18 फ़रवरी, 2010

सुकून


ना किसी डाकिये की ज़रूरत है
ना कबूतर की
मेरे पंख हैं ना !
उड़कर आना
अपनी चोंच में दबे शब्द
तुम्हारी मेज पर रखना
सुकून देता है
और अगली लम्बी उड़ान की
प्रबल इच्छा होती है

14 फ़रवरी, 2010

दिल का हिस्सा


मैं दिल का वह हिस्सा हूँ
जिससे तुम कहो ना कहो
वह सुनता है
धड़कता है.....
कई बार आँखें नम होती हैं
पलकों पे ठहरी बूंद
तुम्हारी परछाईं बन जाती है

09 फ़रवरी, 2010

कुछ कह दो


कुछ भी पुराना नहीं
कुछ भी अनजाना नहीं
कुछ भी अनकहा नहीं
कुछ भी अनसुना नहीं
फिर भी क्यूँ हैं हम अजनबी से
क्यूँ ओढ़ ली है हमने
ख़ामोशी की चादरें
क्यूँ हमने अपनी-अपनी सरहदें बना ली हैं

प्यार की बातें भी तो
हमने ही की थीं
एहसास की बातें
हमने ही की थीं
तो फिर क्यूँ
-
आज आँखें वीरान हैं
क्यूँ दिलों की धरती
बाँझ हुई जाती है
मौन तोड़ो
कुछ कह भी दो !

03 फ़रवरी, 2010

ख्वाब पूरे होंगे




कहता है वो
ख्वाब होते ही हैं
सच होने के लिए
यूँ ही ख्वाब आँखों में नहीं उतरते

सुनते ही एक अदृश्य डोर
मेरी पाजेब बन जाती है
रुनझुन की मिठास बन
उसके आँगन में
पूजा के दीप जलाती है

कहता है जो वह सच
तो ये ख्वाब भी पूरे होंगे !

22 जनवरी, 2010

इमरोज़ की कलम से इमरोज़


नज्मों की दोस्ती लम्हा-दर-लम्हा बढ़ी
कुछ तुमने कहा
कुछ हमने कहा
पलों की गतिविधियाँ बढीं ...................इन्हीं गतिविधियों के अंतर्गत इमरोज़ की कलम से इमरोज़
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खेतों में खेलने के बाद
रंगों से खेलने के लिए
मैं लाहौर के आर्ट स्कूल में पहुँच गया
कुछ बनने
कुछ ना बनने से बेफ़िकर
तीन साल आर्ट स्कूल में
मैं रंगों से खूब खेला

जो कुछ हो चुका है
उसे दुहराने में
मुझे कोई दिलचस्पी नहीं
कुछ नए की तलाश में रहता हूँ-
इंतज़ार भी करता हूँ ...

मेरे लिए ज़िन्दगी एक खेल है
अपने बैट से
ज़िन्दगी को ख़ूबसूरती से खेलता रहता हूँ...

आर्ट्स स्कूल के बाद ज़िन्दगी के स्कूल में भी
रंगों से खेलना जारी रहा --
कभी सिनेमा के बैनरों के रंगों से
कभी फिल्मों के पोस्टरों के रंगों से
खेल चलता रहा...

एक दौर कैलीग्राफी का भी आया
उर्दू के 'शमा' मैगजीन में कोई छः साल
मैं अपनी तरह की कैलीग्राफी करता रहा
रंगों में भी खेल जारी रहा
ज्यादातर पेंटिंग बनी-ख़ास तरह के टेक्सटाइल के
डिजाईन भी बने
और घड़ियों के नए-नए डायल भी --
और ज़िन्दगी कमाने के लिए बुक कवरस
रंगों से खेलते-खेलते
ज़िन्दगी चलती रही है

एक उम्र शायरा अमृता के साथ
मुहब्बत और आजादी का सत्संग
सारी ज़िन्दगी ने देखा
और जब अमृता पेड़ से बीज बन गई
तो एक नया मौसम आ गया
अनलिखी नज्मों को लिखने का मौसम--
जो मैं अब लिख रहा हूँ ....




