19 अगस्त, 2009

आज के लाइफ स्टाइल से आप कितने संतुष्ट हैं???

(शुरू में स्पष्ट कर दूँ ....किसी विषय पर बात करने का अर्थ यह नहीं होता कि उसके दूसरे पहलू नहीं , पर ९५% और % का फर्क होता है...)

आज की लाइफ स्टाइल-'शोर', चलती सुपरफास्ट के सामने से जैसे दृश्य बदलते हैं,वैसा माहौल ! डिस्को,कम कपड़े ,नशे में डूबा समूह ......कहने का दिल करता है,
मैं खो रही हूँ...
किसी सन्नाटे में
विलीन हो रही हूँ !
मौन-
जो सुनाई ना दे किसी को
उसीमें अंकित हो गई हूँ !
आकाश मेरी मुठ्ठी से निकल रहा है
धरती खिसक रही है
बदलते परिवेश की दस्तकों ने
मुझे पहचानने से इन्कार कर दिया है !
किसे आवाज़ दूँ?
और कैसे?
स्वर गुम हो गए हैं....
जहाँ तक दृष्टि जाती है
घर-ही-घर हैं
पर दूर तक बन्द दरवाज़े ...
कोलाहल में भी,
अंधे,गूंगे,बहरों की बस्ती -सी लगती है !
जहाँ खड़ी हूँ
वह जमीन अपनी नहीं लगती
परिवेश अपना लगता है
आईने में
अपना चेहरा भी
अजनबी-सा लगता है !!!!!!!




यह सच है कि वक्त की रफ़्तार तेज़ है,पर रिश्तों का मापदंड क्यूँ बदल गया ?इन पंक्तियों का अर्थ आज भी है -"सत्यम ब्रूयात,प्रियं ब्रूयात,


ब्रूयात सत्यम अप्रियम "


और आज अप्रिय सत्य ही बेबाकी से बोलने में शान है,नंगा सत्य प्रस्तुत करने की होड़ है..........
हो सकता है , मैं विषय के सिर्फ एक पहलू पर गौर कर रही होऊं ,इसलिए अपने परिचितों के मध्य अपना सवाल रख दिया और ये रहे उनके क्रमवार विचार...................




सरस्वती प्रसाद (http://kalpvriksha-amma.blogspot.com/)


माना ये सच है - 'परिवर्तन होता इस जग में
प्रकृति बदलती है
दिन की स्वर्ण तरी में बैठी
रात मचलती है'
फिर भी, हद हो गई ! आज की लाइफ स्टाइल को देखकर लगता है भारत में अमेरिका उतर आया है. सर से पांव तक आधुनिकता की होड़ लगी है. नैतिकता की बातें विस्मृत हो चुकी हैं. वर्जनाएं रद्दी की टोकरी में फ़ेंक दी गयी हैं . अश्लील क्या होता है-कुछ नहीं . संस्कार की बातें दकियानूसी लगने लगी हैं. एक-दूसरे को लांघकर आगे निकल जाने की ऐसी होड़ लगी है,कि फैलती कामनाओं के बीच भावनाएं दब गयी हैं. जीने को अपने निजी विचार , अपना घेरा है . इसमें औरों का कोई स्थान नहीं . संबंधों की एक गरिमा हुआ करती थी,आज के सन्दर्भ में उसका कोई स्थान नहीं. वेश-भूषा , खान-पान जीवनचर्या में भारत महान कहीं नज़र नहीं आता . जिस हिंदी पर हमें नाज था,वह पिछडे लोगों की भाषा बनती जा रही है .शिष्टता , आदर-सम्मान,व्यवहार,बोली- जो व्यक्ति की सुन्दरता मानी जाती थी,उस पर आडम्बर का लेप लग गया है. लज्जा, जो नारी का आभूषण था , आज की लाइफ स्टाइल में कुछ इस तरह गुम हुआ कि कहीं भीड़ में जाओ तो लगता है कि अपना-आप गुम हो गया है और खुद की आँखें ही शर्मा जाती हैं . भागमभाग का ऐसा समां है कि किसी से कुछ पूछने का समय है और अपनी कह सुनाने की कोई जगह रही.....
आलम है - ' आधुनिकता ओढ़कर हवा भी बेशर्म हो गई है
उसकी बेशर्मी देख गधे
जो कल तक ढेंचू-ढेंचू करते थे
आज सीटियाँ बजाने लगे हैं
गिलहरी डांस की हर विधा अपनाने को तैयार है
पर कुत्तों को अब किसी चीज में दिलचस्पी नहीं
वे अपनी मूल आदत त्याग कर
भरी भीड़ में सो रहे हैं
समय का नजारा देखते जाओ
रुको नहीं , चलते जाओ
अब 'क्यों' का प्रश्न बेकार है !




