21 जुलाई, 2020

ताना - बाना - मेरी नज़र से - 7

ताना-बाना
उषा किरण
शिवना प्रकाशन
 
















सत्य का रास्ता एक युद्धभूमि ही तो है, पर उसके सलीब पर सुकून ही सुकून होता है । शरीर से बहता रक्त अमरत्व है, 
-नीलकंठ की तरह ।

"सत्य बोलकर तुमने
अपनी सलीब खुद गढ़ ली थी ...
पत्थर मारने वाले 
अपने हमदर्द, अपने दोस्त थे !"

कवयित्री की कारीगरी लुप्त होने लगी थी, उलझे फंदों के निकट न रास्ता था, न उम्मीद । हंसते,मुस्कुराते अचानक समय की कालकोठरी में कैद होकर बहुत डर लगा,
पर ---,

"एक युग के बाद 
किसी ने आकर 
वह बन्द कोठरी अचानक खोल दी!"
बिल्कुल उस कारावास की तरह,जहाँ से हरि गोकुल की तरफ बढ़े ।

"धूल की चादर हटाते सहसा
वही महकता गुलाब दिखा
जिसे बरसों पहले मैंने
झुंझला कर
दफ़न कर दिया था..."

आह, सांसें चल रही थीं, सिरहाने के पास रखी मेज पर सपनों की सुराही रखी थी, अंजुरी भर सपनों को पीया और बसंत होने लगी ।
क्योंकि,
"सोच का स्वेटर
बचपन से बुना"
बेढब ही सही ---
"आदत है बुनने की
रुकती ही नहीं
-,बस ... बुने ही जाती है ।

कितने अनचाहे, चाहे, 
अनजाने, जाने, रास्ते मिले
किसी के आंसुओं में गहरे धंसी-फंसी,
कहीं बुझा चूल्हा देखा,
कहीं चीख,कहीं विलाप
कहीं छल, कहीं विश्वास ... न बुनती तो आज यहाँ न होती यह लड़की, जो पत्नी,माँ, नानी-दादी,...के दायित्वों को निभाते हुए,सपनों की सुराही से कड़वे-मीठे घूंट भरती गई, शब्दों के कंचे चुनती गई और बना दिया ताना-बाना .......

क्रमशः

20 जुलाई, 2020

ताना - बाना - मेरी नज़र से - 6
















ताना-बाना
उषा किरण
शिवना प्रकाशन 






रास्ते मुड़ सकते हैं
हौसले नहीं
वादे टूट सकते हैं
हम तुम नहीं ....
कोई ना थी मंजिल
न था कारवां
अजनबी सा लगता रहा
सारा जहाँ
कारवां खो सकता है
मंजिलें नहीं
राहें रुक सकती हैं
हम तुम नहीं ...
रात भर दर्द रिसता रहा
मोम की तरह पिघलता रहा
तुम जो आए जीने की चाह जग उठी
नाम गुम हो सकता है
आवाजें नहीं
रिश्ते गुम हो सकते हैं
हम तुम नहीं ...! ...
महीनों का फ़लसफ़ा रहा यह ताना-बाना मेरी कलम से । टुकड़े टुकड़े पढ़ती गई, जीती गई - शब्द शब्द भावनाओं को, रेखाओं को ।
निःसंदेह, किसी एक दिन का परिणाम नहीं यह ताना-बाना । बचपन,यौवन,कार्य क्षेत्र, सामाजिक परिवेश, रिश्तों के अलग अलग दस्तावेज,क्षणिक विश्वास, स्थापित विश्वास, और आध्यात्मिक अनुभव है यह लेखन ।
कई बार ज़िन्दगी घाटे का ब्यौरा देती है और कई बार सूद सहित मुनाफ़ा -
"बेटी तो आज भी
उतनी ही अपनी थी,
ब्याज में एक बेटा..."
कुछ भी यूँ ही नहीं होता" प्रयोजन जाने बग़ैर हम अशांत हो उठते हैं, लेकिन कोई भी प्रयोजन एक मार्ग निश्चित करता है । जैसे कवयित्री का मार्ग दृष्टिगत है ...
"हवा का झोंका
हौले से छूकर गुजर गया
...
सौगातें छोड़ गया"
क्रमशः



