
मन उदास रहता है
कई बार...
हवा की खुशनुमा चपल चाल भी
अच्छी नहीं लगती
ज़मीन पर पाँव रखने का
चलने का दिल नहीं होता
अपने सारे प्रिय खिलौने
सहमे-सहमे नज़र आते हैं
मोबाइल हाथ में लिए
देखती रहती हूँ ...
किसका नंबर घुमाऊं
पर रुक जाती हूँ !
पता नहीं क्या कर रहे होंगे
परेशान होंगे
व्यस्त होंगे !
और मैं कहूँगी भी क्या ?
कि हवा अच्छी नहीं लगती ..
सब हँसेंगे
'ये क्या बात हुई '
पर क्या यह सहज बात है ?
सब हवा को तरस रहे
और मैं हवा से बेज़ार हूँ
यह तो एक बीमारी हो गई !
कारण?
कौन ढूंढेगा ?
और ढूंढ भी लिया तो इलाज !
न हवा को समझाया जा सकता है
न मुझे बहलाया जा सकता है
(बहल जाने की उम्र होती है) !
ऐसे में -
चल मन
एक छोटा सा ब्रेक लेते हैं
जिन नंबरों को घुमाना चाहती हूँ
उन्हें पास बुलाते हैं
बेसिर पैर की बातें करते हैं
और एक कमरे में
बेतुकी बातों पर हँसते-हँसते सो जाते हैं
.............
सुबह की चाय तब बनेगी
जब नींद पूरी होगी
जब सब साथ हों
तो एक चाय भी बिना तू तू मैं मैं के
कहाँ स्वादिष्ट होती है !
तो देर किस बात की ?
हलो ...
(ख़ास नाम ख़ास लोगों को पता है)
कोई सवाल नहीं ,
जल्दी आओ ...