नीता कोटेचा (http://neeta-myown.blogspot.com/)


आज की लाइफ स्टाइल ये है...कि सब अपने अपने काम में व्यस्त है...किसी के पास किसीके लिए वक्त नहीं है...सब अपनी परेशानियों में डूबे हुए हैं ..या फिर अपनी दुनिया में अच्छे से अच्छे रंग भरने में लगे हुए है..पहले लोग दुसरो के लिए जीते थे..आज सिर्फ खुद के लिए.. आज कोम्पुटर ने और मोबाइल ने परायों को करीब ला दिया है और अपनों को दूर कर दिया है...कभी कभी लगता है की अच्छा है कि ये मशीन बना ..अगर यह ना होता तो बहुत सारे लोग बीमार हों जाते..डिप्रेशन के शिकार हो जाते..पर क्या ये होने के बावजूद लोग इस बीमारी के शिकार नहीं है..यहाँ देखा है कि सब लोग प्रेम को तरसते है...शायद मै भी उसीमे से एक हूँ ..पर ऐसा क्यों..हमने कभी अपने बड़ों के मुंह से सुना था कि घर में प्यार ना मिले तो बच्चा बाहर जाता है..तो क्या हम में से बहुत सारे लोगों को प्रेम नहीं मिला..या काम पड़ रहा है..
पता नहीं चल रहा कि हम गलत हैं या सही हैं ॥पर सब कुछ मिलने के बाद भी एक अधूरापन महसूस होता है..लगता है कि सब को खुद की जिन्दगी जीनी है...ना हम उसमे दखलंदाजी कर सकते है..और ना हम उनको सलाह दे सकते है..तो फिर हमारा काम क्या है...और हम भी चुपचाप अपने रास्ते खोजना शुरू करते है..जिससे बाकि लोगो को तकलीफ होती है...तो हम क्या करे।??वापस जिन्दगी एक सवाल बनके खड़ी हों जाती है..कि क्या हम संतुष्ट है??




प्रीती मेहता (http://ant-rang.blogspot.com/)


आज पिज्जा एम्बुलेंस से फास्ट पहुचता है घरडिस्को, पब्, फास्टफूड, ८० gb का आई - पॉड, N सीरीज़ का मोबाइल, लैपटॉप, ब्रांडेड कपड़े, जूते इत्यादि .... शायद यही पहचान बन गई है आज की... आज के बच्चेबे-ब्लेडखेलेंगे, परलट्टूयागिल्ली - डंडानहीं. जगह जगह से फटे कपड़े - फैशन का पर्याय बन जाते है, बडों को प्रणाम करना डाउन मार्केट है. आज उपरी दिखावा ही सब कुछ है .ज़माने के साथ कदम मिलाना अच्छी बात है, पर यह भी देखा जाये कि कदम मिलाते हुए कदम बहक ना जायेकुछ बाते है जो आज की लाइफ स्टाइल में अच्छी भी हैजैसे कि आज का युवा वर्ग बहुत प्रैक्टिकल है. सकारात्मक है , आगे बढ़ने की चाह है . आज की सोच मर्यादित नहीं रह जाती , उसे कई माध्यमो से लोगो तक आसानी से पहुचाया जा सकता है
इसलिए …. कह सकते है की आज की life style 50% नकारात्मक तो 50% सकारात्मक भी है

H.P. SHARMA

मन, मैला, तन ऊजरा, भाषण लच्छेदार,
ऊपर सत्याचार है, भीतर भ्रष्टाचार।
झूटों के घर पंडित बाँचें, कथा सत्य भगवान की,
जय बोलो बेईमान की !

प्रजातंत्र के पेड़ पर, कौआ करें किलोल,
टेप-रिकार्डर में भरे, चमगादड़ के बोल।
नित्य नई योजना बन रहीं, जन-जन के कल्याण की,
जय बोल बेईमान की !

महँगाई ने कर दिए, राशन-कारड फेस
पंख लगाकर उड़ गए, चीनी-मिट्टी तेल।
‘क्यू’ में धक्का मार किवाड़ें बंद हुई दूकान की,
जय बोल बेईमान की !

डाक-तार संचार का ‘प्रगति’ कर रहा काम,
कछुआ की गति चल रहे, लैटर-टेलीग्राम।
धीरे काम करो, तब होगी उन्नति हिंदुस्तान की,
जय बोलो बेईमान की !

दिन-दिन बढ़ता जा रहा काले घन का जोर,
डार-डार सरकार है, पात-पात करचोर।
नहीं सफल होने दें कोई युक्ति चचा ईमान की,
जय बोलो बेईमान की !

चैक केश कर बैंक से, लाया ठेकेदार,
आज बनाया पुल नया, कल पड़ गई दरार।
बाँकी झाँकी कर लो काकी, फाइव ईयर प्लान की,
जय बोलो बईमान की !

वेतन लेने को खड़े प्रोफेसर जगदीश,
छहसौ पर दस्तखत किए, मिले चार सौ बीस।
मन ही मन कर रहे कल्पना शेष रकम के दान की,
जय बोलो बईमान की !


