
कहीं कोई अंतर ही नहीं,
सारे रास्ते दर्द के
तुमने भी सहे
हमने भी सहे
तुमको एक तलाश रही
मेरे साथ विश्वास रहा
'कौन है ये?' तुम चौंकते रहे
तुम साथ हो तो सही ...
सोचकर मैं शक्ति का पर्याय बनी
दर्द ने तुम्हारे अस्तित्व को डगमगा दिया
दर्द ने मुझे मेरे अस्तित्व की पहचान दी
दर्द ने तुम्हें सजग बनाया
दर्द ने मुझे गंगा यमुना के मध्य
सरस्वती बनाया (जो हो ,पर दिखे नहीं)....
तुम्हारे मन का कोई संशय
मुझे विचलित नहीं करता
गहरे घाव एक बार में नहीं भरते ...!
मेरे घाव गहरे तो हैं
पर मरहम इतने असली रहे
कि आंसू भी खिलखिलाकर बहे....
दर्द का पलड़ा मेरा भारी रहा
शरीर और मन दोनों की हत्या हुई
तुम्हारे अस्तित्व का अनादर हुआ
और तुमने स्वयं शरीर और मन को मार दिया
शुक्र है ,
मैं मरी नहीं
मेरी साँसों ने मुझे गीता का उपदेश दिया
तुम्हारी रूकती साँसों तक पहुँचने का मार्ग दिया
अब ना तुम अकेले हो ,
ना अस्तित्वहीन ....
सत्य ये है----
कि तुम शक्ति का स्रोत हो
शिव का त्रिनेत्र
जिसके लिए वक़्त मुक़र्रर था
'तांडव' क्रोध का ही नहीं होता
शांत, सुकून भरे चेहरे का भी होता है
आँखों से बरसते प्रेम का भी होता है
बिना किसी शस्त्र के
बिना चक्रव्यूह के
बिना किसी छल के
.............................
रख लो अपनी मजबूत हथेली में मेरी हथेली
काफी है मंजिल के लिए









