08 मार्च, 2014

अपनी दृष्टि घुमाओ - अपनी स्वर्णिम गाथा लिखो



आज महिला दिवस है,
दिवस की सार्थकता के लिए
सुनो ऐ लड़की
तुम्हें जीना होगा
और जीने के लिए
नहीं करना कभी हादसों का जिक्र
क्योंकि उसके बाद जो हादसे होते हैं
पारिवारिक,सामाजिक और राष्ट्रीय
उसमें तुम्हारे हादसे
सिर्फ तुम्हें प्रश्नों के कटघरे में डालते हैं !

तुम आज भी
जाने कैसे सोचती हो
कि तुम्हारी चीखों से भीड़ स्तब्ध हो जाएगी
निकल आएगा कोई भाई उस भीड़ से
और तुम्हारी नक्कारा इज्जत के लिए
लड़ जाएगा आततायिओं से
याद रखो,
सच्चाई फिल्मों सी नहीं होती
और अगर कभी हुई
तो उसके परिवार के लोग तुम्हें कोसेंगे
फिर दूर दूर तक कोई गवाह नहीं होगा
और नहीं होगी कोई राहत की नींद तुम्हारी आँखों में  …

इन लड़ाइयों से बाहर निकलो
और जानो
इज्जत इतनी छोटी चीज नहीं
कि किसी हादसे से चली जाए !
इज्जत तो उनकी नहीं है
जो तुम्हें भूखे भेड़िये की तरह खा जाने को आतुर होते हैं
खा जाते हैं
उस हादसे के बाद
वे सिर्फ एक निकृष्ट,
हिंसक
 हैवान रह जाते हैं !

इस सत्य को जानो
अपने संस्कारों की अहमियत समझो
भीख मत माँगो न्याय की
अपना न्याय स्वयं करो
- अपने रास्तों को पुख्ता करो
अगली चाल में दृढ़ता लाओ
मन में संतुलन बनाओ
फिर देखो किसी की ऊँगली नहीं उठेगी
नहीं खुलेगी जुबान !

तुम अपनी दृष्टि घुमाओ
यह जो दिवस तुम्हें मिला है
उसे वार्षिक बनाओ
एक युग बनाओ  ....

यूँ सच भी यही है कि नारी एक युग है
जिसने घर की बुनियाद रखी
आँगन बनाया
बच्चों की पहली पाठशाला बनी
पुरुष की सफलता का सोपान बनी

दुहराने मत दो यह कथन
कि - अबला जीवन हाय  ....
आँसू उनकी आँखों में लाओ
जो तुम्हारी हँसी छीनने को बढ़ते हैं
स्वत्व तुम्हारा,अस्तित्व तुम्हारा
कोई कीड़ा तुम्हारी पहचान मिटा दे
यह संभव नहीं
उठो,
मुस्कुराओ
मंज़िल तुम्हें बुलाती है
निर्भीक बढ़ो
इतिहास के पन्नों पर
अपनी स्वर्णिम गाथा लिखो

28 फ़रवरी, 2014

मृत्यु के बाद



जन्म के बाद मृत्यु
तो निःसंदेह मृत्यु के बाद जन्म
कब कहाँ जन्म
और कहाँ मृत्यु
सबकुछ अनिश्चित   … !
कल्पना का अनंत छोर
जीने का प्रबल संबल देता है
साथ ही
मृत्यु की भी चाह देता है
चाह निश्चित हो सकती है
हो भी जाती है
पर परिणाम सर्वथा अनिश्चित
!!!
प्रयास के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं !!!
……………………
चलो एक प्रयास हम कल्पना से परे करें
मृत्यु के बाद का सत्य जानें
यज्ञ करें
विज्ञान की ऊँगली थाम आविष्कार करें
मृत शरीर की गई साँसों की दिशा लक्ष्य करें
सूक्ष्म ध्वनिभेद पर केन्द्रित कर सर्वांग को
…आत्मा में ध्यान की अग्नि जला
असत्य की आहुति दे
उस सूक्ष्मता को उजागर करें
…।
पाप-पुण्य की रेखा से परे
ईश्वरीय रहस्य को जाग्रत करना होगा
एक युग
एक महाकाव्य
एक महाग्रंथ का निर्माण करना होगा
जन्म-मृत्यु
इन दोनों किनारों को आमने-सामने करना होगा
संगम में मुक्ति है
तो उसी संगम में ढूंढना होगा
प्रेम का तर्पण
त्याग का तर्पण
मोह का तर्पण
प्रतिस्पर्धा का तर्पण
कुछ यूँ करना होगा
मृत्यु के पार सशरीर जाकर
आत्मा से रूबरू होना होगा -

