13 दिसंबर, 2009

प्राण-संचार


तुम्हारे चेहरे की धूप
तुम्हारी आँखों की नमी
तुम्हारी पुकार की शीतलता
मुझमें प्राण- संचार करते गए ........
दुःख के घने बादलों का अँधेरा
मूसलाधार बारिश
सारे रंग बदरंग थे !
पर तुमने अपनी मुठ्ठी में
मेरे लिए सारे रंग समेट रखे थे
मैं रंगविहीन हुई ही नहीं !
लोग राज़ पूछते रहे हरियाली का
विस्मित होते रहे ....
मैं अपने आत्मसुख की कुंजी लिए
तुम्हारे धूप-छाँव में
ज़िन्दगी जीती गई....
कहने को तुम पौधे थे
पर वटवृक्ष की तरह
मुझ पर छाये रहे
मुझमें प्राण-संचार करते गए ...............

11 दिसंबर, 2009

ज़िन्दगी


ज़िन्दगी कभी समतल ज़मीं पर नहीं चलती
उस के मायने खो जाते हैं
तूफानों की तोड़फोड़
ज़िन्दगी की दिशा बनती है
रिश्तों के गुमनाम अनजाने पलों से
आत्मविश्वास की लौ निकलती है

08 दिसंबर, 2009

मैं साथ रहूंगी


मैं खुद एक शब्द हूँ
चाहो तो नज़्म बना लो
बना लो अपनी ग़ज़ल
कोई गीत
कोई आह्लादित सोच
कोई दुखद कहानी....
यकीन रखो
मैं साथ रहूंगी

01 दिसंबर, 2009

बस मैं हूँ !


महत्वाकांक्षाओं के पंख लिए
मैं ही धरती बनी
बनी आकाश
हुई क्षितिज
झरने का पानी
गंगा का उदगम
सितारों की टिमटिमाती कहानी
चाँद सा चेहरा
पर्वतों की अडिगता
नन्ही लडकी के घेरेवाली फ्रॉक - सी घाटी
चिड़ियों की चहचहाहट
सूर्योदय का गान
तितलियों के बिखरे रंग
उमड़ती घटायें
प्रातः राग
संध्या की लाली
शरद की चांदनी
टूटता सितारा
तुम्हारी इच्छाओं की पूर्णता
वसुंधरा की हरीतिमा
किसानों का सुख
मोटी-मोटी रोटियाँ
हरी मिर्च और प्याज
.......
सृष्टि का हर रूप लिया
हर सांचे में ढली
महत्वाकांक्षाओं की उड़ान में
कलम बनी
भावनाओं की स्याही से पूर्ण
सुकून का सबब बनी
.....
मैं यहाँ भी हूँ,
वहाँ भी हूँ
जिधर देखो
मैं हूँ
बस मैं हूँ !

26 नवंबर, 2009

मोक्ष


वो तुम्हारे अपने नहीं थे
जिन्हें साथ लेकर
तुमने सपने सजाये
सूरज मिलते
सब अपनी रौशनी के आगे
एक रेखा खींच ही देते हैं !
शिकायत का क्या मूल्य
या इन उदासियों का ?
'आह' कौन सुनता है ?
वक्त ही नहीं !
गर्व करो-
तुम आज अकेले हो !
साथ है वह सत्य
जिसे कटु मान
तुमने कभी देखा ही नहीं !
भीड़, कोलाहल
आंखों औ कानों का धोखा है
सत्य है 'कुरुक्षेत्र'
जिससे मुक्ति के लिए
मिली प्रकृति.......
धरती,आकाश,पेड़,पौधे
ऊँचे पहाड़,हवाएँ,बूंदें...
इनसे बातें करो
हर समाधान है इसमें !
मृत्यु के बाद-
धरती की बाहें
अग्नि की पवित्र लपटें
पेड़ की शाखाएं
अपने अंक में समेट लेती हैं
रिश्तों से आगे
यही विराम है !
उसके आगे दर्द का सत्य
कटु नहीं कुरूप है
तभी तो
हम उसे जानते नहीं
जानना भी नहीं चाहते.....
उस कुरूपता से
जोड़ा है प्रभु ने मोक्ष द्वार !
पाना है उसे
तो संवारो किसी को...
अपनी निश्छल भावनाएं दो
अंतर्द्वंद से बाहर निकलो
जीते जी अपने संचित पुण्यों में
किसी को शामिल करो !

