03 फ़रवरी, 2009

लक् बाई चांस ....


जोया अख्तर द्बारा निर्मित फ़िल्म ' luck by chance' आज की कहानी है। यूँ तो कहानी फ़िल्म इंडस्ट्री में संघर्ष की है , पर यह स्थिति आज हर जगह है ।
बेहतर हो हम अपनी बातों का सफर इस गाने को सुनते हुए करें ...........

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आंखों में सपने लिए , मंजिल की ऊंचाई पर दृष्टि टिकाये पूरी युवा पीढी खड़ी है। घर से दूर,जाने कैसी-कैसी परिस्थितियों की आग का धुंआ उनकी घुटन बन जाता है ।
एक लडकी प्राप्य के लिए साधन बनती है,उसे यही रास्ता सरल लगता है, और साधक.....वक्त आने पर उसके सपनों को टुकडों में बिखेर देता है। विरोध? किसका? और कैसे?
पति-पत्नी का रिश्ता भी नाटकीय है,पैसे की गर्मजोशी है........प्यार ढूंढा तो सपने गए !
एक और आज की सच्चाई है कि कोई किसी की सही मायनों में तारीफ़ नहीं करता,किसी से बिना मतलब बात नहीं करता और मतलब की बातचीत भी मज़बूरी है। ऊपर उठने की चाह में किसी का भी सर इस्तेमाल करो। पैसा,पैसा .........बस पैसा, मर्यादा से ऊपर पैसा, हर रिश्ते का वजूद खोखला है !
पूरी फ़िल्म एक सोच देती है - मध्यांतर के बाद शाहरुख़ खान के द्बारा जो शब्द कहे गए हैं, उसका महत्व जानते हुए भी गुमराह नायक...........प्राप्य है शोहरत और पैसा !
जोया अख्तर की पहली फ़िल्म अलग-अलग पहलुओं पर विचार करने को प्रेरित करती है, वाकई यह फ़िल्म प्रशंसा से ऊपर है !

30 जनवरी, 2009

कवि सुमित्रानंदन पन्त से एक मुलाकात अबोध मन की............