22 फ़रवरी, 2014

कहानी कुछ और होगी सत्य कुछ और



मैं भीष्म
वाणों की शय्या पर
अपने इच्छित मृत्यु वरदान के साथ
कुरुक्षेत्र का परिणाम देख रहा हूँ
या  ....... !
अपनी प्रतिज्ञा से बने कुरुक्षेत्र की
विवेचना कर रहा हूँ ?!?

एक तरफ पिता शांतनु के दैहिक प्रेम की आकुलता
और दूसरी तरफ मैं
.... क्या सत्यवती के पिता के आगे मेरी प्रतिज्ञा
मात्र मेरा कर्तव्य था ?
या - पिता की चाह के आगे
एक आवेशित विरोध !

अन्यथा,
ऐसा नहीं था
कि मेरे मन के सपने
निर्मूल हो गए थे
या मेरे भीतर का प्रेम
पाषाण हो गया था !
किंचित आवेश ही कह सकता हूँ
क्योंकि ऐसी प्रतिज्ञा शांत तट से नहीं ली जाती !!
वो तो मेरी माँ का पावन स्पर्श था
जो मैं निष्ठापूर्वक निभा सका ब्रह्मचर्य
.... और इच्छितमृत्यु
मेरे पिता का दिया वरदान
जो आज मेरे सत्य की विवेचना कर रहा है !

कुरुक्षेत्र की धरती पर
वाणों की शय्या मेरी प्रतिज्ञा का प्राप्य था
तिल तिलकर मरना मेरी नियति
क्योंकि सिर्फ एक क्षण में मैंने
हस्तिनापुर का सम्पूर्ण भाग्य बदल दिया
तथाकथित कुरु वंश
तथाकथित पांडव सेना
सबकुछ मेरे द्वारा निर्मित प्रारब्ध था !

जब प्रारब्ध ही प्रतिकूल हो
तो अनुकूलता की शांति कहाँ सम्भव है !

कर्ण का सत्य
ब्रह्मुहूर्त सा उसका तेज  …
कुछ भी तो मुझसे छुपा नहीं था
आखिर क्यूँ मैंने उसे अंक में नहीं लिया !
दुर्योधन की ढीढता
मैं अवगत था
उसे कठोरता से समझा सकता था
पर मैं हस्तिनापुर को देखते हुए भी
कहीं न कहीं धृतराष्ट्र सा हो गया था !
कुंती को मैं समझा सकता था
उसको अपनी प्रतिज्ञा सा सम्बल दे
कर्ण की जगह बना सकता था
पर !!!
वो तो भला हो दुर्योधन का
जो अपने हठ की जीत में
उसने कर्ण को अंग देश का राजा बनाया
जो बड़े नहीं कर सके
अपनी अपनी प्रतिष्ठा में रहे
उसे उसने एक क्षण में कर दिखाया !

द्रौपदी की रक्षा
मेरा कर्तव्य था
भीष्म प्रतिज्ञा के बाद
अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका को मैं बलात् ला सकता था
तो क्या भरी सभा में
अपने रिश्ते की गरिमा में चीख नहीं सकता था !
पर मैं खामोश रहा
और परोक्ष रूप से अपने पिता के कृत्य को
तमाशा बनाता गया !

अर्जुन मेरा प्रिय था
कम से कम उसकी खातिर
मैं द्रौपदी की लाज बचा सकता था
पर अपनी एक प्रतिज्ञा की आड़ में
मैं मूक द्रष्टा बन गया !
मुझसे बेहतर कौन समझ सकता है
कि इस कुरुक्षेत्र की नींव मैंने रखी
और अब -
इसकी समाप्ति की लीला देख रहा हूँ !

कुछ भी शेष नहीं रहना है
अपनी इच्छितमृत्यु के साथ
मैं सबके नाम मृत्यु लिख रहा हूँ
कुछ कुरुक्षेत्र की भूमि पर मर जाएँगे
तो कुछ आत्मग्लानि की अग्नि में राख हो जाएँगे
कहानी कुछ और होगी
सत्य कुछ और - अपनी अपनी परिधि में !

