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मेरे एहसास इस मंदिर मे अंकित हैं...जीवन के हर सत्य को मैंने इसमे स्थापित करने की कोशिश की है। जब भी आपके एहसास दम तोड़ने लगे तो मेरे इस मंदिर मे आपके एहसासों को जीवन मिले, यही मेरा अथक प्रयास है...मेरी कामयाबी आपकी आलोचना समालोचना मे ही निहित है...आपके हर सुझाव, मेरा मार्ग दर्शन करेंगे...इसलिए इस मंदिर मे आकर जो भी कहना आप उचित समझें, कहें...ताकि मेरे शब्दों को नए आयाम, नए अर्थ मिल सकें ...

01 जून, 2012

माँ और बच्चे



वह माँ की भूमिका पूरी कर चुकी
पूरे हो चुके उसके दायित्व
अब वह सामर्थ्यहीन माँ है
कार्य उर्जा से विहीन !
पर आशीर्वचनों के घटक भरे हुए हैं
और टिका है मोह बच्चों से
बच्चों के बच्चों से !!
पर इस मोह में उसकी आँखें
दे रही हैं जवाब
बातों को न सुन पाने की बेचैनी
किंचित क्रोध में बदलती है
न कुछ कर पाने की विवशता
ज़माने की कहानियों में उतरती है ....
............
मुझे पता है मौत मांगते हुए
वह मौत से बेइन्तहां सहमी रहती है
वह नहीं चाहती कि वह अपने चेहरों से दूर हो
नहीं चाहती कि वे अपने जब उसे आवाज़ दें
तो वह ना हो ....
वह ढूंढती है आश्वासन कि वह ठीक हो जाएगी
पहले की तरह चलने लगेगी
और ठीक से देखने लगेगी ....
.....
कितनी विवशता है !!!
अब तो बच्चे थकने लगे हैं
माँ की ऊँगली थामे सोचते हैं
यदि हमें कुछ हो गया तो माँ का क्या होगा !
दहशत में एक तरफ माँ
और दूसरी तरफ अपने बच्चे
उनकी क्षमताएं अधिक कम हो गयी हैं ...
माँ की कांपती उँगलियों के बीच
वे असहाय हो गए हैं
एक अव्यक्त भय में जीने लगे हैं
और खुद में सिकुड़ते जा रहे हैं यह सोचकर
कि -
माँ ने जो दिया
क्या उसका एक हिस्सा भी हम दे पाएंगे !
......
खामोश वक़्त में माँ सोचती है -
मैं बोझ हो गई
बच्चे सोचते हैं
कैसे माँ के लिए माँ बन जाएँ ....
पर ख़ामोशी आपस में नहीं मिलती
तो अनकहे अनसुलझे भाव
दोनों की आँखों से बेबस टपकते रहते हैं ........

30 टिप्‍पणियां:

  1. ...वो कैसे दिन थे जब माँ की ममता पर बात होती थी और अब...?

    माँ की व्यथा पर ...!

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  2. गहन , अनकहा पर समझा जाना सा सच .... सभी के लिए

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  3. ' मुझे पता है मौत मांगते हुए
    वह मौत से बेइन्तहां सहमी रहती है '
    अनकहे भावों को... कुछ जानी-अनजानी सच्चाईयों को उकेर गयी कविता!

    उत्तर देंहटाएं
  4. मर्मस्पर्शी| किसी का भी वार्धक्य बेबसी और विवशता का ग्रास न हो... स्वयं से फलीभूत वृक्ष की छाँव हो.. स्नेह हो, शान्ति हो... चिर निद्रा से पहले...


    सादर

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  5. खामोश वक़्त में माँ सोचती है -
    मैं बोझ हो गई
    बच्चे सोचते हैं
    कैसे माँ के लिए माँ बन जाएँ ....
    पर ख़ामोशी आपस में नहीं मिलती
    तो अनकहे अनसुलझे भाव
    दोनों की आँखों से बेबस टपकते रहते हैं .....
    बेबस माता- पिता को देखना और कुछ कह नहीं पाना , आपकी कविता कितना कुछ कह जाती है!

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  6. एक दूसरे के लिये कुछ कर जाने के भाव से अनुप्राणित..

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  7. संसार के सबसे पवित्र रिश्ते पर, एक भावपूर्ण रचना!! मन में उतारने योग्य!! आभार दीदी!!

