19 नवंबर, 2007

इमरोज़ (आज का दिन)




पत्तों पर छलकती ओस की बूँदें
आती हैं बनकर इमरोज़
आतुर रहती हैं हर प्रातः
एक नज़्म सुनाने को
चिड़ियों का कलरव बनकर
पायल कि रुनझुन बनकर
प्रेम राग में डूबी-सिमटी
चाँद के रथ में आती छनकर
हर रोज़ शक्ल ले नज्मों की
कोई प्यार का गीत सुनाती है
गिर कर सुर कोई न भटके
बढ़ती हूँ हथेली में भरने
छन से गिरते हर साज़ को मैं
अपनी आँखों से लगाती हूँ
फिर जीती हूँ पूरे दिन को
इमरोज़ बना कर आँखों में...

2 टिप्‍पणियां:

रामायण है इतनी

रूठते हुए  वचन माँगते हुए  कैकेई ने सोचा ही नहीं  कि सपनों की तदबीर का रुख बदल जायेगा  दशरथ की मृत्यु होगी  भरत महल छोड़  स...