21 फ़रवरी, 2014

इससे खूबसूरत पश्चाताप और कोई नहीं …



कहीं कुछ मेरे स्वभाव के विपरीत हुआ
मैंने ओढ़ ली चुप्पी की चादर
जबकि मुझे बोलना था
… मेरा मन बोल भी रहा था
बोलता ही है- समय-असमय
मैं सुनती रहती हूँ !!!
किसी स्पष्टीकरण की ज़रूरत भी नहीं
क्योंकि अपने सच के एक एक धागे को
मैं बखूबी पहचानती हूँ
कोई और समझेगा क्या ?
इतनी खुली समझ होती
तो दोराहे,तिराहे,चौराहे
आपस में उलझते नहीं !
जब दिशा ज्ञान ही भ्रमित हो उठा
तो शिकायत कैसी ?
किससे ?
कुछ नया तो हुआ नहीं है
जो शोर किया जाए !
ऊँगली उठाने का कोई अर्थ नहीं
अपने मन के धरातल को बखूबी देखना ज़रूरी है
कहाँ थी समतल भावनाएँ
कहाँ छोड़ दी गई काई
कहाँ रखे थे बातों के कंकड़
खुद का मुआयना कर लें
कुछ परिवर्तन ले आएँ
इससे खूबसूरत पश्चाताप और कोई नहीं  …
परिवर्तन का सूत्र उठाए
खड़ी हूँ रेगिस्तान में
धूल का बवंडर उठता है
तो रास्ते दुविधा में डाल देते हैं
कहाँ से चले थे
कहाँ जाना है - सब गडमड हो जाता है
पर मुझे पहुँचना तो है न तुम तक
 बाधाएँ कितनी भी हों
…… मुझे पहुँचना है उस मोड़ पर
जहाँ से अपने से एहसास की खुशबू आती है
....
मुझे खुद पर यकीन है
यकीन है कि मैं पछतावे की अग्नि शांत कर लूँगी
तुम्हारे चेहरे पर एक गाढ़ी मुस्कान दे जाऊँगी
तुम्हें भी यकीन है न ?-

17 फ़रवरी, 2014

शब्दों का अनमोल अर्घ्य दो





शब्द नुकीले शीशे से भी होते हैं
फिर
लहुलुहान घटनाओं का ज़िक्र
शीशे से क्यूँ ? !

होना था जो हादसा
वह तो हो गया
जिसे जाना था
वह चला भी गया
अब उसका वर्णन
वह भी शीशे जैसे शब्दों से
घाव को भरने की बजाय
खुरचने की प्रक्रिया है !
वर्षों तक  …
ज़ख्म भरते नहीं
नहीं जागता कोई हौसला
बस भयावह दृश्य ही रह-रहकर डराते हैं !

न्याय के लिए चीखो
'कैंडल मार्च' करो
आवाज़ों का आह्वान करो
पर निर्वस्त्र दृश्यों की चर्चा कर
उनके घर की नींव मत हिलाओ
जहाँ यह हादसा हुआ है
मत छीनो मासूम आँखों के सपने !

टायर जलाने से
किसी निर्दोष के रास्ते ही धुएँ से भरते हैं
जलाना ही चाहते हो
तो उस घर को जलाओ
जहाँ से घृणित जघन्य कार्य को अंजाम दिया गया
जिस कुर्सी से अन्यायी फैसला हुआ
व्यर्थ में उन्हें क्यूँ असुरक्षित करना
जिनके घर के आगे उनके माता-पिता
प्रतीक्षित चहलकदमी करते रहते हैं !

तुम साथ हो
यह जताने को
कोमल शब्दों का स्पर्श दो
दूर से वो आगाज़' करो
कि मन में विश्वास उत्पन्न हो
भय से निस्तेज आँखों में
प्राणसंचारित करते सपने भर जाएँ
शब्दों का अनमोल अर्घ्य दो
शूल नहीं !!!

