30 नवंबर, 2013

ज़िन्दगी फिर से चले !






रात गए नींद नहीं आती
उम्र का असर है
या अनुभवों का तनाव
घड़ी की टिक टिक की तरह
हर दौर की सीढ़ियाँ चढ़ती-उतरती हूँ
साँसें चढ़ जाती हैं
तो बचपन के तने से टेक लगा
बैठ जाती हूँ
आँखें दूर कहीं लक्ष्य साधती हैं
कभी चेहरे पर मुस्कान तैरती है
कभी भय
कभी उदासी
कभी  … निर्विकार होना ही पड़ता है !
.... !
बचपन के तने से टिके शरीर के मन में
कई सवाल उठते हैं
एक के बाद एक  .... लहरों की तरह !
मन से बड़ा समंदर और कहाँ
और उसमें मोती मिल जाए
तो बात ही अलग है !
हाँ तो इस समंदर की कई लहरों के बीच
एक लहर करती है तुमसे सवाल
- तुम तो बिना हाथ पकड़े नहीं चल पाती थी
तो गई कैसे ?
कितनी सीढ़ियाँ उतरनी पड़ी होंगी
डर भी लगा होगा
.... दूर दूर तक  …
हम होकर भी नहीं थे
फिर भी -
तुम चली गई !

साँस रुक जाने से कहानी खत्म हो जाती है क्या  ?
साँसों को रोकने का खेल तो हम बचपन से खेलते आये हैं
फिर ये क्या बात हुई
और कैसे - कि अब तुम नहीं कहीं !
मुझे शक़ होता है
तुम हमें जाँच रही हो  ....
मुझे विश्वास है - तुम पास में रहती हो खड़ी
कभी झुककर अपने मोबाइल पर लिखती हो कुछ
सेंड' नहीं कर पाती
हाथ हिलता है न तुम्हारा
तो ऑफ बटन दब जाता है
और तुम उकताकर लेट जाती हो  …।

सवाल सवाल सवाल  …… एक आता है
एक जाता है
कभी कुछ सकारात्मक ले जाता है
कभी कुछ नकारात्मक से ख्याल ले जाता है !
मन के समंदर के इस किनारे मैं
- चाहती हूँ
बन जाऊँ गोताखोर
सम्भव है मेरे ही मन के एक सीप में तुम मिल जाओ
और -
ज़िन्दगी फिर से चले !

इस बार हम एक एक कदम
सोच-समझकर उठायेंगे
उन लोगों से कोसों दूर रहेंगे
जिनका मन हम सा नहीं था
थोड़ी व्यवहारिकता भी लाएँगे अपने व्यवहार में
सिर्फ मन से चलते रहने पर
बहुत ठोकर लगती है
और खामखाह बीमारी
इलाज़
और अंत में - सबकुछ मानसिक कहा जाये
इस बात का एक भी मौका हम नहीं देंगे

आओ अब सो जाएँ !

23 नवंबर, 2013

लड़ना प्यार है





लड़ने से रिश्ते नहीं खत्म हो जाते  ...
शिकायत  होती ही रहती है आपस में
उसे मन में रखना
सड़ांध पैदा करता है  …
अगर नहीं कह सके अपनी बात
रोकर-झगड़ कर
तो मन के अंदर विषबेल  फैलता है  ....
यूँ भी
विष के बीज मन कभी नहीं बोता
उसे दूसरा कोई बोता है
....
ऐसे में छानबीन तो होनी चाहिए न
किसने भेजा,किसने लगाया
नाम मिल जाए तो पूछो उससे
सम्भव है, सारी बातें झूठी हों
और हम-तुम दूर हो गए हों !!
....
भाई बहन
माँ बच्चे
दोस्त
पति-पत्नी
प्रेम
…… इनसे ही तो लड़ाईयाँ होती हैं
क्योंकि इनसे प्यार होता है
ख़्वाबों जैसे प्यार की उम्मीद होती है
……
(बकवास करते हैं लोग
कि प्यार में उम्मीद नहीं होनी चाहिए )
रूठना-मनाना, फिर खिलखिलाना
इसकी साँसें होती हैं
किसी तीसरे की ज़रूरत नहीं होती
तीसरा !!!
सारी बातें बिगाड़ देता है
………
पर बातों को लड़कर
सवालों से
ठीक कर सकते हैं हम
कर भी लेते हैं
यही नोक-झोंक तो अनुपस्थिति में गहराती है
!!!
ज़िंदगी सवालों का पन्ना है
जो सबसे तेज होता है
उसी से हम सवाल पर सवाल करते हैं
उसकी हार पर खुश होते हैं
अपनी जीत पर इतराते हैं
!!! पन्ना गुम होते
न जीत,न हार  .... किससे लड़ें !
तो मानो -
लड़ना स्वास्थ्य के लिए दवा है
जो जोड़ता है
तोड़ता नहीं
जो तोड़ दे वह लड़ाई नहीं
एक विध्वंसात्मक सोच है !!!
....
इसी फर्क को समझना है
जुड़ने और तहस-नहस करके मिटा देने का  !!!!!!!!!!!!!!!