16 नवंबर, 2009

आकाश को मुठ्ठी में भर लो ..


तुम्हें देखा
तो वह लडकी याद आई
जो फूलोंवाली फ्रॉक पहन
बसंत का संदेशा देती थी
आम्र मंजरों में
कोयल की कूक बन
मुखरित होती थी
जेठ की दोपहरी में
आसाढ़ के गीत गुनगुनाती
रिमझिम बारिश में
कलकल नदी की रुनझुन धार - सी
किसानों के घर की सोंधी खुशबू में ढल जाती थी
शरद चांदनी बन धरती पर उतरती थी ............
आँखें तुम्हारी ख़्वाबों का खलिहान आज भी हैं
गेहूं की बालियाँ अब भी मचलती हैं आँखों में
पर वक़्त ने शिकारी बन
तुम्हें भ्रमित किया है !
एक बात कहूँ?
वक़्त की ही एक सौगात मैं भी हूँ
जागरण का गीत हूँ
जागो
और फिर से अपने क़दमों पर भरोसा करो
उनकी क्षमताएं जानो
और आकाश को मुठ्ठी में भर लो .....

12 नवंबर, 2009

चाँद रोया !!!




उन्हें मालूम था
कुछ सीढियां लगाकर
मैं चाँद से बातें कर लूँगी....
बड़ी संजीदगी से कहा-
'सीढियां रखना उचित नहीं
चोर-उचक्कों का ख़तरा होगा'
........
फिर उनकी नज़र
मेरी सोच के वितान पर पड़ी
इधर-उधर देखते हुए
उन्होंने प्रश्न-चर्चा शुरू की....
अजीबोगरीब प्रश्न
तेज स्वर !
मेरी सोच
खुद की पहचान से विलग होने लगी
हर दिशा
एक प्रश्न बनकर खड़ी हो गई
पर,
चाँद का आमंत्रण पुरजोर रहा .............
उसने चांदनी की सीढियां बनायीं
मुझे खींच लिया..........
अब क्या बताऊँ
चाँद हर रिश्तों से टूटा
मेरी बाहों में फूट-फूटकर रोता रहा
' स्वर्ण कटोरे में
दूध-भात अब कोई नहीं खाता'
कहता रहा,
बिलखता रहा ..............
अनुसंधानों ने उसे भी नहीं छोडा !

06 नवंबर, 2009

!!!




मेरे शब्दों की चोरी हो गयी
कोई दस्तक
कोई नज़्म
कोई ख्वाब
कोई बादल
कोई नाव
कोई रूह बन
हवाओं में तैर रहे हैं
.................
कोई रपट नहीं लिखवाई है अब तक
अपने हैं
शाम होते लौट आयेंगे
मेरे बगैर
उन्हें भी नींद नहीं आती
कोई सपने नहीं बनते !!!

31 अक्टूबर, 2009

कंजूसी कैसी??????????