Alok srivastava <coolaries26@gmail.com>


वर्तमान समय मे जिस लाइफ स्टाइल को आज का युवा वर्ग आत्मसात किये हुए है, वह कही से भी लम्बी दूरी के सोच के अनुकूल नहीं है| आज का जीवन स्तर पूरी तरह से मै पर निर्भर है, केवल अपनी आवश्यकता और उसके समाधान तक की सोच है, आज के समय मे लोगो की| उपभोक्तावाद इस कदर हावी है की लोग अब उधार की ज़िन्दगी मे ज्यादा विश्वास करते है, और अपना मानसिक सकूं खो देते है उस उधार को पूरा करने के जद्दोजहद मे| उन्हें हर वह चीज़ चाहिए जिसे वो दुसरे के पास देखते है, भले ही वह उनके लिए आवश्यक हो अथवा ना हो पर चाहिए ही चाहिए| आज के समय मे वस्तु इंसान से ज्यादा महत्वपूर्ण है |वस्तु से प्यार है लोगो को इंसान से नहीं|
सुबह से लेकर रात तक भागता रहता है इंसान, और देर रात जब थक कर इंटो की चाहरदीवारी(घर तो रहा ही नहीं अब) के भीतर पहुँचता है, तो उसके पास स्वयं तक के लिए समय नहीं बचा होता और फिर कल के लिए सोचते हुए सो जाता है|
अगले दिन पुनः वही दिनचर्या|
पिपासा है की शांत होने का नाम ही नहीं लेती और उसको शांत करने के फेर मे इंसान सबकुछ भूल कर लगा पड़ा है|
एक समय मे जो संतोषम परम सुखं की बाते करता था आज लालच मे अँधा हुआ पड़ा है |

बड़े होने के दो तरीके है :
एक आप खुद को बड़ा बनाओ और दूसरा बाकी लोगो को छोटा कर दो|
आज के समय मे दूसरा वाला रास्ता ही ज्यादा प्रचलन मे है
दुसरो को गिरा के, नीचा दिखा के, हतोत्साहित करके, ज्यादा सुख की अनुभूति होती है |
आगे बढ़ने की लालसा इतनी तीव्र है, की उसके लिए कोन से रास्ते का चुनाव किया है इसका कोई महत्त्व नहीं है|
सबकी नज़रे केवल अंतिम परिणाम पर टिकी रहती है,
कोई ये नहीं जानना चाहता की यह परिणाम कैसे और क्यूँकर प्राप्त किया गया है|

हमें तो नहीं लगता की आज के लाइफ स्टाइल से कोई भी संतुस्ट है
सभी की अपनी अपनी भौतिक लाल्साये है और वह उन्हें पूरा करने के लिए लगा पड़ा है
इस धरती के वासियों की कर्म प्रधान सोच अब परिणाम प्रधान हो गयी है


Vinita Shrivastava <vinnishrivastava1986@gmail.com>

कई बार मन् में उठता है सवाल कि क्या लिखूँ?
क्या लिखूँ कि आधुनिक रहन सहन में,
भारतीय संस्कृति दिनों दिन लुप्त होती जा रही है,
या लिखूँ .......
विदेशी सभ्यता के बारे में ,
जिसमें हमारी पीढियां लुप्त होती जा रही है |
क्या लिखूँ मै
क्या लिखूँ कि आधुनिक रहन सहन को बढावा दे रहे सब ,
या लिखूँ कि हम अपने आपको खो रहे हैं
क्या लिखूँ मैं
क्या लिखूँ ,
-हिंदी की महानता
जो किताबो में सिमट गई है
या लिखूँ ......
अंग्रेजी के बारे में
जो भारतीयों के शरीर में लहू के सामान घुल गई है
क्या लिखूँ मै......
क्या लिखूँ मै .............


लगभग 60% !!!!!!!!!!!!!
सबसे बडी बात है-- कि , आप आजाद हैं..
तो सोच सकते हैं, राय ले सकते हैं, कोशिश कर सकते हैं,
ऐसा पहले नहीं था.....................................................
माना कि हवा ,पानी , खाना शुद्ध था...पर कितने
लोगों को मय्यसर होता था........आज आपके पास.....
विकल्प है..आज आप अपनी लाइफ स्टाइल बना सकते हैं.........


मंजुश्री ,


प्रश्न है कि क्या हम अपने मौजूदा हालात से संतुष्ट हैं.......जहाँ तक संतुष्ट होने का सवाल है तो आदमी कभी भी,किसी भी काल में अपने वर्तमान हालात से संतुष्ट नहीं रहा है . असंतोष सड़े-गले
रीति-रिवाजों का ,परम्पराओं का ,अंधविश्वासों का ,..... इन सारे बन्धनों से मुक्त होने के लिए वह निरंतर संघर्ष करता रहा ...और धीरे-धीरे उसने अनेक बेडियाँ तोडीं ,अनेक बन्धनों से आनेवाली पीढी को मुक्ति दिलाई . लेकिन हर नई पीढी को लगा कि उसे और मुक्ति चाहिए,और आज़ादी चाहिए. आज़ाद होते-होते आज मौजूदा पीढी जीवन के हर मूल्य से आज़ाद हुई नज़र आती है . सभ्यता,संस्कृति की दुहाई देनेवाले देश में संस्कृति मखौल का विषय बन गई और सभ्यता धुंधली पद रही है. पहनावे में,बोलचाल में,रहन-सहन में हर गलत चीज को मान्यता मिल रही है . ऐसे में भला कोई संतुष्ट कैसे हो सकता है !!!!!!!