……… लड़ने से रिश्ते खत्म नहीं होते
न कोई गाँठ पड़ती है
मीलों की दूरी में भी नज़दीकियाँ होती हैं
जब हम एक कॉल,
मेसेज
और चिठ्ठी के लिए लड़ते हैं  …
लड़ना प्यार है
सिर्फ प्यार !

08 नवंबर, 2013

अम्मा तुम गीता का एक महत्वपूर्ण पन्ना हो




पहलू ….
किसी का भी एक नहीं होता
कृष्ण के भी कई पहलू हैं
अलग अलग पहलुओं का जिम्मेदार
न भगवान् होता है न इंसान !
कृष्ण के पहलू यशोदा की दृष्टि से जो होंगे
वो नन्द बाबा की दृष्टि से अलग ही होंगे
गोपिकाओं की अपनी बात
राधा का अपना प्रेम
ऊधो का अपना ज्ञान
ताड़का,कंस,शकुनी की अपनी सोच !
दुर्योधन ने तो बाँध लेने की धृष्टता दिखाई
कृष्ण के पहलू को कमज़ोर समझा !!
जिस कृष्ण के आगे पूरी सभा स्तब्ध थी
वहां दुर्योधन ने उन्हें 'ग्वाला' कहकर सोचा
कि वह श्रेष्ठ है !!!
कृष्ण तो गीता हैं
और मेरी अम्मा तुम उस गीता का एक महत्वपूर्ण पन्ना हो
जिसने पढ़ा ही नहीं
वह व्याख्या क्या करेगा
और कितनी करेगा !!!
हम तो गोपिकाओं की तरह तुम्हारी शिकायत भी करते रहे
और रहे प्रतीक्षित
कि कब तुम हमारी मटकी का उद्धार करो
ऊधो का ज्ञान हमारे लिए निरर्थक था
हम तो गोपिकाओं की झिड़कियों पर निहाल थे
…………।

अब जब तुम गोकुल छोड़ गई हो
तो जाना - तुम्हारे बिना कैसे रहेंगे !!!!!!!!!!!!!!!

25 अक्टूबर, 2013

उत्तर के बियाबान में बस सिर्फ तुम्हारी तलाश है !!!


आँचल की गांठ से 
चाभियों का गुच्छा हटा 
हर दिन 
तुम एक भ्रम बाँध लिया करती  
सोने से पहले 
सबकी आँखें पोछती 
थके शरीर के थके पोरों के बीच 
भ्रम की पट्टी बाँध  …
हमारे सपनों को विश्वास देती  
. !!!
अब जब भ्रम टूटा है 
सत्य का विकृत स्वरुप उभरा है 
तब  …
एथेंस का सत्यार्थी बनने का साहस 
तुम्हारे कमज़ोर शरीर के सबल अस्तित्व में 
पूर्णतः विलीन हो चुका है !
तुम सच कहा करती थी -
अगर हर बात से पर्दा हटा दिया जाये 
तो जीना मुश्किल हो जाये  …. 
तुम्हारे होते सच को उजागर करने की 
सच कहने-सुनने की 
एक जिद सी थी 
अब - एक प्रश्न है कुम्हलाया सा 
कि सच को पाकर  होगाभी क्या !!!
कांपते शरीर में 
न जाने कितनी बार 
कितने सत्य को तुमने आत्मसात किया 
दुह्स्वप्नों के शमशान में भयभीत घूमती रही 
और मोह में बैठी 
हमारे चमत्कृत कुछ करगुजरने की कहानियाँ सुनती गई 
जो कभी घटित नहीं होना था  … 
तुम्हारा सामर्थ्य ही मछली की आँखें थीं 
जो हमें अर्जुन बनाती 
तुम्हारी मुस्कान - हमारा कवच भी होतीं 
और हमारे मनोरथ की सारथि भी 
… अब तो न युद्ध है 
न प्रेम 
है - तो एक सन्नाटा 
जिसे मैं तुमसे मिली विरासत की खूबियों से 
तोड़ने का प्रयास करती हूँ 
…. 
कृष्ण,पितामह,कर्ण,अर्जुन,विदुर  …. 
सबकी मनोदशा चक्रव्यूह में अवाक है 
प्रश्नों का गांडीव हमने नीचे रख दिया है 
क्योंकि  ……
अब कहीं कोई प्रश्न शेष नहीं रहा 
उत्तर के बियाबान में हमें सिर्फ तुम्हारी तलाश है !!!