आज मैं आपको प्रकृति कवि सुमित्रानंदन पन्त जी से मिलवाने समय के उस बिन्दू पर ले चलती हूँ,जहाँ मुझे नहीं पता था कि वे कौन हैं ,उनकी महत्ता क्या है !
नन्हा बचपन,नन्हे पैर,नन्ही तिलस्मी उड़ान सपनों की और नन्ही-नन्ही शैतानियाँ- उम्र के इसी अबोध,मासूमियत भरे दिनों में मैं अपने परिवार के साथ इलाहाबाद गई थी। मेरे पापा,मेरी अम्मा, हम पाँच भाई-बहन -छोटे भाई के फूल संगम में प्रवाहित करने गए थे। उम्र को मौत के मायने नहीं मालूम थे, बस इतना पता था कि वह नहीं है - फूल,संगम .... अर्थ से बहुत परे थे।
आंसुओं में डूबे दर्द के कुछ टुकड़े मेरे पापा,मेरी अम्मा ने संगम को समर्पित किया, पानी की लहरों के साथ लौटती यादों को समेटा और लौट चले वहां , जहाँ हम ठहरे थे। हाँ , संगम का पानी और माँ की आंखों से गिरते टप-टप आंसू याद हैं। और याद है कि हम कवि पन्त के घर गए (जो स्पेनली रोड पर था)। माँ उन्हें 'पिता जी' कहती थीं,कवि ने उनको अपनी पुत्री का दर्जा दिया था, और वे हमारे घर की प्रकृति में सुवासित थे, बाकी मैं अनजान थी।
उस उम्र में भी सौंदर्य और विनम्रता का एक आकर्षण था, शायद इसलिए कि वह हमारे घर की परम्परा में था।
जब हम उनके घर पहुंचे, माथे पर लट गिराए जो व्यक्ति निकला.....उनके बाल मुझे बहुत अच्छे लगे,बिल्कुल रेशम की तरह - मैं बार-बार उनकी कुर्सी के पीछे जाती.....एक बार बाल को छू लेने की ख्वाहिश थी। पर जब भी पीछे जाती, वे मुड़कर हँसते..... और इस तरह मेरी हसरत दिल में ही रह गई।
उनके साथ उनकी बहन 'शांता जोशी' थीं, जो हमारे लिए कुछ बनाने में व्यस्त थीं । मेरे लिए मीठा,नमकीन का लोभ था, सो उनके इर्द-गिर्द मंडराती मैंने न जाने कितनी छोटी-छोटी बेकार की कवितायें उन्हें सुनाईं.....कितना सुनीं,कितनी उबन हुई- पता नहीं, बस रिकॉर्ड-प्लेयर की तरह बजती गई ।
दीदी,भैया ने एक जुगलबंदी बनाई थी -
'सुमित्रानंदन पन्त
जिनके खाने का न अंत', .... मैं फख्र से यह भी सुनानेवाली ही थी कि दीदी,भैया ने आँख दिखाया और मैं बड़ी मायूसी लिए चुप हो गई !
फिर पन्त जी ने अपनी कवितायें गाकर सुनाईं, माँ और दीदी ने भी सुनाया..... मैं कब पीछे रहती -सुनाया,'नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए....'
उसके बाद मैंने सौन्दर्य प्रिय कवि के समक्ष अपने जिज्ञासु प्रश्न रखे - ' नाना जी, पापा हैं तो अम्मा हैं, मामा हैं तो मामी , दादा हैं तो दादी......फिर यहाँ नानी कहाँ हैं?'प्रकृति कवि किसी शून्य में डूब गए, अम्मा, पापा सकपकाए , मैं निडर उत्तर की प्रतीक्षा में थी (बचपन में माँ,पिता की उपस्थिति में किसी से डर भी नहीं लगता)। कुछ देर की खामोशी के बाद कवि ने कहा ,'बेटे, तुमने तो मुझे निरुत्तर कर दिया,इस प्रश्न का जवाब मेरे पास नहीं....' क्या था इन बातों का अर्थ, इससे अनजान मैं अति प्रसन्न थी कि मैंने उनको निरुत्तर कर दिया, यानि हरा दिया।
इसके बाद सुकुमार कवि ने सबका पूरा नाम पूछा - रेणु प्रभा, मंजु प्रभा , नीलम प्रभा , अजय कुमार और मिन्नी !
सबके नाम कुछ पंक्तियाँ लिखते वे रुक गए, सवाल किया - 'मिन्नी? कोई प्रभा नहीं ' - और आँखें बंदकर कुछ सोचने लगे और अचानक कहा - 'कहिये रश्मि प्रभा , क्या हाल है?' अम्मा ,पापा के चेहरे की चमक से अनजान मैंने इतराते हुए कहा -'छिः ! मुझे नहीं रखना ये नाम ,बहुत ख़राब है। एक लडकी-जिसकी नाक बहती है,उसका नाम भी रश्मि है................' पापा ने डांटा -'चुप रहो', पर कवि पन्त ने बड़ी सहजता से कहा, 'कोई बात नहीं , दूसरा नाम रख देता हूँ' - तब मेरे पापा ने कहा - 'अरे इसे क्या मालूम, इसने क्या पाया है....जब बड़ी होगी तब जानेगी और समझेगी ।'
जैसे-जैसे समय गुजरता गया , वह पल और नाम मुझे एक पहचान देते गए ।
वह डायरी अम्मा ने संभालकर रखा है , जिसमें उन्होंने सबके नाम कुछ लिखा था। मेरे नाम के आगे ये पंक्तियाँ थीं,
' अपने उर की सौरभ से
जग का आँगन भर देना'...........
कवि का यह आशीर्वाद मेरी ज़िन्दगी का अहम् हिस्सा बन गया......इस नाम के साथ उन्होंने मुझे पूरी प्रकृति में व्याप्त कर दिया ।

03 जनवरी, 2009

आप क्या कहना चाहेंगे ?