19 जुलाई, 2020

ताना - बाना - मेरी नज़र से - 5




घर घर खेलते हुए
धप्पा मारते हुए,
किसी धप्पा पर चौंक कर मुड़ते हुए,
कब आंखों में सपने उतरे,
कब उनका अर्थ व्यापक हुआ -
यह तब जाना,
जब एक दिन आंसुओं की बाढ़ में,
शब्दों की पतवार पर मैंने पकड़ बनाई
और कागज़ की नाव लेकर बढ़ने लगी
---...... यह ताना-बाना और कुछ नहीं, कवयित्री उषा किरण के मन की वही अग्नि है, जिसके ताप और पानी के छींटे से मैं गुजरी हूँ ।
"एक कमरा थकान का
एक आराम का
.... एक चैन का !"
जाना-,
कोई भी रिश्ता सहज नहीं होता, सहज बनाना होता है या दिखाना होता है ।
"रिश्ते मिट्टी में पड़े बीज नहीं
जो यूँ ही अंकुरित हो उठे..."
"स्वयं अपने, हम हैं कहाँ ?
....सम्पूर्ण होकर भी
घट रीता !"
फिर, बावरा मन या वह - कहती जाती है,
"पकड़ती हूँ
परछाइयाँ,
बांधती हूँ गंध
पारिजात की !"
उसे पढ़ते हुए मेरे ख्याल पूछते हैं, क्या सच में गंध पारिजात की या उस लड़की की जिसने परछाइयों को अथक बुना ...।
क्रमशः

18 जुलाई, 2020

ताना - बाना - मेरी नज़र से - 4




ज़िन्दगी को आकार में ढालते, तराशते हुए, हम जाने किस प्रयोजन के चक्रव्यूह में उलझ जाते हैं, निकलते हुए वह विराट कई सत्य प्रस्तुत करता है और सिरहाने रखी एक डायरी,एक कलम अनकही स्थिति की साक्षी बन जाती है और वर्षों बाद खुद पर जिल्द चढ़ा ... लिख देती है ताना-बाना ।
"वो जो तू है
तेरा नूर है
तेरी पनाहों में
मेरा वजूद है"

एहसासों के फंदों के मध्य एकलव्य भी रहा, एक अंगूठा देता हुआ,एक अपनी और द्रोण की जिजीविषा को अर्थ देता हुआ ...
और कोई,
अंगूठे को काटता हुआ ।

प्रश्नों के महासागर में डूबता-उतराता हृदय चीखता है,

"कहो पांचाली !
अश्वत्थामा को
क्यों क्षमा किया तुमने?"

"(नदी)
क्यूँ बहती हो ?
कहाँ से आती हो,
कहाँ जाती हो?"

मन की गति मन ही जाने ...
"बार-बार
हर बार
समेटा
सहेजा
संभाला
और ...
छन्न से गिर के
टूट गया !"

क्रमशः

17 जुलाई, 2020

ताना - बाना - मेरी नज़र से - 3




तना-बाना
उषा किरण
शिवना प्रकाशन

दो आंखों की सलाइयों पर एक एक दिन के फंदे डाल मन कितना कुछ बुनता है,उधेड़ता है ...गिरे फंदों को सलीके से उठाने की कोशिश में जाने कितनी रातें आंखों में गुजारता है ... दीवारों से बातें करता है, खामोश रातों को कुरेदता है, 'कुछ कहो न'

"एक बार तो मिलना होगा तुम्हें
और देने होंगे कई जवाब
...क्यों बर्दाश्त नहीं होता तुमसे
छोटा सा भी टुकड़ा धूप का-
हमारे हिस्से का ?"