17 अक्टूबर, 2013

खोलो अपनी पिटारी



अपनी ख़ामोशी 
जो मैंने नहीं गढ़ी 
फिर भी 
वक़्त की माँग पर 
जिसे मैंने स्वीकार किया 
वहाँ मोह की आकृतियाँ 
मेरे कुछ कहने की प्रतीक्षा में बैठी होती हैं 
…. !
मैं तो बातों की पिटारी रही हूँ 
जब पिटारी में कुछ नहीं होता 
तो भी मनगढंत बातें सुनाती हूँ 
पता है मुझे -  
खालीपन कभी मुस्कुराता नहीं 
और मैंने हमेशा चाहा है 
कि शून्य में खिलखिलाहट भर जाए 
ताकि तुम्हारे एकांत में 
यादें मेरी बातों की 
तुम्हें गुदगुदा जाए 
तुम्हारा चेहरा खिल जाये 
और खालीपन भी आश्चर्य में पड़ जाये !!
…… 
गीत,कहानी,नकल,साहस, ……। 
जाने कितनी सारी बातें हैं 
फिर भी सन्नाटा !!!
एकटक देखती आँखों का इंतज़ार 
मैं समझती हूँ 
तभी तो आज  …………… 
दुलारती हूँ उन चेहरों को 
और कहती हूँ -
तुम भी तो कुछ कहो !
खोलो अपनी पिटारी 
कुछ नहीं तो वो जादू दिखाओ 
जो मैंने तुम्हें दिखाया,सिखाया 
गढ़ो कोई कहानी 
या कोई छोटी सी बात 
और खिलखिलाते जाओ मेरे संग 
तब तक 
जब तक 
झूठमुठ के खींचे गए सन्नाटे शर्मा न जाएँ 
डर कर भाग न जाएँ 
………………… 
पता है न 
पलक झपकते सारे दृश्य बदल जाते हैं 
इंतज़ार के सारे मौके ख़त्म हो जाते हैं 
और तब 
सन्नाटा बहुत भयानक होता है 
शून्य में कही अपनी बातें 
ख़ुद तक लौट आती हैं 
और  ……… !!!!!!!!
तो कहो कुछ तुम 
मैं तो पिटारी लिए खड़ी ही हूँ :)

06 अक्टूबर, 2013

समय और ईश्वर के आगे खुद को मुक्त कर दो





सन्देश तो बहुत मिले होंगे 
कुछ पोस्टकार्ड 
कुछ अंतर्देशीय 
कुछ लिफाफे 
कुछ मेल 
…………. पर 
आँखों की खामोश पुतलियों पर लिखे सन्देश 
मिले तुमको ?
किसी और ने गर पढ़ा भी 
तो क्या हुआ 
सन्देश के हर्फ़ तुम्हारे लिए थे 
तुम जानते हो - है न ? 

होठ सी लेने से 
अनभिज्ञता दिखाने से 
तुम मानते हो 
कि उसे मान लिया गया ?
नहीं  …. 
तुम्हारे चेहरे पर जाने कितने सन्देश हैं 
जिसे तुम्हारे अपने पढ़ते हैं 
अपने - जिनसे तुम्हारा रक्त सम्बन्ध है !
वे पढ़ते ही नहीं 
चुनते जाते हैं उन संदेशों को 
संभालकर रखने के लिए 
पर एक बार तुम्हें कहना होगा 
अपने होठों की सीलन खोलकर 
नाहक इधर-उधर भटकते क़दमों को रोककर !!!
…। 
यह समय का मौका है 
ईश्वर का करिश्मा है 
कि तुम्हारी बेचैनी एकत्रित हो गई है 
चुप्पी में जिस व्यक्तित्व को तुमने अनदेखा किया 
उसे बताने का वक़्त आ गया है 
एक विश्वास रखो -
क्षणांश को क्रोधित होकर भी 
प्यार की ताकत सबकुछ समेट लेती है 
परिस्थितिजन्य गलतियों पर 
स्नेहिल स्पर्श से क्षमा की अनुभूति देती है 
वे अपने - जो दूर नज़र आने लगे थे 
यक़ीनन उनका विश्वास - 
तुम्हें हँसने का 
बिलखकर रोने का 
कुछ भी कहने-सुनने का 
इत्मीनान भरा साहस देगी 
एक दूसरे की आँखों में उभरे संदेशों को 
बताने का मौका देगी  … 
बस-
समय और ईश्वर के आगे खुद को मुक्त कर दो 

