03 जुलाई, 2010

मंजिल के लिए




कहीं कोई अंतर ही नहीं,
सारे रास्ते दर्द के
तुमने भी सहे
हमने भी सहे
तुमको एक तलाश रही
मेरे साथ विश्वास रहा

'कौन है ये?' तुम चौंकते रहे
तुम साथ हो तो सही ...
सोचकर मैं शक्ति का पर्याय बनी
दर्द ने तुम्हारे अस्तित्व को डगमगा दिया
दर्द ने मुझे मेरे अस्तित्व की पहचान दी
दर्द ने तुम्हें सजग बनाया
दर्द ने मुझे गंगा यमुना के मध्य
सरस्वती बनाया (जो हो ,पर दिखे नहीं)....

तुम्हारे मन का कोई संशय
मुझे विचलित नहीं करता
गहरे घाव एक बार में नहीं भरते ...!
मेरे घाव गहरे तो हैं
पर मरहम इतने असली रहे
कि आंसू भी खिलखिलाकर बहे....

दर्द का पलड़ा मेरा भारी रहा
शरीर और मन दोनों की हत्या हुई
तुम्हारे अस्तित्व का अनादर हुआ
और तुमने स्वयं शरीर और मन को मार दिया
शुक्र है ,
मैं मरी नहीं
मेरी साँसों ने मुझे गीता का उपदेश दिया
तुम्हारी रूकती साँसों तक पहुँचने का मार्ग दिया
अब ना तुम अकेले हो ,
ना अस्तित्वहीन ....

सत्य ये है----
कि तुम शक्ति का स्रोत हो
शिव का त्रिनेत्र
जिसके लिए वक़्त मुक़र्रर था

'तांडव' क्रोध का ही नहीं होता
शांत, सुकून भरे चेहरे का भी होता है
आँखों से बरसते प्रेम का भी होता है
बिना किसी शस्त्र के
बिना चक्रव्यूह के
बिना किसी छल के
.............................
रख लो अपनी मजबूत हथेली में मेरी हथेली
काफी है मंजिल के लिए

01 जुलाई, 2010

बदले रूख



अपनी डायरी के वे पन्ने
जो मेरे सपनों में फड़फड़ाते हुए
पृष्ठ दर पृष्ठ मुझे डराते थे
उन्‍हें मैंने तुम्हारे सुरक्षा के घेरे में रख दिया है
और खुद लौट गई हूँ
परी लोक में ..
मेरे नए पंख मुझसे कह रहे हैं
'एक लम्बी उड़ान
आज तुम्हारे हाथ है'
सम्पूर्ण आकाश, चाँद
आज फिर मेरे दोस्त हैं
आज फिर
मेरी आँखों की झील में
मासूम नन्हें नन्हें ख्याल हैं
किसी बच्चे के हाथों बनी
कागज़ की नाव जैसे
आज
इस नाव के डूबने का कोई खतरा नहीं
आँधियों ने रुख बदल लिया है
कोई पास बैठा लिख रहा है
एक महाकाव्य -- मेरे नाम

17 जून, 2010

मैं हूँ तो


मैं एक संभावना हूँ
मुझसे सुर निकल सकते हैं
मैं आग बन सकती हूँ
मैं शीतल बयार
मैं सुबह की अजान
मैं कुरआन
मैं शंखनाद
मैं उम्मीद की किरण
मैं विश्वास का दीया
मैं उठती लहर
महत्वाकांक्षाओं की उड़ान
मंजिल
आकाश
धरती
वृक्ष
पक्षी
अदृश्य की उज्जवल खोज ....

तुम मुझे कुछ भी बना लो
जीतोगे
क्योंकि मैं संभावना हूँ
एक कल्पना
जिसकी पहुँच हकीकत तक है ..

12 जून, 2010

क्लिक !


