21 जनवरी, 2020

ऐसे वैसे के पेशोपेश में भी । ...





मैं ही क्यों अर्से तक

रह जाती हूँ पेशोपेश में !
बिना किसी जवाब के
बड़बड़ाती जाती हूँ,
बिना किसी उचित प्रसंग के
मुस्कुराती जाती हूँ
जबकि सामनेवाले के पास
होती है गजब की तटस्थता,
स्याह कोहरे सी ख़ामोशी,
और सिर्फ अपनी खींची हुई लकीरें ।
...
अगर चाहती
तो मैं भी अपने आसपास
आत्मसम्मान की ऊंची
बाड़ लगा सकती थी
खींच सकती थी
एक लंबी लक्ष्मण रेखा
जिसके अंदर सिर्फ मैं होती
सिर्फ अपने लिए सोचती
एक सिले दिन की दीवार
उठा सकती थी
एक गहरी और खामोश
सर्द रात उकेर सकती थी
...
लेकिन,
मैं सही मायनों में प्यार करती थी,
तभी तो जाने कितनी सारी नापसंदगी को
मुस्कुराकर पसंद मान लिया ।
चादर छोटी होती गई
और मैं मानती गई
- आकाश बहुत बड़ा है ।
शायद इसलिए
कि मैंने प्यार की कभी
खरीद फरोख्त नहीं की
पलड़ा किसी और का
मेरे आगे क्या भारी होता,
मैं किसी मोलभाव के तराजू पर,
चढ़ी ही नहीं ।
मन मानस से
अपने सपनों की अमीरी जीती रही,
जिसे देख कुछ लोग
इस अनुमान में कुछ दूर साथ चले
कि कोई तो खजाना होगा ही !
व्यवहारिक खजाना होता मेरे भी पास,
यदि मैं व्यवहारिक रूप से उसे समेटना चाहती,
पर मेरे सपने अनमोल थे,
प्यार को मैंने पैसे से ऊपर माना
... पर अब ।
अनगिनत ठेस के बाद
कई बार सन्देह में पड़ जाती हूँ,
क्या सच में पैसा हर सोच की हत्या कर देता है !
क्या हर भावना से ऊपर पैसा है !
फिर सोचती हूँ,
ना,
प्यार तो नियंता है !
अणु के जैसा
प्यार का एक छोटा सा ख्याल भी
सौ मौतों पर भारी पड़ता है
तभी ...... तो चलती रही हूँ
चल रही हूँ
ऐसे वैसे के पेशोपेश में भी । ...
क्योंकि जैसा भी हो
हर असमंजस
मुझसे कमतर,
मुझसे कमजोर,
मुझसे छोटा पड़ जाता है ।

6 टिप्‍पणियां:


  1. ये दीजिए....

    आपकी लिखी रचना आज "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 23 जनवरी 2020 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. प्यार तो नियंता है !
    अणु के जैसा
    प्यार का एक छोटा सा ख्याल भी
    सौ मौतों पर भारी पड़ता है

    बहुत खूब रश्मि जी ,सादर नमन आपको

    जवाब देंहटाएं
  3. मन मानस से
    अपने सपनों की अमीरी जीती रही,
    जिसे देख कुछ लोग
    इस अनुमान में कुछ दूर साथ चले
    कि कोई तो खजाना होगा ही !
    बहुत सटीक एकदम दिल को छूती दिल की बात
    वाह!!!
    बहुत लाजवाब...

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