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शोर से अधिक एकांत का असर होता है, शोर में एकांत नहीं सुनाई देता -पर एकांत मे काल,शोर,रिश्ते,प्रेम, दुश्मनी,मित्रता, लोभ,क्रोध, बेईमानी,चालाकी … सबके अस्तित्व मुखर हो सत्य कहते हैं ! शोर में मन जिन तत्वों को अस्वीकार करता है - एकांत में स्वीकार करना ही होता है
05 अप्रैल, 2008
असली रंग....
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02 अप्रैल, 2008
मानने की आदत नहीं....
एक मेज़,
कुछ कुर्सियाँ,
और लोग!
चाय की प्याली,
आलोचनाओं का दौर..........
इसने कहा,
उसने कहा,
और स्वनिष्कर्ष!
आलोचना का पात्र खडा है स्तब्ध,
मन की जिन परतों का ,
उसे ज्ञान तक नहीं -
उसे लोग कर रहे हैं सिद्ध...
है न अजीब बात!
नियति यह,
जो किया गया है सिद्ध,
उसे मान लो!
मत कहो कुछ,
कुछ मत कहो...
वर्ना,
फिर तैयार होंगी चाय की प्यालियाँ ,
चलेगा दौर-आलोचनाओं का,
कहेंगे लोग-
'मानने की आदत नहीं'।
01 अप्रैल, 2008
अच्छा किया.......
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28 मार्च, 2008
भैंस.......
27 मार्च, 2008
रहस्यमयी.....

एक लड़की-
१६ वर्ष की,
मन के अन्दर सिमटी रहती है...
पुरवा का हाथ पकड़
दौड़ती है खुले बालों मे
नंगे पाँव....
रिमझिम बारिश मे !
अबाध गति से हँसती है
कजरारी आंखो से,
इधर उधर देखती है...
क्या खोया? - इससे परे
शकुंतला बन
फूलों से श्रृंगार करती है
" बेटी सज़ा-ए-आफ़ता पत्नी" बनती होगी
पर यह,
सिर्फ़ सुरीला तान होती है!
यातना-गृह मे डालो
या अपनी मर्ज़ी का मुकदमा चलाओ ,
वक्त निकाल ,
यह कवि की प्रेरणा बन जाती है ,
दुर्गा रूप से निकल कर
" छुई-मुई " बन जाती है- यह लड़की!
मौत को चकमा तक दे जाती है....
तभी तो
"रहस्यमयी " कही जाती है...!
25 मार्च, 2008
या ...
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13 मार्च, 2008
अजीब बात!
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नारी की जीत,उसकी पूरी मनोदशा-
पुरुष की फाइल में बंद होती है!
एक कैरेक्टर सर्टिफिकेट के लिए,
वह घर-बाहर का संतुलन बनाये रखती है....
प्रतिभा से अधिक 'स्त्री-धर्म' मायने रखता है.....
'स्त्री-धर्म'!
तब होती है उसपर 'इनायते करम'
और वह 'धन्य'होती है....
जगह जो तुम्हे दिखाई देती है
कभी उसके पीछे का नज़ारा देखा है?
भावनाओं की अनगिनत लाशें,
ओह!इस सच को कैसे समझ पाओगे-
इक इमरोज़ के लिए ,
जाने कई बार
कितनी ज़िन्दगी
तोहमतों की राह पर
रो-रो के दम तोड़ती हैं!!!!!!!!!!!!
मॉल लाइफ ..........(यह कोई कविता नहीं है)

उसमें फिर मिलाई जाये-थोड़ी सी शराब..........
दुनिया कहाँ- से- कहाँ आ गई!मॉल जाने का नशा -सा हो चला है,
लेबल लगे कपड़े, एक ही प्रिंट के,डब्बा बंद खाना,कटी सब्जियां ,आधी सिंकी रोटी...
किसी भी दिन जाओ,भीड़-ही-भीड़!
फर्श इतना चिकना की बेबी स्टेप्स लेने को बाध्य ....अरे कुछ कुर्सियाँ ही रख दो आराम के लिए!
..........
आम आदमी कई कपड़ों को घूरता है,'इसे कौन पहनेगा?'-जैसे भाव लिए!
पिज़्ज़ा,बर्गर,फ्रेंच फ्राईज़ का स्टाइल है...बर्गर क्या है?डबल रोटी,बीच में हरी पत्ती...मछली के चोखे की टिकिया...फ्रेंच फ्राईज़ उबले आलू का कुरकुरा भुजिया...मॉल स्टाइल ,नाम 'मैकडी'...
नन्हें कपड़े में बच्चे स्टाइल में दौड़ते हैं,मैकडोनाल्ड्स में बैठ कर कुछ इस तरह गोल चेहरा बना कर देखते हैं कि अपने पिछडेपन का एहसास होता है...
और लडकियां!नाभिदर्शना जींस में,हाफ टॉप के साथ "बला" ही नज़र आती हैं...
लड़कों से यूँ चिपक कर चलती हैं कि हवा बेचारी ही कहती है "ज़रा मुझे आने दे"...
अंग्रेजी की किताब और मोबाइल पर अंग्रेजी धुन या फिर मॉल की सीढियों पर कान में तार लगाये आईपॉड से गाने सुनना ...भाई मुझ गंवार को तो एक ही गीत याद आता है -
"जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहाँ हैं?
कहाँ हैं?कहाँ हैं?कहाँ हैं?"
12 मार्च, 2008
किससे कहें!!!
10 मार्च, 2008
निशान
08 मार्च, 2008
अर्थ .......

वरना इगो !-लड़के का आहत होता है
लड़की का इगो मान्य नहीं .........
;महिला-दिवस' मनाएँ ,
लड़की को बराबर का दर्जा नहीं-सम्मान दें
वह घर की शोभा है
बस इसे अर्थ दें...............
प्रीतम एंड पेद्रो
कभी किसी से माफ़ी मांग लो,कभी किसी को माफ़ कर भी दो... यही शायद प्रीतम एंड पेद्रो की सबसे बड़ी सीख है। यह फिल्म सिर्फ़ एक कहानी नहीं सुनाती...
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गंगा ! तुम परंपरा से बंधकर बहती, स्त्री तो हो किंतु परंपरा से अलग जाकर अबला अर्थ नहीं वहन करती वो रुपवती धारा हो जिसका वेग कभी लुप्त नही...
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आज़ादी ... क्या है आज़ादी ? ............... गुलाम देश में भी एक घर था - जहाँ सुबह होती थी चिड़िया चहकती थी रसोई जलती थी घर से कोई भूखा...

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