30 सितंबर, 2013

माँ हो या अम्मा या मईया या … जैसे चाहो पुकार लो, वह ईश्वर रचित असीम शक्ति होती है




दिगंबर नासवा जी - जागती आँखों से सपने देखना जिनकी फितरत है - माँ के लिए उभरे एहसासों से मैंने अपने भीतर के एहसासों का सिरा जोड़ा है - माँ हो या अम्मा या मईया या  … जैसे चाहो पुकार लो, वह ईश्वर रचित असीम शक्ति होती है  . 

उस शक्ति के नाम दिगंबर नासवा जी =

माँ का हिस्सा ...

मैं खाता था रोटी, माँ बनाती थी रोटी    
वो बनाती रही, मैं खाता रहा    
न मैं रुका, न वो 
उम्र भर रोटी बनाने के बावजूद उसके हाथों में दर्द नहीं हुआ   

सुबह से शाम तक इंसान बनाने की कोशिश में  
करती रही वो अनगिनत बातें, अनवरत प्रयास      
बिना कहे, बिना सोचे, बिना किसी दर्द के   

कांच का पत्थर तराशते हाथों से खून आने लगता है   
पर माँ ने कभी रूबरू नहीं होने दिया 
अपने ज़ख्मों से, छिले हुए हाथों से   
हालांकि आसान नहीं था ये सब पर माँ ने बाखूबी इसे अंजाम दिया 

अब जब वो नहीं है मेरे साथ 
पता नहीं खुद को इन्सान कहने के काबिल हूं या नहीं 

हां ... इतना जानता हूं 
वो तमाम बातें जो बिन बोले ही माँ ने बताई 
शुमार हो गई हैं मेरी आदतों में 

सच कहूं तो एक पल मुझे अपने पे भरोसा नहीं 
पर विश्वास है माँ की कोशिश पे 
क्योंकि वो जानती थी मिट्टी को मूरत में ढालने का फन 

और फिर ... 
मैं भी तो उसकी ही मिट्टी से बना हूं 


और मेरे एहसास यानि रश्मि प्रभा के =


ये सच है न अम्मा ?

कितने अजीब होते हैं रास्ते … 
तुम्हारी बातों की ऊँगली थामे 
पहले मैं तुम्हारे नईहर के घर घुमती थी 
फिर हर जगह से होकर
हम जगदेवपथ के छोटे से घर में जीने लगे
तुम्हारा घर मेरे साथ
बन गया था सबका मायका 
फिर हुआ पुणे का सफ़र …
……………
अब एक खाली कमरा
और ICU का 2 नम्बर बेड
मेरी जेहन में बस गए हैं …
रांची से चलते समय
मन का एक कोना खाली कमरे की खिड़की पर
छोटे बालकनी में
तुम्हें देख लेने की लालसा में
निहारता बढ़ गया यह कहते हुए
'चल अम्मा साथे'
……।
यह भी अजीब ही बात है
कि तुम्हारी असह्य तकलीफ के आगे
तुम्हारी मुक्ति के लिए
मैंने प्रभु का आह्वान किया
- - - किसी जादू की तरह
तुम शारीरिक पिजड़े से मुक्त हो गई
पर पिंजड़े की सलाखों पर जो निशाँ थे
वे मुझे तकलीफ देते हैं ……

मैं आँखें बंदकर तुम्हारा आह्वान करती हूँ
हाँ अपनी सुन्दर सी अम्मा का
हाँ हाँ वही सीधी माँगवाली लड़की
जो कभी तरु थी
कभी सरू
कभी कुनू
और कहती हूँ -
तुम्हारे अपने कई कमरे हैं
जहाँ से तुम कभी नहीं जा सकोगी
………
ये सच है न अम्मा ?