शोभना चौरे (http://shobhanaonline.blogspot.com/)


आज कि लाइफ स्टाइल से कितने संतुष्ट है
कोनसी लाइफ स्टाइल ?है आज हमारे पास काकटेल है पूरब और पश्चिम का |
न ही पूरब अपना प् रहे है और न ही अपना छोड़ पा रहे है और छोड़े भी क्यों?हमारी अपनी जीवन शैली है |किन्तु आज जबकि हर दूसरे परिवार का कोई नाकोई व्यक्ति विदेश में जा बसा है या आता जाता है तो वहा कि
संस्कति रहन सहन अपनाना स्वाभाविक हो जाता है |फिर भी वः अपनी जडो को नही भूलता |
पिछले डेढ़ दशक में मध्यम वर्गीय परिवार के बच्चो को निजी संस्थानों में नौकरी के अच्छे अवसर मिले और वे अपनी योग्यता के बल पर आर्थिक रूप से सक्षम हुए जिसके लिए उन्हें अपने घर से मिलो दूर रहना पडा |और दिन के
रोज १२ -१२ घंटे काम करना होता है तो उनकी जीवन शैली निश्चित रूप से अलग होगी \अपने समाज से दूर उसका एक नया समाज बन जाता है अपने सामाजिक कार्यक्रमों में चाहकर भी वो शामिल नही हो पाता |और अपनों से दूर हो जाता है तब आधुनिक संचार मध्यम ही उसका सहारा बन जाते है और उसका वो आदी हो जाता है |या यु भी कह सकते है वो संतुष्ट हो जाता है अपनों से बात करके |तब उसे जरुरत नही पडती कि वो अपने आसपास झांके |
और एक धारणा बन जाती है हम अपने पडोसियों को अनावश्यक क्यों तकलीफ दे ||और वह नही चाहता कि कोई उसके निजी जीवन में दखल दे और वह भी किसी के निजी जीवन में दखल नही देता |
और मेरे हिसाब से इसके मूल में आर्थिक समर्थता बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निबाहती है |


लोग छोड़ जाते है रोनके
हम तो शून्य भी साथ ले जाते है |

कहने को जिन्दगी हंसती रही
आँखों में आंसू तैर जाते है |

13 अगस्त, 2009

कृष्ण जन्म


सूरदास ले बाल-रूप
यशोदा लेकर माखन
अतृप्त ममता का प्यार लिए देवकी
गागर भरकर गोपियाँ
प्रेम रंग में डूबे उधो
गर्व लिए वासुदेव और नन्द
प्रतीक्षित मंद मुस्कान संग राधा
जोगन बनकर मीरा
सब हैं मगन रंग
जन्म लीला करने को आए
कृष्ण बांसुरी संग
बांसुरी की धुन में गाओ सब मिलकर
जनम लियो कृष्ण अवतार लेकर
होगा चमत्कार
आयेंगे इन्द्र मेघ समूह लेकर
यमुना फिर झूमेगी
धरती भी झूमेगी
किसान झूम-झूम गायेंगे
खेत लहलहाएंगे
आए कृष्ण घुटने पर
बादलों का राग लिए
विद्युत - सी शोभा लिए
मुसलाधार बारिश लिए -- -

09 अगस्त, 2009

मनःस्थिति !


सर्कस के जोकर को देखा है ना?
ना देखा हो
तो मुझे देखो
मनःस्थिति से परे
हास्य-राग गाती हूँ...........
तुम्हें गुस्सा आ सकता है
मेरे हास-परिहास पर
उन्हें भी आता था
(किन्हें? यह प्रश्न रहने दो),
हाँतो उन्हें भी आता था गुस्सा
शायद-
शायद क्या, निःसंदेह
मेरा हास्य,मेरी मनःस्थिति से परे
एक अजीब शक्ल ले लेता था !
....गुस्सा करनेवालों ने
कभी सोचा ही नहीं
ऐसा होता क्यूँ है !
वे मुझे साइकिक समझते थे
अपनी बौद्धिकता के आगे.........
और मैं,
तब भी निरंतर हंसती जाती
शायद-
शायद क्या,निःसंदेह
मुझे अपने दिमागी सन्नाटे की
खामोश रुदन से
डर लगता था...
आज भी लगता है
और आज भी मैं-
अजीबोगरीब बातें करती हूँ,
सही पहचाना...
बिल्कुल साइकिक की तरह !

01 अगस्त, 2009

तुम और मैं.....(mka)


mka यानी मेरी ज़िन्दगी,मेरे बच्चे....मृगांक,खुशबू,अपराजिता.........
मैंने उन्हें अपने मन का कैनवास दिया है, चित्रित करने की हर संभव कोशिश की है.........

तुम-
देवदार लगते हो....
उन्नत,विशाल,दृढ़ ,कोमल
एक सुरक्षा,
एक गहराई मिलती है !
सर उठाकर तुम्हे देखते हुए
अपने वजूद पर गौरवान्वित होती हूँ,
अपने हाथों पर
अदम्य विश्वास होता है..................

तुम-
गुलाब हो....
काँटों की ज़रूरत क्यूँ होती है
तुम्हारी खुशबू से जाना !
रूप,रंग और विशिष्टता
तुम्हारी सम्पूर्णता है
जो मुझे सम्पूर्णता देती है...........

तुम-
छुईमुई .....
ख़ुद में सिमट जाती हो
फिर धीरे-धीरे
परिवेशीय विस्तार लेती हो...
समस्त कोमलता के संग
तुमने अक्सर बताया है
स्पर्श से पहचान मिलती है,
दुनिया-
स्वभावगत विशेषता का मूल्यांकन करने में
भूल जाती है,
कि,
इससे ठेस भी लगती है........
इसलिए , परिस्थिति के आगे सिमटो ,
पुनः विस्तार पाओ............