सफ़र छोटा हो या बड़ा, कुछ अपना बहुत अज़ीज़ छूट जाता है, या खो जाता है और बेचारा मन - अपनी ही प्रतिध्वनियों में कुछ तलाश करता है,

पर चीजें हों या एहसास - वक़्त पर कहाँ मिलती है !

"यूँ ही
तुम मुझसे बात करते हो
यूँ ही
मैं तुमसे बात करती हूँ..."

गहराई न हो तो कोई भी बुनावट कोई शक्ल नहीं ले पाती ।

लहरों का क्या है,

"लड़ती है तट से
सागर मौन ही रहता है"

यह अहम भी बड़ी अजीब चीज है, है न ?!

*****

क्रमशः

16 जुलाई, 2020

ताना - बाना - मेरी नज़र से - 2






मैंने पढ़ा, सिर्फ एक किताब ताना-बाना नहीं, बल्कि एक मन को । यात्रा सिर्फ शब्द भावों के साथ नहीं होती, उस व्यक्ति विशेष के साथ भी होती है, जिसे आपने देखा हो या नहीं देखा हो । अगर शब्दों को भावों को जीना होता तो शायद मैं नहीं लिख पाती कुछ, मैंने उन पदचिन्हों को टटोला है, जिस पर पग धरने से पूर्व आदमी सिर्फ जीता ही नहीं, अनेकों बार मरता है ...

"थका-मांदा सूरज
दिन ढले
टुकड़े टुकड़े हो
लहरों में डूब गया
जब सब्र को पीते
सागर के होंठ
और भी नीले हो गए ...!"

ऐसा तभी होता है जब सौंदर्य में भी पीड़ा की झलक मिल जाए और यह झलक उसे ही मिलती है, जिसकी खिलखिलाहट में सिसकियों की किरचनें होती हैं ।

यूँ ही कोई बहादुर नहीं होता, बहादुरी का सबब उन छालों में देखो,जो मीलों तपती धरती को चीरकर चलता ही जाता है ... उस अद्भुत क्षितिज की तलाश में, जहाँ ख्वाबों का पौधा लगाया जा सके, जिसमें संभावनाओं के अनगिनत फलों के सपने होते हैं ।
कलम की अथक यात्रा किसी छांह को देखकर रुकती नहीं, विश्राम नहीं तलाशती - विश्वास है,

"जो मेरा है,
वो कहाँ जाएगा?"
और दो मुट्ठी आकाश को सीने से भींच लेती है, बहादुर लड़की जो ठहरी

"मनचाहा विस्तार किया
जब चाहा
पिटारी में रख लिया
तहा कर
एक टुकड़ा आसमान..."

