घड़ी सिर्फ़ समय नहीं बताती,
वह चेतावनी भी देती है।
आंखें दिखाती है,
बार-बार,
बिना चिल्लाए ।
मगर हम हैं कि
करवट बदल लेते हैं
जैसे समय
गलत बिस्तर पर आ गया हो।
और अगर घड़ी बंद पड़ जाए,
तो फ़ौरन कह देते हैं,
“ख़राब हो गई है।”
बैटरी ?-
वह तो
किसी और को लगानी चाहिए।
सूइयां ?
वे भी
अपनी जगह खुद
ढूंढ़ लें तो बेहतर।
घड़ी बोलती रहती है,
लगातार,
ईमानदारी से।
हम उसे अनसुना करते जाते हैं,
फिर शिकायत करते हैं
“वक़्त ठीक नहीं चल रहा।”
आख़िर में
दोष वही पुराना
बेचारी घड़ी का ।
शुभकामनाएं 2026 की | आते रहिएगा | हमारा भी हौसला बना रहता है |
जवाब देंहटाएंघड़ी की धड़कन सुनने की सार्थक कोशिश
जवाब देंहटाएंसुंदर रचना
जवाब देंहटाएंएक ऐसी रचना जो सटीक भी है, और प्यारी भी
जवाब देंहटाएंयार, ये कविता सीधे दिल पर लगती है। आपने घड़ी के बहाने हमारी आदतों को बहुत साफ दिखाया है। हम संकेत देखते हैं, फिर भी नजरअंदाज करते हैं और बाद में हालात को दोष देते हैं। हम खुद जिम्मेदारी नहीं लेते और उम्मीद रखते हैं कि सब अपने आप ठीक हो जाए।
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