मैं एक सच्चा वाक्या प्रस्तुत करती हूँ आपके आगे - देश के ऐसे नागरिकों को क्या आप संवेदनशील कहेंगे ? क्या यह होती है देश के प्रति निष्ठा? हाँ , बातें हैं देश के लिए ही !.......
मेरा बेटा, ( जो एक आर्मी ऑफिसर है ) - ट्रेन से अपने लोकेशन पर जा रहा था। उसी कम्पार्टमेंट में एक महाशय एक लड़की पर प्रभाव जमाते हुए जोश में कह रहे थे - जवाब देना है, हमें हाथ-पर-हाथ रखकर नही बैठना है! मैं चाहता हूँ युद्ध हो, मैं अनुभव करना चाहता हूँ......... बहुत देर से उनकी बातें सुन रहा था मेरा बेटा, अनुभव की बात पर उसने पूछा - "क्या आपके घर का कोई सदस्य फौज में है?" उन्होंने कहा - 'नही'। मेरे बेटे ने कहा - 'फिर? फिर आप क्या अनुभव कर पाएँगे और किस मायने में? पहले अपने घर से किसी को देश की सुरक्षा में भेजें , फिर ऐसी बात कहें..........!!!'

वो महापुरुष थोड़ा रुके और फिर अपना प्रश्न दागा - 'आप क्या करते हैं?' बड़े फक्र से मेरे बेटे ने कहा - 'मैं फौज में हूँ, मैं एक आर्मी ऑफिसर हूँ!'

उन्होंने तो चुप्पी साध ली, पर आप कहिये - क्या यह कोई टाइम पास मसला है, या कोई बौद्धिक अनुभव?

29 दिसंबर, 2008

दुआओं के दीप........


आंसुओं की नदी में
मैंने अपने मन को,
अपनी भावनाओं को
पाल संग उतार दिया है.........
आंसुओं के मध्य
जाने कितनी अजनबी आंखों से
मुलाक़ात हो जाती है-
फिर उन लम्हों को पढ़ते हुए
मेरी आँखें
उनके जज्बातों की तिजोरी बन जाती हैं.........
जाने कितनी चाभियाँ
गुच्छे में गूंथी
मेरी कमर में,मेरे साथ चलती हैं.....
और रात होते
मेरे सिरहाने,
मेरे सपनों का हिस्सा बन जाती हैं,
जहाँ मैं हर आंखों के नाम
दुआओं के दीप जलाती हूँ !

23 दिसंबर, 2008

अम्मा के लिए......




मेरी कलम ने अम्मा के नाम लिखा है, पर यह एक आम सोच है..... क्रम जीवन का चलता रहता है , सोच जाने कैसे-कैसे रूप लेती रहती है ! बात उम्र की होती है या परिस्थितियों की........ पता नहीं , पर अपनी-अपनी धुरी पर सबकी
अपनी सोच होती है.........
एक प्रयास है हमारी भावना अम्मा के लिए---------------

हर दिन
एक शब्द तलाश करती हूँ
जो तुम्हे खुशी दे...........
मैं हार जाती हूँ, तुम्हारी निराशा के आगे
निराशा !?!
........ उम्र तो बढती ही जाती है
शरीर थकता ही जाता है
और फिर मुक्ति.....
यह तो शाश्वत क्रम है,
पर वजूद तो पूरी ज़िन्दगी का सार है !
.... अवश शरीर से यह मत सोचो
' अब मेरी क्या ज़रूरत ?'......
तुमने जो किया,
और हम जितने तुम्हारे करीब हैं
वैसा कईयों के हिस्से नहीं आता
....... सिर्फ़ यही महसूस करो
तो सुकून की बारिश से राहत मिलेगी !
माँ,
जिन चूजों को तुमने पंखों की ओट दी थी
उनके पंख भी ओट देते थक चले हैं
उनके पंखों की भाषा भी सीमित हो गई है !
पर उस भाषा में,
उनकी जिम्मेदारियों के मध्य तुम हो
और यह -
उनका गुरुर है ,
विवशता नहीं.....................

18 दिसंबर, 2008

कैसे कहें?


'जो बीत गई,वो बात गई........!'
अगर ऐसा होता रहा
तो पास क्या रह जाएगा !
आज की हर तस्वीर
कल की ही तो परछाईं है !
उसे मिटा दें
तो फिर जज्बातों,संवेदनाओं का क्या होगा !
वे सितारे जो टूटे
और हमने 'विश' माँगा
--उसे भूल जायें?
कैसे?
कैसे कह दें,
जो बीत गई...................

