03 नवंबर, 2007

ये याद आयेंगे...



अब तो पुराने हर कदम ,
जाने की तैयारी में हैं ...
{सच है , यूँ किसी की ज़िन्दगी का कोई ठिकाना नहीं }
पर ,
पुराने पेड़ गिरेंगे ...
रोने में वक़्त बर्बाद मत करना ...
वैसे ये मेरे जज़बात हैं ...
तुम क्या करोगे ,
इसे दावे से कहना ...
मुमकिन नहीं ...
हाँ एक बात होगी ,
तुम भी होगे अकेले ...
वक़्त मौन जगह घेरे खडा होगा ...
तब ,
ये सारे वृक्ष एक बार याद आयेंगे ...

1 टिप्पणी:

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