बड़े गंदे हो चले थे शब्द
करीने से सजाना मुश्किल हो चला था
बच्चों की तरह धूल में सनकर
शरारत से हँस रहे थे ...
मैंने भी अच्छी माँ की भूमिका निभाई
टब में पानी लिया
शैम्पू डाला
और शब्दों को उड़ेल दिया
ब्रश से रगड़ा
मुलायम तौलिये से सुखाया
पाउडर लगाया
आँखों में काजल
रेशम जैसे बालों की पौनी टेल बनाई
और माथे पर काजल का टीका लगाया
अब मेरे शब्द तैयार हैं
लग रहे हैं न सुन्दर?
अब एक फोटो हो जाये -
क्लिक !

10 जून, 2010

फिर भी...


क्यूँ हो रहा है ऐसा
मेरी मुस्कुराहट
हल्की हो गई है
ख्वाब कुछ संजीदा से हो गए हैं
आँखों में अकेलेपन की नदी बहने लगी है...

यूँ मैंने प्यार की पाल खोल दी है
तूफ़ान का शोर ना हो
व्यवधान न हो !
और तो और
दुआओं का धागा भी अदृश्य को बाँधा है
फिर भी...

फिर भी ख्वाब कुछ संजीदा से हैं
आँखों में अकेलेपन की नदी है
मुस्कान ....

दुआ है दुआओं का असर दिखाई दे
बेचैन मन को किनारा मिल जाये ..





08 जून, 2010

कोयल








सुबह आँख खुलते
सुनती हूँ कोयल की कूक
मुझे कोई अपना याद नहीं आता
मैं तो बस कोयल की मिठास
और उसके बदलते अंदाज में खो जाती हूँ

कोयल गाती है
फिर जोर से बोलती है
मैं उसकी हर अभिव्यक्ति को सुनती हूँ
एक गीत, एक पुकार, एक झल्लाहट ..
क्या नहीं होता उसके तेवर में !

कहती है कोयल-
'मेरी मोहक तान
और याद कोई और !'

मैं हर दिन कहती हूँ-
'कोयल
मैं बस तुम्हें सुन रही हूँ
जब तक तुम गाओगी
मैं सुनती रहूंगी ..'

सुनते ही कोयल की कुहू कुहू
सुकून में बदल जाती है
और वह एक डाली से दूसरी डाली का सफ़र
आह्लादित स्वर में करती है
और मेरा पूरा दिन मीठा हो जाता है !

03 जून, 2010

अगले जनम .....




गरीबी !
नन्हीं-नन्हीं खुशियाँ
नन्हें-नन्हें ख्वाब..
पैसे के लिए
बेटी को बेचना
सपनों को मिट्टी में मिलाना
बड़े ठाकुर की शतरंज का प्यादा बनाना
पूरी सांसें दूसरों की धरोहर ...!
फिर भी कहना
'अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो'-- क्यूँ?

कितने जन्म?
कितने जनम सज़ाएआफ़्ता ज़िन्दगी के लिए ?
बहुत हुआ खेल
अब तो सबको बेटा ही दीजो प्रभु
बेटी का नामोनिशान ही मिटा दीजो प्रभु
सिक्के के दूसरे पहलू का खेल
दिखा दीजो प्रभु ...

अगले जनम ये सबक सीखा ही दीजो
किसी के घर में बेटी ना दीजो

31 मई, 2010

तुम कहाँ हो


एक बादल आकर रुका है
कुछ नम सी हवाओं ने छुआ है
तुम कहाँ हो
बूंदें बरसने को हैं
मन सोंधा हो उठा है
चेहरे के इन्द्रधनुषी रंग
आँखों से टपकने लगे हैं
कोई देख ले
उससे पहले आ जाओ

फिर जमके बारिश हो
हवाएँ चलें
बिजली चमके
बादल गरजे
तुम्हारे साथ
मैं धुली धुली पत्तियों सी हो जाऊँ