मैं-
तुम जो कह लो !
मेरे घर में
देवदार - सी विशालता,
गुलाब की खुशबू,
छुईमुई की कोमलता है
..........अब तुम जो भी नाम दे दो !

10 जुलाई, 2009

शुक्रगुजार !


दर्द ने मुझे तराशा है,
दर्द देनेवालों की
मैं शुक्रगुजार हूँ........
यदि दर्द ना मिलता
तो सुकून का अर्थ खो जाता,
खुशियों के मायने बदल जाते,
अपनों की पहचान नहीं होती,
गिरकर उठना नहीं आता,
आनेवाले क़दमों में
अनुभवों की डोर
नहीं बाँध पाती.........
मैं शुक्रगुजार हूँ,
उन क्रूर हृदयों का
जिन्होंने मुझे सहनशील होना सिखाया,
सिखाया शब्दों के अलग मायने
सिखाया अपने को पहचानना ........
तहेदिल से मैं शुक्रगुजार हूँ,
दर्द की सुनामियों की
जिसने मुझे डुबोया
और जीवन के सच्चे मोती दिए...........

30 जून, 2009

हम बस चाहते हैं !


जब हम
निरंतर कोई कल्पना करते हैं
तो,
उड़ान,चाहत,आदान-प्रदान
सिर्फ़ हमारा होता है !
फिर व्यर्थ हम
दुःख में गोता लगाने लगते हैं,
फिर एक निष्कर्ष निकालते हैं
और समझौता कर लेते हैं !
कल्पना में जो तस्वीर होती है
उसकी चाभी
हमारे हाथ में होती है...
उससे परे
उसकी कल्पना का सूत्र
दूसरे के हाथ में होता है या नहीं
इसे नहीं समझ पाते
ना समझना चाहते हैं.......
हम सिर्फ़ चाहते हैं
आकलन करते हैं
और दुखी होते हैं !!!!!!!!!!!!!!!

10 जून, 2009

कीमत !


शब्दों की कीमत होती,
तो मेरे शब्द
अनमोल होते....
मेरी आवाज़ की कीमत होती,
तो मेरी आवाज़ में कोई बात होती....
ऐसा जब उसने कहा,
तो मैं अवाक रह गई !
शब्द पागलों की तरह हंसने लगे,
पैसे के तराजू पर
उसके भावपूर्ण अर्थ हल्के हो गए....
मैंने तो कीमत देखी
आंखों में,
चेहरे की मुखरता में,
दिल की गहराइयों में -
इनको ही अपनी आत्मा की तिजोरी में
कैद किया,
क्रमवार जेहन में रखा,
जिनके अन्तर से मेरा नाम निकला,
इसकी क्या कीमत लगाओगे तुम ???

01 जून, 2009

जीत निश्चित है !



बाल-विवाह , सती-प्रथा ,
अग्नि-परीक्षा........................
जाने कितने अंगारों से गुजरी
ये मासूम काया !
यातनाओं के शिविर में,
विरोध की शिक्षा ने ,
उसे संतुलन दिया ,
शरीर पर पड़े निशानों ने
'स्व' आकलन का नजरिया दिया !
हर देहरी पर ,
'बचाव' की गुहार लगाती,
अपशब्दों का शिकार होती,
लान्छ्नाओं से धधकती नारी ने
अपना वजूद बनाया.........
माँ सरस्वती से शिक्षा,
दुर्गा से नवशक्ति ली ,
लक्ष्मी का आह्वान किया-
प्रकाशपुंज बनकर ख़ुद को स्थापित किया !
समाज का दुर्भाग्य -
उसकी शक्ति,उसकी क्षमताओं से परे
ह्त्या पर उतर आया !
आज फिर ,
कुरुक्षेत्र का मैदान है ,
और कृष्ण नारी सेना के सारथी............
यकीनन,
जीत निश्चित है !


29 मई, 2009

टिकाटिप्पणी


मैं उनके घर की नहीं ,
लेकिन हर रोज
वे मुझे खाने की मेज़ पर सजाते हैं,
बड़े चाव से अपनी प्लेट में मुझे परोसते हैं
और टिकाटिप्पणी शुरू ............
" इसमें अपना कोई स्वाद और रूप नहीं है !
नमक थोड़ा और ज्यादा हो
तो ठीक रहेगा...........
धीमी आंच पर ही इसे बनाना चाहिए.......
पता नहीं क्यूँ,
कुछ जले जैसा टेस्ट रहता है इसका ...."
अनवरत कमी !
पर अपनी मेज़ पर मुझे लाना नहीं भूलते
.........
बिना टिका टिप्पणी के
उनका पेट नहीं भरता,
या यूँ कहें ,
दिन नहीं बनता !

08 मई, 2009

मुझसे सुंदर कौन???

