी ...
दिल खोलकर मैंने
सबको अपने हिस्से का सपना दिया
देखने का
बोने का हौसला दिया
लेकिन उसमें अधिकतर
अनजान,घातक पंछी निकले,
सबने मेरे घर पर धावा बोल दिया,
उनको लगा,
कि बिना आर्थिक संपन्नता के
सम्भव नहीं यूँ बेमोल सपने दे देना,
हकीकत के खून से
उन सबने मेरे सपनों को
लहूलुहान कर दिया !
बरसों मैं खून के धब्बे मिटाती रही - सपनों से भीगी सोच से ।
कितने गोदाम खाली हुए,
पर मेरे सपनों के पन्नों ने
नए जिल्द से खुद को संवारा,
समझदारी की स्याही से
कहीं कहीं कुछ निशान बनाये,
जहाँ सपनों की अहमियत ना हो,
अनुमानों की फसल लहलहाए,
वहाँ से मैंने खुद को पीछे कर लिया...
वैसे कह सकते हो,
अनुमानों की भीड़ ने मुझे धकेल दिया ।
चोट लगी,
बड़ी गहरी चोट
लेकिन सपनों ने चोट की अहमियत बताई
मुट्ठी में नए बीज रखे
और उंगली पकड़कर
मेरी आँखों
मेरे मन की जमीन पर
सपने ही सपने बो दिए ।
इन सपनों की मासूमियत की बरकरारी में
मैं हकीकत की शुक्रगुजार हुई
जिसने मुझे बंजर जमीन से अलग कर दिया ... 

11 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन अभिव्यक्ति।

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  2. आठवाँ रंग सच में अद्भुत है ।

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  3. मैं हकीकत की शुक्रगुजार हुई
    जिसने मुझे बंजर जमीन से अलग कर दिया ...
    बहुत खूब!

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  4. लाजवाब सृजन! सपनो की सुंदर परछाई को आपने अपने से अलग ही नही किया,लाख परेशानियां आईं,चली गईं,सुंदर आशा का संचार करती उत्कृष्ट रचना ।

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  5. इन सपनों की मासूमियत की बरकरारी में
    मैं हकीकत की शुक्रगुजार हुई
    जिसने मुझे बंजर जमीन से अलग कर दिया ... आदरणीया मैम, बहुत ही सुंदर और प्रेरक रचना । हृदय से आभार इस सुंदर रचना के लिए जो हमें ना केवल स्वप्न देखना सिखाती है बल की उसे सत्य करना भी सिखाती है । प्रणाम ।

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  6. इन सपनों की मासूमियत की बरकरारी में
    मैं हकीकत की शुक्रगुजार हुई
    जिसने मुझे बंजर जमीन से अलग कर दिया ...
    बहुत सुंदर रश्मि जी! आशा पर संसार जीवित है। अच्छे बुरे अनुभवों से गुजर सपनों की फसल लहलहाती है। हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई 🙏🙏

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  7. दिल खोलकर मैंने
    सबको अपने हिस्से का सपना दिया
    देखने का
    बोने का हौसला दिया
    लेकिन उसमें अधिकतर
    अनजान,घातक पंछी निकले,
    सबने मेरे घर पर धावा बोल दिया,
    उनको लगा,
    कि बिना आर्थिक संपन्नता के
    सम्भव नहीं यूँ बेमोल सपने दे देना,
    यही विडम्बना है यहाँ देने वाले का शुक्रगुजार होने के बजाय उसे ही लूटने चलते हैं लोग...।
    मैं हकीकत की शुक्रगुजार हुई
    जिसने मुझे बंजर जमीन से अलग कर दिया ...
    चलो शुक्र है हकीकत का...वरना बंध्या में स्वप्न बोने से क्या लाभ...
    वैसे निश्छल मन से प्रेम बाँटने वालों की जहाँ में कद्र नही होती विधि उसे वहाँ से दूर ही कर देती है...
    लाजवाब सृजन।

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