15 दिसंबर, 2008

ताउम्र का साथ !


बहार आए और थम जाए,
ऐसा होता नहीं है
और अगली बहार का इंतज़ार न हो
ये मुमकिन नहीं है .......
ज़िन्दगी को गर जीना है
तो मायूसी का दामन ना पकडो,........
मायूसी में-
खुशियों की आहटें गुम हो जाती हैं,
फिर लंबे समय तक
ये आहटें हमसे रूठ जाती हैं........
जीने के लिए-
दूसरों की खामियां न ढूंढो,
हंसने की ख्वाहिश है
तो अपनी खामियों के दस्तावेज़ खोलो..........
राहें तभी बनती हैं !
गुरुर की अवधि बड़ी छोटी होती है,
दीवारें रिसने में देर नहीं लगती,
संभालो ख़ुद को
खुशियों की आहटों को जानो
उठ जाओ
.....
खुशियों की अवधि कम ही सही
यादें बड़ी गहरी होती हैं,
ताउम्र साथ चलती हैं..........

06 दिसंबर, 2008

अलग-अलग परिणाम !!!


परिस्थितियाँ एक नहीं होतीं,
हादसे एक नहीं होते,
कोई मर जाता है,
कोई जी जाता है,
कोई ज़िन्दगी खींच लेता है !
किसी के हिस्से गंगा आती है
कहीं यमुना
कहीं नाले का गन्दला पानी........
कोई गंगा की लहरों में समा जाता है,
कोई गंदले पानी में कमल बन जाता है !
सुबह की किरणों के संग-
कोई गीत गाता है
कोई रोता है
कोई सूरज से होड़ लगाता है !
बन्धु,
अलग-अलग कैनवास हैं,
भावों के रंग हैं,
आकाश किसके हाथ होगा-
कौन जानता है !

02 दिसंबर, 2008

नए मंज़र की आहटें !


ज़िन्दगी कभी सरल नहीं होती
उसे बनाना पड़ता है
बेरंग लम्हों को
उम्मीद के रंगों से
ज़बरदस्ती भरना पड़ता है !
जिन वारदातों को
हम इन्तहां समझते हैं
- वे नए मंज़र की आहटें होती हैं ......................
निर्माण से पूर्व बहुत कुछ सहना होता है !
ज़िन्दगी अगर आसान ही हो जाए
तो जीने का मज़ा ख़त्म हो जाए !
माथे पर पसीने की बूंदें ना उभरीं
तो नींद का मज़ा क्या !
रोटी,नमक में स्वाद नहीं पाया
तो क्या पाया ?
......
ज़िन्दगी रेगिस्तान में ही रूप लेती है,
पैरों के छाले ही
मंजिलों के द्वार खोलते हैं !

23 नवंबर, 2008

मन के रास्ते और ईश्वर !


मैं मन हूँ,
सिर्फ़ मन !
शरीर की परिधि से
बहुत अलग,बहुत ऊपर........
आम बातें मैं कर लेती हूँ कभी,
पर मन की राहों में सफर करना
मेरा सुकून है !
मन के रास्ते गीले होते हैं,
गिरने का डर होता है ,
तो अक्सर लोग
सूखे,बेमानी रास्तों में उलझ जाते हैं........
आंसुओं की भाषा में गिरना
उन्हें मुनासिब नहीं लगता !
उनकी जुबान में
ईश्वर तक बेमानी शक्ल ले लेता है,
सात्विक चेहरे से अलग
हीरे,मोतियों में जड़ हो जाता है !
हतप्रभ ईश्वर-
उस पिंजड़े को छोड़ जाता है
और मेरे
मुझ जैसों के संग-
भीगे रास्तों पर।
आम परिवेश में चलता है
....... ईश्वर अपनी करुणा के आंसू
इन्हीं रास्तों पर बहाता है !!!!!!!

प्रीतम एंड पेद्रो

 कभी किसी से माफ़ी मांग लो,कभी किसी को माफ़ कर भी दो... यही शायद प्रीतम एंड पेद्रो की सबसे बड़ी सीख है। यह फिल्म सिर्फ़ एक कहानी नहीं सुनाती...