04 फ़रवरी, 2014

शाश्वत निशाँ




मैं प्यार करती हूँ
हाँ हाँ तुमसे
शरीर की परिधि से परे
गहरे
मन की प्रत्यंचा पर
साधती हूँ अपने सपने
…… लक्ष्य - प्रेम
यानि तुम
और भर उठता है प्रेम उद्यान
ख्याल,विश्वास की गरिमा से  !
प्रेम उद्यान में शरीर एक नश्वर भाग है
जिसमें मन की साँसों से
प्राण-संचार होता है
तो यह मन करता है प्यार
देखता है निर्विघ्न -
तुम्हारी आँखों में
आँखों की सीढ़ियाँ उतर
तुम्हारे मन की दीवारों पर लिखे अपने ही नाम को
छूता है हौले से
डर तो लगता है न
कि कहीं मिट न जाए
……
मन तुम्हारे मन की ऊँगली थाम
भीड़ की आँखों से अदृश्य
अपने और तुम्हारे मन की पवित्र प्रतिमा की
करता है परिक्रमा
आँखों से निःसृत होती है शंख ध्वनि
हौले से जो मैं कहती हूँ
तुम कहते हो
मैं सुनती हूँ
तुम सुनते हो
वह मंत्र सदृश्य सत्य शिव सा सुन्दर होता है
प्रेम अश्रु बन जाता है प्रसाद
और साथ साथ चलते
बनते हैं शाश्वत निशाँ
हमारे  … 

01 फ़रवरी, 2014

एक और दिन जी जाने की मुहर




दरवाजे रोज खोलती हूँ
फिर भी जंग लगे हैं
शायद - इसलिए कि -
मन के दरवाजे नहीं खुलते !!!
तभी, अक्सर
ताज़ी हवाओं का कृत्रिम एहसास होता है
दम घुटता है
कुछ खोने की प्रक्रिया में !
कुछ खोना नहीं चाहता मन
पर इकतरफा पकड़ भी तो नहीं सकता
और  … मैं
प्रत्याशा की भोर में
खोलती हूँ सारे दरवाजे
बहुत शोर होता है
पंछी उड़ जाते हैं भयाक्रांत
मन की हथेली पर रखे दाने
रखे ही रह जाते हैं
.... सोचती हूँ,
बंद रहना,जंग खाना
अपनी विवशता का परिणाम है
या इनके हिस्से की नियति है यह !
वजह जो भी हो,
मैं हर दिन उम्मीदों की तलाश लिए
सोच की धुंध से लड़ती हूँ
ठंड लगने लगती है
शरीर अकड़ जाता है
मन कुम्हला जाता है
पर - मैं हार नहीं मानती !
बचपन से अब तक
आशाओं की चादर बड़ी घनी बुनी है
सिलाई उधड़े
- सवाल ही नहीं उठता !
जानती हूँ
मानती हूँ
रिश्ते बेरंग हों
तो उनको कोई शक्ल देना
बहुत मुश्किल है
अपनी जद्दोजहद से अलग
अपनों के सवालों की जद्दोजहद से भी गुजरना पड़ता है
बार-बार कटघरे में
एक ही जवाब देते-देते ऊब जाता है मन
साँचे में भी रखा रिश्ता
आकारहीन, बेशक्ल हो जाता है
और -
फिर,
अपना ही घर अजायबघर लगता है
चरमराते खुलते दरवाजे की आवाज से
माथे पर पसीना छलछला उठता है
....
कई बार सोचता है मन
कि आज धूप से कट्टी कर लूँ
पर - सुबह,दिन,शाम,रात से परे
जिंदगी खिसकती नहीं
उलझन ही सही -
वो भी ज़रूरी है
एक और दिन जीने के लिए
जी जाने की मुहर लगाने के लिए !!!

