
शोर से अधिक एकांत का असर होता है, शोर में एकांत नहीं सुनाई देता -पर एकांत मे काल,शोर,रिश्ते,प्रेम, दुश्मनी,मित्रता, लोभ,क्रोध, बेईमानी,चालाकी … सबके अस्तित्व मुखर हो सत्य कहते हैं ! शोर में मन जिन तत्वों को अस्वीकार करता है - एकांत में स्वीकार करना ही होता है
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ब्लॉग से इंस्टाग्राम तक की सभ्यता *****
हमने अपनी क़लम की दुनिया ब्लॉग से शुरू की थी। वह समय ऐसा था जैसे किसी शांत दोपहरी में अपनी डायरी खुली छोड़ दी जाए और कोई अनदेखा पाठक चुपचाप ...
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गंगा ! तुम परंपरा से बंधकर बहती, स्त्री तो हो किंतु परंपरा से अलग जाकर अबला अर्थ नहीं वहन करती वो रुपवती धारा हो जिसका वेग कभी लुप्त नही...
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कितनी आसानी से हम कहते हैं कि जो गरजते हैं वे बरसते नहीं ..." बिना बरसे ये बादल अपने मन में उमड़ते घुमड़ते भावों को लेकर आखिर कहां!...

अति सुंदर
जवाब देंहटाएंलिखती रहिये
नीरज
एकलव्य के अँगूठे के जाने के साथ साथ गुरू की गुरुता भी गई ।
जवाब देंहटाएंघुघूती बासूती
बहुत बढ़िया!!
जवाब देंहटाएंसोचने पर विवश करती रचना
जवाब देंहटाएंआपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 16-02-2012 को यहाँ भी है
जवाब देंहटाएं...नयी पुरानी हलचल में आज...हम भी गुजरे जमाने हुये .
सच कहीं और चला
जवाब देंहटाएंगुरु की मूर्ति पर हुआ अधिकार अर्जुन का
विचारणीय
बहुत अच्छी प्रस्तुति रश्मि जी । वैसे सोचने को विवश करती है ये अंगुठे वाली घटना भले ही अंगूठा गया पर विश्वास ने दुनिया जीती।
जवाब देंहटाएंबहुत ही बढ़िया।
जवाब देंहटाएंसादर
एक यथार्थ,
जवाब देंहटाएंसाधु-साधु
अतिसुन्दर
बहुत गहरी अभिव्यक्ति..
जवाब देंहटाएंसीखती हूँ आपकी हर रचना से...
(और अंगूठा किसी भी दिन आप मांग सकती हैं )
:-)
सादर.
गुरू-दक्षिणा मुझे भी देनी है.... :) कृपया सूचित करें..... :)
जवाब देंहटाएंबहुत गहरी कविता!!
जवाब देंहटाएंkammal ki soch.....
जवाब देंहटाएंबहुत सार्थक लेखन दी...
जवाब देंहटाएंसादर.
गहन भाव संयोजन के साथ बेहतरीन अभिव्यक्ति ।
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