कभी-कभी ज़िंदगी सांप-सीढ़ी के खेल जैसी होती है।
एकबारगी दो-तीन चाल में
हम सांपों से बचकर,
छोटी-बड़ी सीढ़ियां चढ़कर
लाल होने तक पहुंच जाते हैं,
यानी जीत जाते हैं।
फिर होंठों पर मुस्कान तैरती है,
मन में गर्व भर जाता है,
और हम स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मान बैठते हैं।
लेकिन सच तो यही है कि
सांप-सीढ़ी के खेल में जीत
अधिकतर अंक और अवसर का परिणाम होती है।
वहां न बुद्धि की विशेष भूमिका होती है,
न कौशल की, न रणनीति की,
जितना अंक आया,
उतना ही चलना होता है।
इसलिए जीत की खुशी मनाइए,
उसे जी भरकर
महसूस भी कीजिए,
लेकिन 'सर्वश्रेष्ठ' जैसे शब्द को
इतना हल्का मत बनाइए।
एक दिन,
एक प्रयास,
एक जीत,
किसी को सर्वश्रेष्ठ नहीं बनाती।
यहां तक कि कई दिन,
कई प्रयास
और अनेक जीतें भी
अपने आप किसी को सर्वश्रेष्ठ नहीं बना देतीं।
सर्वश्रेष्ठ वह है
जो धरातल से जुड़ा रहता है,
जो हार को आत्मसात करने का साहस रखता है,
जो गिरकर फिर उठता है,
जो पुनः प्रयास करता है,
और जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी
उम्मीद का हाथ नहीं छोड़ता।
उदाहरण के लिए
कर्ण और अर्जुन को महान योद्धा कहा जाता है।
किन्तु जिसने विषम परिस्थितियों में
आत्मा और रिश्तों के संघर्ष के आगे
अपना धैर्य खो दिया,
उसे सर्वश्रेष्ठ कहना सही नहीं है।
मेरी दृष्टि में अभिमन्यु
सर्वश्रेष्ठ था।
उसे ज्ञात था
कि वह चक्रव्यूह में प्रवेश कर लेगा,
पर उससे बाहर नहीं निकल पाएगा...
फिर भी वह गया
और अंतिम प्रहार तक युद्ध किया।
हर 'अगर' और 'मगर' से परे होकर
उसने शत्रुओं का सामना किया,
गुरुओं का सामना किया,
रिश्तों का सामना किया,
और अंततः अपनी नियति का भी सामना किया।
सच कहा जाए तो
सांप-सीढ़ी का खेल
कौरव और पांडव खेलते रहे।
भाग्य ने कभी किसी को ऊपर उठाया,
तो कभी किसी को नीचे गिरा दिया।
पर वह व्यक्ति सर्वश्रेष्ठ कैसा
जो केवल जीत गया ?
सर्वश्रेष्ठ वह है -
जिसने परिस्थितियों के आगे घुटने नहीं टेके,
जिसने साहस को अंत तक जीवित रखा,
और जिसने परिणाम से अधिक
अपने कर्म को महत्व दिया।
क्योंकि जीत-हार
कई बार संयोग मात्र होती है,
पर साहस, धैर्य और कर्म
हमेशा व्यक्ति का अपना चुनाव होते हैं।
रश्मि प्रभा
बहुत सटीक , प्रेरक एवं लाजवाब सृजन ।
जवाब देंहटाएंवाह |
जवाब देंहटाएंवाह्ह... लाज़वाब।
जवाब देंहटाएंसादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार १९ जून २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
सुंदर सृजन, वाक़ई साहस, कर्तव्य और धैर्य ही मानव को हर स्थिति का सामना करने में समर्थ बनाते हैं
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