26 जनवरी, 2014

यह दिन इतिहास में विशेष रहे




फ्रॉक के घेरे को गोल गोल घुमाती
खुद घेरे के संग गोल गोल घूमती
मैंने सुना था तुम्हारा नाम
और नन्हें मन ने सोचा था - कौन है ये इमरोज़ !
थोड़ी बड़ी हुई तो जाना -
    अमृता का इमरोज़ !
उस उम्र ने माना - कोई किसी एक का होकर रह सकता है
वरना बकवास थी सलीम की बातें
अनारकली - बेचारी !
सोलहवें पड़ाव पर शिवानी की 'कृष्णकली' ने मन की ऊँगली थामी
यूँ ही उसका नायक प्रवीर दिखने लगा
और कली की बलखाती बातों में 'मैं' नज़र आई  …
उतार-चढ़ाव-उतार के ऊँचे-नीचे रास्तों का अनुभव मिला
तो एक बार फिर इमरोज़ याद आया
……।
'कोई नम्बर देगा क्या ?
फोन करुँगी तो वे बात करेंगे भी क्या ?'
सवालों में उलझने को हुई
तो कृष्णकली की तरह सारी गिरहें काट डालीं
और लगा दिया नम्बर  …
अरे बाप रे !
ये तो बज उठा है
क्या करूँ,क्या करूँ !!! … रिसीवर उठ गया
'हलो'
'इमरोज़' ?
हाँ मैं इमरोज़ बोल रहा हूँ '
कुछ देर के लिए मेरी आवाज फँस गई
फिर साहस किया -
बोली -
और फिर दिल्ली के हौज-ख़ास पहुँच गई !
बेटी को हिदायत थी - 'सहज तस्वीरें लेना'
खुली छत पर इमरोज़ का साथ
कबूतरों की बातें
वर्त्तमान में अमृता का आना-जाना
सबकुछ - अद्भुत था !
बरगद सा इमरोज़
और मैं -
पौधा कहूँ खुद को
या सूर्य किरणें !
कभी मैंने ऊँची निगाहें कीं
कभी वाष्पित किया इमरोज़ के अमृतमय ख्यालों को
…… इमरोज़ तठस्थ रहे !
कोई विशेष चाह नहीं
सिवाए अमृता के
और मैं विस्मित  … यह सत्य !
समर्पण की यह परिभाषा
इतिहास के स्वर्णिम पन्ने दोहराते रहेंगे
…हर 26 जनवरी को मेरे भीतर गोल गोल घूमती अबोध लड़की यही कहेगी
"यह विशेष जन्म हर युग में हो
और यह दिन विशेष रहे"
सोचती हूँ,
जब एक बच्चे की रुदन 26 जनवरी  .... को धरती पर उभरी
तो क्या उसमें 'माँ' की बजाय 'अमृता' थी !

21 जनवरी, 2014

बचपन की तरह





कुछ गीली मिट्टी ले आई थी मैं बचपन के खेल से 
सोचा था - 
जब जब हम इकट्ठे होंगे 
खेलेंगे उससे 
मिटटी सने हाथों को देख 
मासूम हँसी हँस लेंगे 
पर, 
मिट्टी -
जाने किस दिन 
जाने कैसे
सूख गई 
गीला करने को बहुत पानी मिलाया 
आँसू भी मिलाए 
पर मिट्टी !
गीली क्या, हल्की भी नहीं हुई 
…… 
शायद इसीलिए हम एक चेहरे पर 
दूसरा चेहरा लिए घूमते हैं 
हँसने के नाम पर 
होठ फैला देते हैं 
…! तुम्हें मैं बनावटी दिखती हूँ 
मुझे तुम !!!
बहस कैसी ?
साबित क्या करना है अब ?

बस एक बात बताना 
तुमने थोड़ी मिट्टी नहीं उठाई थी 
???
अगर उठाया हो तो अगली बार ले आना 
अपनी अपनी मिट्टी मिला देंगे 
शायद  .... शायद  … 
मासूमियत लौट आए हमारे चेहरे में 
और हम एक दूसरे का हाथ थाम 
बेसाख्ता हँसते जाएँ - बचपन की तरह 

17 जनवरी, 2014

सत्य होना सत्य कहना सत्य मानना - तीन आयाम हैं





सत्य होना 
सत्य कहना 
सत्य मानना - तीन आयाम हैं 
सत्य को जब नहीं मानना हो 
तो धर्म,समाज,परिवार का हवाला देकर चीखना 
बहुत ही आसान होता है 
पर कभी कभी 
खौलते तेल जैसे सत्य का सामना ज़रूरी है !!!
किसी के बच्चे को 
किसी की ज़िन्दगी को 
किसी के प्रेम को 
नाजायज़ कहना जितना सरल होता है 
उतनी सरलता उसकी सच्चाई में नहीं होती 
सच के लिए तह तक जाना होता है !

जो अपनी जान गँवा देते हैं 
या पूरी ज़िन्दगी जिंदा लाश बन 
तथाकथित कर्तव्यों का निर्वाह करते हैं 
उन्हें हम आसानी से खुदा मान लेते हैं 
और उनकी व्यक्तिगत चाह से परे 
उन्हें पूजा के सिंहासन पर रख देते हैं !