क्रमशः

15 जुलाई, 2020

ताना - बाना - मेरी नज़र से






यह ताना-बाना अपने पूरे शबाब के साथ मुझे बहुत पहले मिला, यूँ लगा था किसी ने भावों का भावपूर्ण गुलदस्ता सजाकर मुझे कुछ विशेष वक़्त के मोड़ पर ले जाने को सज्य किया है । वक़्त के खास लम्हों में मुझे बांधने का अद्भुत प्रयास किया उषा किरण ने ।
उषा किरण, सिर्फ एक कवयित्री नहीं, रेखाओं और रंगों की जादूगर भी हैं । एक वह धागा, जो समय,रिश्ते,भावनाओं को मजबूती से सीना जानता है,उसे जीना जानता है । यह संग्रह उन साँसों का प्रमाण है, जिसे उन्होंने समानुभूति संग लिया । ऐसा नहीं कि विरोध के स्वर नहीं उठाए, ... उठाए, लेकिन धरती पर संतुलन बनाते हुए ।ॐ गं गणपतये नमः की शुभ आकृति के साथ अनुक्रम का आरम्भ है, तो निर्विघ्न सारी भावनाएं पाठकों के हृदय तक पहुँची हैं । परिचय उनके ही शब्दों में
,"क्या कहूँकौन हूँ ?
...उड़ानें बिन पंखों के जाने कहाँ कहाँ ले जाती हैं
...कौन हूँ ?"
क्या कहूँ ? परी या ख्वाब, दूब या इंद्रधनुष, ध्रुवतारा या मेघ समूह, ओस या धरती को भिगोती बारिश या बारिश के बाद की धूप ... पृष्ठ दर पृष्ठ जाने कितने रूप उभरते हैं ।       उषा का आभास सुगबुगाते हुए नए दिन का आगाज़ करता है, मिट्टी से लेकर आकाश की विशालता का स्पर्श करता है, अनदेखे,अनसुने,अनछुए एहसासों का प्रतिबिंब बन हृदय से कलम तक की यात्रा करता है और कुछ यूँ कहता है,
"सुनी है कान लगाकर
उन सर्द, तप्त दीवारों पेदफ़न हुई पथरीली धड़कनें ..."
शायद तभी,"हैरान, परेशान होकर पाँव ज़मीन पर रख..
."एक मन-ढूंढने लगता है स्लीपर, ... ताकि  बुन सके क्रमिक ताना बाना 
क्रमशः


04 जुलाई, 2020

जवाब तुम्हें खुद मिल जाएंगे

                                                             (गूगल से साभार)



जिस दिन तुम्हारे हिस्से वक़्त ही वक़्त होगा,
तुम जानोगे अकेलापन क्या होता है !
इस अकेलेपन के जिम्मेदार
जाने अनजाने हम खुद ही होते हैं ...
कितने सारे कॉल,
कितनी सारी पुकार को हम नहीं सुनते
अपने अपने स्पेस के लिए
बढ़ते जाते हैं उन लम्हों के साथ
जिनका होना, नहीं होना
कोई मायने नहीं रखता ...
फिर भी,
एक मद में
हम उसे अर्थवान बना देते हैं।
कोई भी सीख गले के नीचे नहीं उतरती,
हम झल्लाने लगते हैं,
कुतर्कों का अंबार लगा देते हैं
कटघरे में खड़ा व्यक्ति
पश्नों के आगे अनुत्तरित खड़ा
जाने कितनी मोहक गलियों में भटकता है,
मस्तिष्क बोलता है -
प्रश्नों की धुंध में इसे भूल गए !!!
यह भी तो हमारा था,
जहाँ बेफिक्री थी,
विश्वास था,
और था हर हाल में
साथ साथ चलने का अनकहा वादा ...
हाँ, जिस दिन वक़्त हर कोने में
उबासियाँ लेता रहेगा
प्रश्नों के आगे
अपने खोए हुए लम्हात की बारिश
तुम्हें सर से पाँव तक भिगो जाएगी
महसूस करोगे तुम मेरा स्पर्श
अपने माथे पर
सुनो,
उस दिन
खुलकर रो लेना
मेरी यादों के
एक एक लम्हे के कांधे लगकर ...
जवाब तुम्हें खुद ब खुद मिल जाएंगे ।

01 जुलाई, 2020

असंभव कुछ नहीं होता




मैं माँ,
समय की तपती रेत ने
मुझमें पिता के अग्निकण डाले
मातृत्व की कोमलता के आगे
मैं हुई नारियल
बच्चे की कटी उंगलियों को सहलाया
भयभीत चेहरे को
सीने की ताप से सहलाया
और लक्ष्य की ओर बढ़ने को कहा
(बिल्कुल अपने पिता की तरह)
क्योंकि दुनिया चर्चा करती है
सूरज के उगने और चढ़ने की
साथ ही, उसकी कोशिश होती है
हर तरफ से, उसी के विरूद्ध
चक्रव्यूह को गढ़ने की...
सनातन परंपरा है !
दरअसल दुनिया एक ज्वालामुखी है
जिसके अनुग्रह कोश से
सपनों की चिंगारियां मिलती हैं
जिनसे अपने उद्देश्यों की अग्नि सुलगती है
जिसमें निहित है,
एक एक करके
एक एक व्यूह को तोड़ना,
विपरीत जा रही
गंतव्य की दिशा का रुख
सायास अपनी ओर मोड़ना,
निरंतर स्वगत स्वस्तिवाचन से
स्वयं को जोड़ना
कि भले आज ये संभव न हो मगर,
असंभव कुछ नहीं होता।

07 जून, 2020

जीत किसकी होगी ?