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  8. खामोश वक़्त में माँ सोचती है -
    मैं बोझ हो गई
    बच्चे सोचते हैं
    कैसे माँ के लिए माँ बन जाएँ ...
    बस दोनो तरफ एक बेबसी है ..गहन भाव लिए मन को छूती हुई प्रस्‍तुति...आभार

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  9. यह एक ऐसी विवशता है जिसका चक्र उल्टी दिशा में चलता रहता है।

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  10. खामोश वक़्त में माँ सोचती है -
    मैं बोझ हो गई
    बच्चे सोचते हैं
    कैसे माँ के लिए माँ बन जाएँ ....
    पर ख़ामोशी आपस में नहीं मिलती
    तो अनकहे अनसुलझे भाव
    दोनों की आँखों से बेबस टपकते रहते हैं ........
    ..................................... मेरी ख़ामोशी आप समझें !!

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  11. अक्सर ऐसा ही होता है ...बात कुछ नहीं होती ...फिर भी रोने को जी करता है ...हर शै ज़माने की यूहीं उदास सी लगती है ....रिस्ते पानीसे आंसू का गुमान होता है ....

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  12. रश्मिजी ...इस बेचारगी और विवशता को आपने बहुत ही मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति दी है .....दोनों ही रिश्ते अपनी अपनी जगह मजबूर हैं......

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  13. एक माँ की खामोश व्यथा,जो उसे उदास कर देती है,,,,

    RESENT POST ,,,, फुहार....: प्यार हो गया है ,,,,,,

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  14. अब तो बच्चे थकने लगे हैं
    माँ की ऊँगली थामे सोचते हैं
    यदि हमें कुछ हो गया तो माँ का क्या होगा !

    जो कभी माँ सोचा करती थी वह अब बच्चे सोचने लगे माँ के लिए...शायद यही समय परिवर्तन है.
    इसे आत्मसात करने में बहुत तकलीफ महसूस होती है...सच तो स्वीकारना ही होता है|

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  15. खामोश वक़्त में माँ सोचती है -
    मैं बोझ हो गई
    बच्चे सोचते हैं
    कैसे माँ के लिए माँ बन जाएँ ....
    पर ख़ामोशी आपस में नहीं मिलती
    तो अनकहे अनसुलझे भाव
    दोनों की आँखों से बेबस टपकते रहते हैं ........


    बहुत संवेदनशील .... दोनों ही अपनी परिस्थिति पर अपने अपने हिसाब से सोचते हैं ...

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  16. रश्मि जी ये रिश्ता ही ऐसा होता है कई बार अनकहे अनसुलझे अहसास आँखो से टपक ही पड़ते है..खुबसूरत अभिव्यक्ति..

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  17. काश वो भी दिन आ जाएँ
    जब बच्चे सोचें
    कैसे माँ के लिए माँ बन जाएँ ....

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  18. मोह से मुक्‍ति‍ केवल कहानी नहीं...

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  19. अद्भुत रिश्ता... अद्भुत रचना दी....
    सादर

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  20. खामोश वक़्त में माँ सोचती है -
    मैं बोझ हो गई
    बच्चे सोचते हैं
    कैसे माँ के लिए माँ बन जाएँ ....
    पर ख़ामोशी आपस में नहीं मिलती
    तो अनकहे अनसुलझे भाव
    दोनों की आँखों से बेबस टपकते रहते हैं ........kash! ye har baccha soche le apni maa ke liye...

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  21. वक्त और बेबसी ...दो ही बाते हैं जो हर रिश्ते के आड़े आ जाती हैं ......बहुत ही खूबसूरती से आपने रिश्तों को लिख डाला ...

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  22. कहते हैं ,"ईश्वर सब जगह नहीं हो सकते थे ,इसलिए उन्होंने माँ का स्वरूप बना दिया |"

    " there is only one most beautiful child in the world and every mother has one."

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  23. aaj to bhavnaon ka jaise pitara khul gaya......sab kuch bheega sa.....

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  24. बहुत सुन्दर.

    यह अवस्था मैंने अपनी नानी माँ में देखी है. समझ नहीं अता की कैसे क्या करें??

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  25. बेहद मार्मिक और शानदार पोस्ट।

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