03 सितंबर, 2013

अम्मा



अब अम्मा का फोन नियम से नहीं आता 
'साईं समर्थ' 
गुड नाईट। … नहीं सुनती उनसे 
मैं कर देती हूँ आदतन मेसेज 
कोई जवाब नहीं आता 
कभी फोन करूँ भी 
तो अम्मा उठाती नहीं 
उठाया भी तो बगल में रख देती है 
झल्लाती है हौले से - "कुछ सुनाई ही नहीं देता"
…… 
कभी वो करती है तो लपककर उठाती हूँ -
'हाँ अम्मा बोल  …'
कराहती है अम्मा 
कभी कहती है - 'बहुत तकलीफ,बहुत तकलीफ  ….'
कभी - 'बुला लो,बुला लो  ….'
कभी - 'अह अह अह अह  ….'
कभी - '…………………….'
इधर दो तीन दिनों से 
हर दिन (करीबन 3 बजे)
आधी रात को मोबाइल बजने लगा है 
देखती हूँ,सुनती हूँ - ट्रिन ट्रिन ट्रिन ट्रिन 
नहीं उठाती  - 
घबराहट होती है…… 
वो घुटी घुटी कराहट मैं बर्दाश्त नहीं कर पाती 
………………। 
उम्र के इस पड़ाव पर 
अम्मा बहुत कमज़ोर,बीमार है 
और हम  - अपनी अपनी जिम्मेवारियों में अवश-शिथिल !
मेरी बाह्य दिनचर्या से 
मेरी आंतरिक दिनचर्या मेल नहीं खाती 
मैं ही क्या 
हमसब अपनी अपनी जगह बाह्य से परे जी रहे हैं 
……… 
ऊपर से संवेदनहीन दिखते  
अन्दर किसी पिजड़े में पंख फड़फड़ाते 
मुक्ति की कामना लिए 
अव्यक्त भय से ग्रसित !

28 अगस्त, 2013

अपने जन्मदिन पर मुझे एक उपहार चाहिए



फिर आया वह दिन 
जब मैं निमित्त बन 
माँ के गर्भ से निकल 
काली रात की मुसलाधार बारिश में 
गोकुल पहुंचा 
यशोदा के आँचल से 
अपने ब्रह्माण्ड को तेजस्वी बनाने  ……. 
माँ देवकी के मौन अश्रु 
द्वारपालों का मौन पलायन कंस के आसुरी निर्णय से 
पिता वासुदेव के थरथराते कदम 
यमुना का साथ 
बारिश से शेषनाग की सुरक्षा 
मेरा बाल मन कभी नहीं भुला  …
मैंने सारे दृश्य आत्मसात किये 
बाल सुलभ क्रीड़ायें कर 
सबको सहज बनाया 
पर हर पल असहजता की रस्सी पर 
संतुलन साधता रहा  …. 
मातृत्व का क़र्ज़ 
नन्द बाबा के कन्धों का क़र्ज़ 
राधा की धुन का क़र्ज़ (जो मेरी बांसुरी के प्राण बने)
ग्वाल-बालों की मित्रता का क़र्ज़ 
कदम्ब की छाया का क़र्ज़ 
मैं कृष्ण  …… भला क्या चुकाऊंगा !!!
तुम राधा के लिए सवाल करो 
या माँ यशोदा के लिए 
मैं निरुत्तर था 
निरुत्तर हूँ 
निरुत्तर ही रहूँगा  …… 
तुम्हारे अनुमानों में मेरा जो भी रूप उभरे 
तुम्हारे ह्रदय से जो भी सज़ा निकले 
मुझे स्वीकार है 
क्योंकि मेरे जन्म के लिए तुम हर साल 
एक खीरे में मेरी प्रतीक्षा करते हो 
इस प्यार,प्रतीक्षा के आगे 
मुझे सबकुछ स्वीकार है  …। 
पर अपने जन्मदिन पर 
मुझे एक उपहार सबके हाथों चाहिए 
……………… 
अपनी अंतरात्मा की सुनो 
मेरी तरह संतुलन साधो 
कंस का संहार करो 
फिर जानो मुझसे किये प्रश्नों का उत्तर !!!