एक तरफ हैं हालातों के घुड़सवार,
जिरहबख्तर पहने और
हाथों में है लपलपाती तलवार
तो दूसरी तरफ,
मजबूरियों की पैदल लंबी कतार,
इन्द्र छद्म वेश में फिर आकर
ले गए छल से
कवच कुंडल का देवदत्त उपहार
अस्त्र_शस्त्र के नाम पर है
सिर्फ हौसलों की छोटी_सी कटार
इधर बख्तियार, उधर लाचार
सनातन है यह विचार
कि समरथ को नहीं दोष गोसाईं
आरोपी तो सदा आम जन है भाई.....
अब कहो कि अनुमान क्या कहते हैं ?
जीत किसकी होगी ?
या होगा वही, जो इतिहास में नहीं होता
पर समय और सच को पता है
कि जीत तो हौसलों की ही होती है
उन्हीं की होगी भी,
किंतु अमरबेल है विडंबना !
समर ईसा पूर्व का हो या आज का
जीत का श्रेय समर्थ को ही जाता है !
हमारा क्या है
पढ़ेंगे, पढ़ाएंगे
जो वर्णित है इतिहास में,
वही अगली पीढ़ी को बताएंगे।

15 मई, 2020

हकीकत की शुक्रगुजार हूँ



सपने देखने में
उसके बीज बोने में
उसे सींचने में
आठवें रंग से उसे अद्भुत बनाने में
मैं सिर्फ माहिर नहीं थी
माहिर हूँ भी ...
दिल खोलकर मैंने
सबको अपने हिस्से का सपना दिया
देखने का
बोने का हौसला दिया
लेकिन उसमें अधिकतर
अनजान,घातक पंछी निकले,
सबने मेरे घर पर धावा बोल दिया,
उनको लगा,
कि बिना आर्थिक संपन्नता के
सम्भव नहीं यूँ बेमोल सपने दे देना,
हकीकत के खून से
उन सबने मेरे सपनों को
लहूलुहान कर दिया !
बरसों मैं खून के धब्बे मिटाती रही - सपनों से भीगी सोच से ।
कितने गोदाम खाली हुए,
पर मेरे सपनों के पन्नों ने
नए जिल्द से खुद को संवारा,
समझदारी की स्याही से
कहीं कहीं कुछ निशान बनाये,
जहाँ सपनों की अहमियत ना हो,
अनुमानों की फसल लहलहाए,
वहाँ से मैंने खुद को पीछे कर लिया...
वैसे कह सकते हो,
अनुमानों की भीड़ ने मुझे धकेल दिया ।
चोट लगी,
बड़ी गहरी चोट
लेकिन सपनों ने चोट की अहमियत बताई
मुट्ठी में नए बीज रखे
और उंगली पकड़कर
मेरी आँखों
मेरे मन की जमीन पर
सपने ही सपने बो दिए ।
इन सपनों की मासूमियत की बरकरारी में
मैं हकीकत की शुक्रगुजार हुई
जिसने मुझे बंजर जमीन से अलग कर दिया ... 

प्रीतम एंड पेद्रो

 कभी किसी से माफ़ी मांग लो,कभी किसी को माफ़ कर भी दो... यही शायद प्रीतम एंड पेद्रो की सबसे बड़ी सीख है। यह फिल्म सिर्फ़ एक कहानी नहीं सुनाती...