कृष्ण  .... 
जिसकी ज़िन्दगी में आँधियों ने डेरा बसा लिया 
उसके मौन सांचे के आगे 
छप्पन प्रकार का भोग लगा 
हम अपने लिए माँगते जाते हैं 
पूजा में भी स्वार्थ और स्वहित का दाव खेलते हैं  !!!

राम  … 
कभी मर्यादा पुरुषोत्तम 
कभी सीता के लिए प्रश्नों के कटघरे में  
बाल्यकाल से युवा होने तक 
सिर्फ परीक्षा 
और कर्तव्यों के निर्वाह में -
सुख की तिलांजलि !
गर्व से कहते है -
'एक पत्नी शपथ का निर्वाह किया' 
इससे परे एक प्रश्न उठता है -
उनकी ज़िन्दगी में था क्या ?
सिर्फ प्रजा !!!
बन सकोगे राम ?
नहीं न ? 
इसलिए उसे सिंहासन पर बैठा दिया 
और उसके नाम पर अपना घर भरते गए !

सीता !!!
सीता राजा जनक को मिलीं  .... 
यहाँ भी प्रश्न उठता है 
क्या सीता नाजायज संतान थीं ?
वो तो राजा जनक ने गोद लिया 
तो किसकी जुर्रत थी ज़ुबान खोलने की !
अयोध्या से वन गमन 
अशोक वाटिका 
युद्ध 
अयोध्या लौटने का हर्ष 
एक ऊँगली उठते  पुनः वन !!!

कथा है -
सीता को धरती माँ ने दिया 
तो फिर स्वीकार भी कर लिया 
सत्य कहता है, 
सीता फ़ेंक दी गईं 
धरती पर जनक को मिलीं 
और अंततः सीता ने आत्महत्या की  .... 
………… 
इस सत्य को समझते सब हैं 
पर ऐसा कहें कैसे !
धर्म आहत होगा !!

यूँ धर्म सत्य है 
तो 
स्त्री को सीता बनने की सलाह देने से पहले 
दिल पर हाथ रखकर उत्तर देना ---
साधारण घर में धरती से उठाई गई लड़की को 
सहजता से कितने लोग अपनाएँगे ?
अपनाकर अपनी महानता कितनी बार सुनायेंगे ?
अपहरण के बाद कितनी निष्ठा से बचाएँगे ?
एक ऊँगली उठने से पहले 
स्वयं कैसे कैसे प्रश्न उठाएँगे ?"

ये जवाब सहज नहीं है 
पढ़ते-सुनते ही लोग मुँह बिचका कर चल देंगे 
या फिर किसी विकृत समूह में 
विकृत ठहाके लगाएँगे !!!
सत्य होना 
सत्य कहना 
सत्य मानना - तीन आयाम हैं 

13 जनवरी, 2014

मेरे मोबाइल से इमरोज़





प्यार एक से होता है
प्यारे सब हो जाते हैं
जहेकिस्मत !
*****************************
अपने बच्चों
अपनी माँ के बीच
कभी भी
कोई राज बनकर नहीं जीना
ज़िन्दगी बनकर जीना
ज़िन्दगी ही सच है
सच ही आग है जीने के लिए !
*******************************
जब आदमी इंसान हो जाता है
ज़िन्दगी में ही रब का दीदार कर लेता है
*******************************
कानून साँस साँस कैद
मुहब्बत साँस साँस आजाद
ज़िन्दगी जीकर ज़िन्दगी बनती है
शब्द जीकर नज़्म बनते हैं
****************************
तुम्हें अपने आप ने जगाया है
अगर मेरा नाम 'अपना आप' होता
तो फिर
मैंने ही जगाया होगा  …
*****************************
जो कुछ भी हम सोचते हैं
ज़िन्दगी उसी की पैदावार होती है
तुम खूबसूरत सोचती हो
खूबसूरत करती हो
इसीलिए
उदासी में भी तुम खूबसूरत रही
और खुशकिस्मत भी
रश्मि भी  …
*************************
मुहब्बत ग्रंथों में नहीं समा सकती
ग्रन्थ मुहब्बत में समा सकते हैं
             
                     क्रमशः  :)

प्रीतम एंड पेद्रो

 कभी किसी से माफ़ी मांग लो,कभी किसी को माफ़ कर भी दो... यही शायद प्रीतम एंड पेद्रो की सबसे बड़ी सीख है। यह फिल्म सिर्फ़ एक कहानी नहीं सुनाती...