मैं हूँ पायल,
मैं हूँ गीत,
रिमझिम-रिमझिम बारिश हूँ...
मैं हूँ खनकती पुरवाई,
मैं ही बसंत की खुशबू हूँ...
मैं हूँ आँगन,
मैं हूँ पवन,
मैं ही बाबुल की दुनिया हूँ....
मैं हूँ ममता का दूजा रूप,
भाई की कलाई की डोरी हूँ,
मैं हूँ शक्ति,
मैं विद्या हूँ,
मैं ही लक्ष्मी का रूप हूँ....
बुलबुल हूँ,
गौरैया हूँ,
कोयल की गूंजती कूक हूँ....
धरती में हूँ,
अम्बर पे हूँ,
मुझसे सुंदर कौन?
थामलो मेरा हाथ,
मुझसे कर लो बात,
मैं ही मन हूँ,
मैं हूँ जीवन,
धड़कनों के संग-संग हूँ....
क्यूँ मुझको यूँ खोते हो,
मुझसे सुंदर कौन?
कहो...मुझसे सुंदर कौन??????????

01 मई, 2009

पुनर्जन्म !

गीता में श्री कृष्ण ने कहा है
नैनं छिदंति शस्त्राणि,नैनं दहति पावकः ,

चैनं क्लेदयांत्यापोह, शोशियती मारुतः ......................
यानि आत्मा अमर है।
तो प्रश्न उठता है कि इन आत्माओं का स्वरुप क्या होता है, क्या यह फिर किसी नए शरीर में आती है, कर्म का हिसाब चुकाने के लिए क्या आत्मा नए-नए रूपों में जन्म लेती रहती है? हाँ- तो यही है पुनर्जन्म!
जितने लोग उतने विचार...
सामान्य धरातल पर मुझे विश्वास है, आत्मा नए शारीरिक परिधान में पुनः हमारे बीच आती है। अगर सतयुग, द्वापरयुग सत्य है तो यह भी सत्य है कि आत्मा का नाश नही, वह जन्म लेती है। राम ने कृष्ण के रूप में, कौशल्या ने यशोदा, कैकेयी ने देवकी, सीता ने राधा के रूप में क्रमशः जन्म लिया...कहानी यही दर्शाती हैतो इन तथ्यों के
आधार पर मेरा भी विश्वास इसी में है।
ये हुई मेरी बात - अब इसी सन्दर्भ में और लोगों के विचार क्रम से रखते हुए मैं आपके विचारों से अवगत होना चाहूँगी


श्रीमती सरस्वती प्रसाद ( "नदी पुकारे सागर" काव्यसंग्रह की लेखिका ) के शब्दों में,

" प्रभु के स्वरुप को किसी ने देखा नही है, पर अपनी भावनाओं के धरातल पर प्रभु की प्रतिमा
को भिन्न भिन्न रूप देकर स्थापित कर लेते हैं - यही निर्विवाद सत्य है मान कर आस्था का निराजन अर्पित करते हैं। ठीक इसी प्रकार पुनर्जन्म के प्रश्न पर गीता की सारगर्भित वाणी सामने आती है। छानबीन और तर्कों से परे आत्मा की अमरता पर विश्वास कर के मन को सुकून मिलता है।
मैंने खोया और वर्षों मेरी आत्मा भटकती रही अचानक एक रात मेरी तीन साल की नतनी, जो मेरे ही पास रहती थी रात १२ बजे अचानक उठी और कहा "अम्मा उठो कविता सुनो" और उसने अपने ढंग से एक लम्बी कविता सुनायी। कविता की शुरुआत थी 

"माँ तुम दुःख को बोल दो, दुःख तुम पास नही आओ 
                                  मेरा गुड्डा खोया गुड्डा गया अब गया....."

क्या सच है क्या झूठ क्या भ्रम...इन सब से परे मन को अच्छा लगता है सोचना वह है यहीं कहीं पास ही....."



कर्नल अजय कुमार का कहना है, "मैं पुनर्जन्म नही मानता , जितनी कहानियाँ
निकलती हैं वह सब झूठी हैं और अपनी सोच के आधार पर लिखी जाती हैं।"


उनकी पत्नी श्रीमती उषा कुमार के विचार भी कुछ इसी तरह के हैं। उनका कहना है, "इस विषय पर मैंने कभी सोचा ही नही।
क्या है पूर्व जन्म और क्या है पुनर्जन्म...इन सारी बातों से परे मैं वर्त्तमान को जी रही हूँ और यही सत्य है।"




श्री अभय कुमार सिन्हा ( retd. market secretary ) के शब्दों में, " पुनर्जन्म का कोई प्रूफ़ नही है। सारी कहानियाँ मनोवैज्ञानिक स्वभाव की हैं। जैसे भगवान् आदमी
के मन की उपज हैं, वैसे ही पुनर्जन्म के विचार हैं। यह सोचने के लिए की मृत्यु के बाद सब ख़त्म हो जाता है, एक बड़ी भयंकर ताकत की ज़रूरत होती है। दरअसल मनुष्य एक continuity चाहता है तो इसे ही मान लेने में मानसिक संतुष्टि मिलती है। जिन्हें
इन बातों पर विश्वास होता है वे कम कारण ढूंढते हैं, जो हर बात में कारण जानना चाहेंगे उन्हें इन बातों पर विश्वास नही होगा।"

इनकी पत्नी श्रीमती रेणु सिन्हा के शब्दों में, "मैं जब छोटी थी तो पुनर्जन्म पर अनेक कहानियाँ सुनी, बड़े होने पर
पढीं, पर इसका कोई ठोस प्रमाण वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नही था... पर, हिंदू धर्म में इस बात पर लोगों में विश्वास है और यह सोच मन को एक शक्ति देती है कि हम किसी नए रूप में इस धरती पर फिर आयेंगे, मिलेंगे...मेरी सोच भी
कहती है कि पुनर्जन्म होता है।"



श्री नवीन कुमार ( retd. SBI officer ) के कथनानुसार, " Hindu mythology और मेरे विचार से आत्मा नही मरती... पुनर्जन्म ज़रूरी नही कि मनुष्य योनि में ही हो, पर जब पुनर्जन्म है तो मनुष्य और अन्य जीव-जंतुओं में हैं और कई उदहारण भी हैं....जिससे यह प्रमाणित होता हैं कि पुनर्जन्म है."