26 अगस्त, 2013

मुझे पंख चाहिए




मुझे पंख चाहिए 
वैसे पंख - 
जो मन के पास होते हैं 
और वह अपनी जगह से हमेशा कहीं और होता है  … 
मैं भी घूमना चाहती हूँ 
कहाँ ? इस पर क्या सोचना,
सीमित ही है सबकुछ 
फिर भी,
सुबह से रात तक की परिक्रमा कर लूँ 
तो मन के पंखों को कुछ आराम मिल जायेगा !
मन की आँखों को 
या उसके आने को 
हर कोई नहीं देख पाता 
न समझ पाता है 
और अगर देख लिया 
समझ लिया 
तो निःसंदेह मानसिकता की बात हो जाएगी !
आना-जाना सत्य के आधार पर प्रमाणित होता है 
यूँ महीनों,सालों मन से कहीं रह लो,
जी लो 
- कोई नहीं मानता 
प्रमाण चाहिए 
और प्रमाण के लिए मुझे असली पंखों की ज़रूरत है 
हाँ,हाँ - परियों वाले पंख !
…………………। 
अब प्रश्न उठेगा कि मिलते कहाँ हैं 
तो इस बात से तो सभी भिज्ञ हैं 
कि दुनिया आश्चर्यों की मिसाल है -
कहीं किसी अनोखे झरने के पास परियां रहती होंगी 
पंखों का अद्भुत मेला सजाये 
हमें बस कोलम्बस,वास्कोडिगामा होना है 
फिर मन से शरीर की उड़ान आसान हो जाएगी 
पर !!!  ………. 
इसमें प्रत्यक्ष गवाह की कठिनाइयां पैदा होंगी !!!
परियों की सुरक्षा ख़तरे में पड़ जाएगी  …
समझ में नहीं आता कि अपनी चाह को क्या नसीहत दूँ !
पंख तो मुझे चाहिए 
तो एक तथ्य उभरा है दिमाग में 
कि पाप हो या पुण्य 
तर्क से दोनों को तब्दील किया जा सकता है 
वचनं किं दरिद्रतम !
तर्क से पुण्य पाप 
पाप पुण्य 
होता है न ?!
तो परियों पर आफ़त आ जाने पर कह देना है 
"होनी काहू बिधि ना टरै"
और गवाह की ऐसी की तैसी 
वह तो यूँ भी बिकाऊ ही होता है 
………। 
तो सम्पूर्ण कहे का सार है - मुझे पंख चाहिए 

08 अगस्त, 2013

चाँद और सीढ़ी



एड़ी उचकाकर चाँद को छूना चाहा 
चाँद ने कहा - ' एक सीढ़ी लगा लो' 
एक सीढ़ी लगाकर नीचे देखा 
बचपन के मोहक मन को बड़ा मज़ा आया …
 
फिर चाँद को देखा, हाथ बढ़ाया 
चाँद के इर्द गिर्द तारे टिमटिमाये 
'एक सीढ़ी और'
दूसरी सीढ़ी पर पाँव रखते  
अल्हड़ हवा का झोंका 
मेरे कानों में सोलहवें बसंत की कहानी कहने लगा 
नीचे देखूँ या ऊपर 
हर सू गुलमोहर से भरा …. 

लहराती लटों को संभाल 
फिर चाँद को देखा 
चाँदनी ने मुझे आगोश में भर लिया 
हौले से कहा - 'एक सीढ़ी और …'
……
तीसरी सीढ़ी दुनियादारी के घात-प्रतिघातों से भरी थी 
हर प्यादे वजीर बने 
शह-मात की बाज़ी खेल रहे थे 
घबराकर चाँद को देखा 
फिर से एड़ी उचकाने की चेष्टा की 
चाँद ने प्यार से छुआ 
कहा - 'एक सीढ़ी और  …'

गीता सार अर्थवान हुआ -
"जो हुआ अच्छा हुआ जो हो रहा है अच्छा हो रहा है, जो होगा वो भी अच्छा होगा, 
तुम्हारा क्या गया जो तुम रोते हो? तुम क्या लाये थे जो तुमने खो दिया? 
तुमने क्या पैदा किया था जो नष्ट हो गया? तुमने जो लिया यही से लिया, 
जो दिया यही पर दिया, जो आज तुम्हारा है, कल किसी और का था, कल किसी और का होगा ... "

प्रीतम एंड पेद्रो

 कभी किसी से माफ़ी मांग लो,कभी किसी को माफ़ कर भी दो... यही शायद प्रीतम एंड पेद्रो की सबसे बड़ी सीख है। यह फिल्म सिर्फ़ एक कहानी नहीं सुनाती...