और आखिर में मुझसे यूँ कहते हुए--------------


रश्मि


कई सवाल होंगे
जो तुमने अभी पूछे नहीं
पर वो ज़िन्दगी में हैं
कई शक्लों में

मेरी नज्में अक्सर
सवाल भी उठाती हैं
और जवाब भी ढूंढती हैं


इमरोज़









20 जनवरी, 2010

'अनुभूतियाँ' दीपक चौरसिया 'मशाल' का काव्य-संग्रह


'अनुभूतियाँ' दीपक चौरसिया 'मशाल' का काव्य-संग्रह - अनुभूतियों के दस्तावेज़ हैं. एक-एक एहसास कदम-दर-कदम हमें बहुत कुछ
सोचने पर विवश करता है - कवि का परिवेशीय व्यक्तित्व उसकी कलम की आत्मा है. जीवन के हर रंग रचनाओं में दृष्टिगत हैं ......
दीपक जी की पहली कविता 'आज भी' दिन भर फिरकनी सी खटती माँ के जीवन का बहुमूल्य सार है, कई माओं के चेहरे जीवंत हो उठते हैं !
कई प्रतीक्षित पार्थ की आँखों के दर्द को बखूबी उकेरते हुए पूछा है 'हल्का क्यूँ है सच का पलड़ा?' कृष्ण का आह्वान कलम की
पूर्णता है !
सोच में हर बात से अलग ब्रम्हांड की सोच नयी बातों का सिरा है, जिसे पकड़कर हम बहुत कुछ सोचने को बाध्य होते हैं.उम्र के २९ वें पडाव तक पहुँचते हुए कवि कई अनुभूतियों से गुजरा हुआ मिलता है यह कहते हुए कि
'कृष्ण बनने की कोशिश में
मैं भीष्म होता जा रहा हूँ
अक्सर चाहता हूँ वसंत होना
जाने क्यों ग्रीष्म होता जा रहा हूँ !'
देश की स्थिति को उजागर करते भाव दिल को झकझोरते हैं-
'बापू तेरी सच्चाई की बोली
कब लगनी है?
बापू तेरे आदर्शों की बोली
कब लगनी है?'
हारे हुए हालातों को कवि खुले द्वार देता है -
पूरे संग्रह का एक पक्ष बहुत ही गंभीर, प्रशंसनीय है.........'छोटी बऊ(दादी)'का चित्रण , जो कि कवि के ही शब्दों में एक अतुलनीय प्रेम के आदर्श का प्रतिष्ठापन है, जो उनकी दादी को सम्मान देता है .
कविताओं के मर्म से गुजरते हुए मैं कवि के सुलझे व्यक्तित्व के और करीब आई हूँ, और करीब से जाना है, और यही दुआ शामिल की है कि कलम की प्रखरता बनी रहे, कवि जीवन के बहुमूल्य क्षणों का स्तम्भ बने !

19 जनवरी, 2010

मुश्किल है !


टूटते तारे ने कहा
'मांगो मुझसे
जो चाह लो, मिलेगा '
मैंने कहा -
'तुम फिर से अपनी जगह पर आ जाओ'
धरती में समाहित तारा
बोला- मुश्किल है !

( कहने का तात्पर्य यह कि बड़ी-बड़ी इच्छाओं को पूरी करनेवाला भी खुद के लिए असमर्थ होता है )

08 जनवरी, 2010

प्रत्यंचा




मन की धाराएँ
तटों से टकराकर
जब गुमसुम सी लौटती हैं
तो दिशा बदल
क्षितिज के विस्तार में
बढ़ने लगती हैं
और धरती से आकाश तक
अपनी प्रत्यंचा खींच देती हैं

02 जनवरी, 2010

अकेलापन क्यूँ?




अरसा............जाने कितना अरसा हुआ
कोई चिठ्ठी लेकर डाकिया नहीं आया
लेटर बौक्स में पड़े रहे-
बिजली बिल, मोबाइल बिल
या कुछ प्रचार पत्र......
जानती हूँ,
सबकी अपनी दुनिया है
अपनी खुशियाँ, अपने दायरे
अपने गिने-चुने सम्बन्ध-
तो फिर ये अकेलापन क्यूँ?

29 दिसंबर, 2009

एक अलग पगडंडी




तराजू के पलड़े की तरह
दो पगडंडियाँ हैं मेरे साथ
एक पगडंडी
मेरे जन्मजात संस्कारों की
एक परिस्थितिजन्य !
मैंने तो दुआओं के दीपक जलाये थे
प्यार के बीज डाले थे
पर कुटिल , विषैली हवाओं ने
निर्विकार,संवेदनाहीन
पगडंडी के निर्माण के लिए विवश किया
................
दुआओं और संवेदनाहीन के मध्य की मनःस्थिति
कौन समझता है !
समझकर भी क्या?
अनुकूल और विपरीत पगडंडियाँ तो साथ ही चलती हैं !
पलड़ा कौन सा भारी है
कौन कहेगा ?
वे पदचिन्ह - जो दुआओं की पगडंडी पर हैं
या वे पदचिन्ह
जिन्होंने आँधियों का आह्वान किया
और एक अलग पगडंडी बना डाली !

22 दिसंबर, 2009

नज़्म और रूह !


कभी फुर्सत हो तो आना
करनी हैं कुछ बातें
जानना है
कैसी होती है नज्मों की रातें.....
कैसे कोई नज़्म
रूह बन जाती है
और पूरे दिन,रात की सलवटों में
कैद हो जाती है !
पूरा दिन ना सही
एक पल ही काफी है
प्यार को पढ़ने के लिए
नज़्म से रूह
रूह से नज़्म में बदलने के लिए !


प्रीतम एंड पेद्रो

 कभी किसी से माफ़ी मांग लो,कभी किसी को माफ़ कर भी दो... यही शायद प्रीतम एंड पेद्रो की सबसे बड़ी सीख है। यह फिल्म सिर्फ़ एक कहानी नहीं सुनाती...