आपने 'गोलमाल' फिल्म देखी है? उत्पल दत्त का इरीटेशन याद है? नहीं?- तो फिर देखिये ........हाँ,हाँ जिसके नायक अमोल पालेकर थे.
फिल्म बहुत अच्छी है,आपका भरपूर मनोरंजन करेगी,लेकिन इस लेख के द्बारा मैं इस फिल्म को प्रमोट नहीं कर रही हूँ, बल्कि उत्पल दत्त के ऐक्शन को याद कर रही हूँ......उनका " ईईईईईईईईईईईईईईईईईईई " करना आजकल मेरे दिमाग में चलने लगा है.
हम,आप, वे, वो लिखते हैं, बदले में प्रतिक्रया यानि 'टिप्पणी' पाते हैं........बहुत अच्छा लगता है यह देखना कि हमें इतने लोग पढ़ते हैं !!!!!!!!!!!!
पर कई टिप्पणियों को देखकर प्रतीत होता है( जो सच भी है) कि खानापूर्ति की गयी है ..........
'बहुत सुन्दर-बधाई'- बधाई !? इस बधाई ने मुझे हताश कर दिया , इस नज़्म के लिए बधाई क्यूँ? ........मेरी बेटी ने कहा ' दिमाग अभी भी चल रहा है, इसकी बधाई' !
'उम्दा', 'सुन्दर', 'नाइस '.............माना वक़्त कम है,माना सारी रचनाएँ दिल तक नहीं जातीं,पर जिन रचनाओं में दम होता है,संजीदगी होती है, समय की गहरी नाजुकता होती है-उस पर अपनी सहज अभिव्यक्ति को कैसे रोक सकते हैं ! अरे भाई, ईश्वर ने कलम की ताकत दी है, शब्दों की थाती दी है,
कंजूसी कैसी??????????

28 अक्टूबर, 2009

भावनाओं के राग !



शब्द-
एक देश से दूसरे देश
एक शहर से दूसरे शहर
एक दिल से दूसरे दिल तक जाते-जाते
या तो अपने अर्थ
अपनी गरिमा खो देते हैं
या फिर निखर जाते हैं .........
भावनाओं को देखना-समझना
आसान नहीं होता !
जिस पात्र को
हम धरोहर समझते हैं
कई जगहों पर
उसका कोई मूल्य नहीं होता !
पर कवि-
जो भावनाओं के गलीचों से गुजरता है
वह
भावशून्य कैसे हो सकता है !
खूबसूरत भावनाओं की बारिश में
वह अन्भीगा कैसे रह सकता है
शुष्क,सपाट,सतही कैसे हो सकता है !
माना-
समुद्र की लहरें आम तौर पर
शोर करती हैं
अति वर्षा विभीषिका लाती है
........
पर जब नन्हीं बूंदें
गर्म धरती पर
टप से गिरती हैं
तो किसान का घर
सोंधे राग सुनाता है .........



22 अक्टूबर, 2009

मेरी नज़्म............


मेरी नज्मों ने तुम्हें आवाज़ दी है
ओस की तरह तुम आओ
सुबह की पहली किरण में तुम्हें देखूं
आंखों में काजल बनाकर
दिन गुजार लूँ
फिर शरद चांदनी में
तुम्हारी राह देखूं..........!
मेरी नज्मों ने तुम्हें आवाज़ दी है
पर्वतों पर
बादल बन उतर आओ
छू जाओ मुझे
मैं भीग उठूं
फिर तुम
इन्द्रधनुष बन जाओ
और मेरी नज्मों को
सात रंगों की बानगी दे जाओ...........!
मेरी नज्मों ने तुम्हे आवाज़ दी है
अगर की सुगंध में बस जाओ
मेरी पूजा का प्रसाद बन
मुझे आशीष दो
मंत्र बनकर मेरे अन्दर
मुखरित हो जाओ.............!
मेरी नज्मों ने आवाज़ दी है
तुम मेरी नज़्म बन जाओ !!!!!!!!!!!!!!!!!

प्रीतम एंड पेद्रो

 कभी किसी से माफ़ी मांग लो,कभी किसी को माफ़ कर भी दो... यही शायद प्रीतम एंड पेद्रो की सबसे बड़ी सीख है। यह फिल्म सिर्फ़ एक कहानी नहीं सुनाती...