इनकी पत्नी श्रीमती मंजु श्री का कहना हैं कि " पुनर्जन्म होता हैं या नही इस पर कुछ
कहना आसान  नही है, पर मैं गीता को मानती हूँ और गीता के कथनानुसार "आत्मा अजर अमर है" तो मैं मानती हूँ कि पुनर्जन्म होता है। साथ ही कई ऐसी अद्भुत घटनाएं पढने सुनने को मिलती हैं जिससे इस विश्वास को बल मिलता है...वैसे यह सोचना भी अच्छा लगता है कि जो प्रिय गए हैं वे एक दिन लौट आयेंगे."



श्रीमती नीलम प्रभा ( शिक्षिका, हिंदी विभाग,डीपीएस ,पटना) स्पष्ट शब्दों में कहती 
हैं, "पूर्वजन्म या अगला जन्म और बीच में मृत्यु....सब उतने ही सच हैं जितनी कल की ,आज की और कल की  सुबह और प्रकृति के रहस्य हैं !"







श्रीमती वंदना श्रीवास्तव ( प्राचार्या ) के दृष्टिकोण से, "पुनर्जन्म- ऐसा माना जाता है की मृत्यु के पश्चात् मनुष्य के शारीर का कोई हिस्सा बचा रहा जाता है ताकि वह किसी और रूप 
/शरीर में जन्म ले सके,इसके वैज्ञानिक तौर पर अब तक कोई प्रमाण नहीं मिले हैं किन्तु आस्था सभी की यही कहती है की पुनर्जन्म होता है तभी तो किसी से मिलने पर लगता है जैसे हमारा उससे कोई नाता है, हम पहले से ही उस व्यक्ति को किसी तरह जानते हैं ,उसकी आदतें, बोलचाल, व्यवहार बहुत जाना पहचाना लगता है और तब ही कहा जाता है की शायद पिछले जन्म का कोई रिश्ता है,उससे मिल कर लगता है जैसे किसी बहुत पुराने रिश्तेदार से मिल रहे हो जबकि हम पहली बार मिलते हैं.....इससे लगता है की हमारा कोई ना कोई पिछला जन्म तो होगा. कभी कभी किसी स्थान पर पहली बार जाने पर भी ऐसा जान पड़ता है मानो हम वहां पहले कई बार आ चुके हैं, हो सकता है की हमारी पूर्वजन्म की कुछ बातें हमारे सूक्ष्म शरीर में रह जाती हैं जो आत्मा के फिर से नए शरीर में आने पर हमारे अवचेतन मन में इंगित करती हैं की ये सब हमारे साथ पहले घटित हो चुका है और तब ही लगता है की हम पिछले जन्म में भी कहीं ना कहीं,किसी ना किसी रूप में अवश्य थे , और ये हमारा पुनर्जन्म है.मेरे विचार से पुनर्जन्म होता है. "


श्रीमती ज्योत्स्ना (http://jyotsnapandey.blogspot.com/) सहजता से बताती हैं, 
"पुनर्जन्म होता है या नहीं ? प्रश्न अच्छा है ,इस संदर्भ में मैं आपको अपने ही परिवार की एक घटना से अवगत करती हूँ .....
बात उन दिनों की है जब मेरे बड़े भाई जोकि एयरफोर्स से अब रिटायर हो चुके हैं ,ढाई वर्ष के थे . भोजन परोसते समय माँ से बोले हम ऐसी प्लेटों में नहीं खाते थे .....
कैसी ? माँ ने जिज्ञासावश पूछा . 
चीनी-मिटटी की प्लेट की तरफ इशारा करके बोले ऐसी में खाते थे . 
अब तो सभी लोग इकट्ठे हो गए और उन बातों को बार बार पूछते ---घर में कौन कौन था ?
मैं मेरी वाइफ और मेरे बच्चे . 
कितने बच्चे हैं ?....दो ,बेटी नाम जस्टी,और बेटे का पैनाडी.
तुम क्या करते थे?...मैं इंजिनियर था ......
क्या हुआ था तुम्हें ?....थोडी सी ज्यादा हो गयी थी ............बस एसीडेंट हो गया .
कैसे .?....मेरी व्हाइट कार पीपल से टकरा गयी थी ........न 
तुम्हारा घर कहाँ है ?.......मानरोविया..
उस समय इस विषय पर बहुत शोध हो रहे थे ,तो एक पारिवारिक मित्र जो की राजनैतिक भी थे ने सलाह भी दी--"चलो घूमना भी हो जायेगा और खर्चा सरकार उठाएगी .बेटे को ले चलो"
माँ को डर था की कहीं बेटा ही न हाथ से चला जाये उनहोंने मना कर दिया .  
{हम गाँव की मिटटी से जुड़े लोग हैं ,आप कह सकती हैं ठेठ देहाती .ऐसे में उनके द्वारा प्रयुक्त अंग्रेजी के शब्द वास्तव में विस्मित करते थे .अब फैसला आप पर छोड़ती हूँ की पुनर्जन्म होता है या नहीं .}"