29 मई, 2010

भय और सच


सुबह आँखें मलते
सूरज को देखते
मैं सच को टटोलती हूँ
ये मैं , मेरे बच्चे और मेरी ज़िन्दगी
फिर एक लम्बी सांस लेती हूँ
सारे सच अपनी जगह हैं

अविश्वास नहीं
एक अनजाना भय कहो इसे
हाँ भय
उन्हीं आँधियों का
जिसने मेरा घरौंदा ही नहीं तोड़ा
मुझे तिनके-तिनके में बिखराया

तिनकों को मैंने समेटा
मन्त्रों से सुवासित किया
होठों पर हँसी दी
पर एक अनजाने भय से दूर नहीं हो सकी
न इन तिनकों को कर पायी...

अब इसे लेकर ही यात्रा करनी होगी
क्योंकि
आँधियों से लड़ने के लिए इस भय का होना ज़रूरी है
भय ही सांकलों को बन्द करता है
भय ही कहता है चौकन्ने रहो
भय ही हमारी पकड़ को मजबूत करता है
आहट कोई भी हो
हमें सजग करता है
सुबह सूरज को भी गौर से देखकर ही मानती हूँ
यह वही अपना सूरज है
वही सुबह है
और चेहरों को टटोलकर
विश्वास से दिन की यात्रा करती हूँ


25 मई, 2010

लौटो , लौट आओ


कुछ कदम पीछे लौटो
आगे विनाश है
सब ख़त्म होनेवाला है
...
पीछे मुड़ो
किसी हल्की सी बात पर
घंटों हंसो
तनी नसों को आराम दो

लौटो , लौट आओ
दोष किसी और का नहीं
संभवतः
दोष तुम्हारा भी नहीं
दोष ' और ' की चाह
प्रतिस्पर्धा की दौड़ की है
क्या मिलेगा गुम्बद पे जाकर ?

अभी भी वक़्त है
पीछे मुड़ो
बनावटीपन का चोला उतारकर
माँ के हाथों एक निवाला आशीषों का लो
भाई बहनों संग कोई खेल खेलो
जकड़े दिल दिमाग
अकड़े शरीर से निजात पाओ
आओ....

फिर न कहना
'हमें पुकारा नहीं'

24 मई, 2010

इन्हें आता है







यह तो होना था ...
मैं नहीं रही !
मेरी आँखों , मेरे स्वर
मेरे स्पर्श की गर्माहट से सुरक्षित मेरे बच्चे
शून्य में हैं !

यूँ समझा दिया था सब -
'जब भी यह दिन आए
अपना हौसला मत खोना
जैसे अब तक मेरे पास
अपनी बात रखते आए हो
तब भी रखना - जब मैं ना रहूँ
यकीन रखना
मैं सब सुनूंगी अपनी दुआओं के साथ
सारी ख्वाहिशों को रूप देती रहूंगी ...'

अभी अचानक मेरा सो जाना
उन्हें हतप्रभ, हताश कर गया है !
जल्द ही
वे मेरे शब्दों के विश्वास की रास थाम लेंगे
बचपन से
इसी रास पर तो ऐतबार किया है !

कोई है?
इनके नाम जो मैंने शुभकामनाओं
और रक्षामंत्रों की असली थाती जमा की है
वह इनके हाथ, इनके मस्तिष्क
इनके मन में रख दो
और बस....

फिर इनका स्वाभिमान , इनका आत्मविश्वास
इनके साथ होगा
आंसू पोछकर
एक दूसरे की हथेली मजबूती से पकड़ना
इन्हें आता है
राहों को मोड़ना
इन्हें आता है
सबकुछ सहकर चलना
इन्हें आता है ...

प्रीतम एंड पेद्रो

 कभी किसी से माफ़ी मांग लो,कभी किसी को माफ़ कर भी दो... यही शायद प्रीतम एंड पेद्रो की सबसे बड़ी सीख है। यह फिल्म सिर्फ़ एक कहानी नहीं सुनाती...