श्रीमती नीता (http://neeta-myown.blogspot.com/) ने कहा, "अचानक कोई सामने से आकर  हँस देता है..ना जान ना पहचान ...अचानक कभी कोई मदद कर देता है...जब हम कोई टिकिट की बड़ी सी लम्बी कतार में खड़े हों और अचानक कोई आ कर कहे हमें, कि मैंने ये कूपन लिया है ज्यादा है क्या आपको चाहिए... कभी कोई आ कर कहता  है कि मुझे ऐसा क्यों लगता है की मैंने आपको कही देखा है , ऐसा महसूस होता है...और हमारे दिल के तार भी हिल जाते है॥कभी कुछ काम कर रहे हों तो ऐसा होता है की ये काम हमने पहेले भी तो किया  है...कभी कोई ऐसी जगह पे जहाँ  हम जाते है जहाँ 
 पहली  ही बार गये हों पर ऐसा लगता है  यहाँ आए हों पहले भी...  नेट का कोई विश्व था ऐसा हमें पता नहीं था..पर अब ऑनलाइन हमारे बहोत सारे दोस्त है..ऑरकुट में लाखो लोग है..हम क्यों उसमे से १०० को अपना बनाते है..और उसमे से भी क्यों हम सिर्फ १० से जुड जाते  हैं ...उसके दुःख से हम दुखी होते है..और उसके सुख से हम सुखी होते है..क्यों एक ही के घर में रह रहे लोग एक दूसरे से बहुत  दूर होते है और बहोत दूर रहेने वाले लोग दिल के करीब होते है.. क्या आपके दिल में ऐसे सवाल नहीं आते  ?कि क्यों कभी कोई अपना लगने लगता है............हाँ  कुछ है जिसे हम पुनर्जन्म कह सकते है...क्या आप मानते है??" 


श्रीमती प्रीती मेहता, (http://ant-rang.blogspot.com/) ने बड़े ही जीवंत अंदाज में कहा, "वेसे  तो  पुनर्जनम  एक्  आस्था  और  विश्वास  का  विषय  है … वेदों  और  पुराणों  में  कहा  गया है - शरीर  नश्वर  है , आत्मा  तो  अमर  है .. यानि  कह  सकते  है  कि  शरीर  मरता  है, आत्मा  नहीं …  तो  यह  आत्मा  जाती  कहाँ   है  ..? आत्मा  एक्  शरीर  छोड़  दूसरे  शरीर  को  धारण  कर  लेती  है … 
मेरे  लिए  मेरा  अनोखा  बंधन  ही  पुनर्जन्म है ... यह  बंधन  हर  किसी से  तो  नहीं  बंधता .. और  जहा  बंधता  है , वहाँ  बस  बंधता  ही  जाता  है ...बिना  किसी  शर्तो  के , बिना  किसी  उम्मीद  के ...बस  बंध  जाता  है  ....
अनोखा-बंधन
कितना सुन्दर और पवित्र नाम ? 
सुन कर ही कुछ अलौकिक  अनुभूति का एहसास हो जाता है… 
जैसे पूर्व-जन्म  का कोई बंधन ?  
जो युग-युग से जन्म लेकर इक दिल से दूसरे  दिल को जोड़ रहा हो ..?
जो निर्दोष, निस्वार्थ प्रेम भाव का झरना बन अविरत बहता रहता है .. 
और  यह एहसास सिर्फ  महसूस किया जा सकता है,
इसे  शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकते . 
जो  सामाजिक  और  खून के रिश्तो से परे है और कुछ अलग  है …
जीवन  में  बहुत बार अचानक किसी से संबंध बन जाते है,  
मन में सकारात्मक  और नकारात्मक तरंगे उठने लगती हैं  , 
कभी- कभी कुछ  क्षण का परिचय  कुछ ख़ास बन जाता है , 
और ऐसे संबंध जो ना समझ आये या कहलो 
जिसका  ताल-मेल बुद्धि से भी ना मिल पाए , 
ऐसे संबंध   ऋण का बंधन  हैं  ,  
और यह  बंधन  कब , क्यों , कैसे … किसी से बन जाता है 
यह समझ ही नहीं आता ... बस  बन जाता है ...
यही है पुनर्जन्म ! "





तो ये है अलग-अलग धारणा.....सकारात्मक,नकारात्मक तथ्यों के बीच! कहीं विज्ञान है,कहीं मन... जो है -  आपके समक्ष है आपके विचारों से जुड़ने की इक्षा लिए! तो अब आप अपने विचार प्रेषित करें, हम जानना चाहेंगे................

प्रीतम एंड पेद्रो

 कभी किसी से माफ़ी मांग लो,कभी किसी को माफ़ कर भी दो... यही शायद प्रीतम एंड पेद्रो की सबसे बड़ी सीख है। यह फिल्म सिर्फ़ एक कहानी नहीं सुनाती...