02 मई, 2019

तुम मुर्दा हो




अगर तुम्हारे जीने का कोई मकसद नहीं, तो तुम मुर्दा हो ।
अगर तुम्हारे भीतर किसी के लिए संवेदना नहीं,
तो तुम मुर्दा हो ।
अगर इंद्रधनुष देखकर तुम कभी नहीं झूमे,
कोई कौतूहल नहीं उठा तुम्हारे मन में,
तो तुम मुर्दा हो ।
पैसे से बढ़कर यदि तुम्हें जीवन का अर्थ समझ में नहीं आया,
तो तुम मुर्दा हो ।
किसी के लिए तुम्हारा मन ईश्वर के आगे नहीं झुका,
तो तुम मुर्दा हो ।
तुमको अपने स्वार्थ के आगे कुछ नहीं नज़र आया,
तो तुम मुर्दा हो ।
अपनी ग़लतियों को गर तुमने हमेशा किसी कारण का जामा पहना दिया,
या मानने से इंकार कर दिया,
तो तुम मुर्दा हो ।
एक छोटे से बच्चे में यदि तुम्हें ख़ुदा नज़र नहीं आया,
तो तुम मुर्दा हो !!!
वो जो चंद सांसें अब भी हैं तुम्हारे अंदर,
उसको अर्थवान बनाओ,
किसी डूबते के लिए तिनका बन जाओ,
अपने मुर्दा शरीर को मुक्ति दे जाओ...

16 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा लगता है कभी कभी मुर्दों के बीच एक मुर्दा हो जाना।

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  2. आपकी लिखी रचना "साप्ताहिक मुखरित मौन में" आज शनिवार 04 मई 2019 को साझा की गई है......... मुखरित मौन पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (03-05-2019) को "कंकर वाली दाल" (चर्चा अंक-3324) (चर्चा अंक-3310) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. जी नमस्ते,

    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ३ मई २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  5. बहुत सुंदर सच बिना संवेदनशीलता के मनुष्य बस मुर्दा ही है आत्मा रहित खोल ।
    अप्रतिम भाव रचना।

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  6. किसी डूबते के लिए तिनका बन जाओ,
    अपने मुर्दा शरीर को मुक्ति दे जाओ...
    बहुत खूब.... लाजबाब सृजन.... ,सादर

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  7. सार्थक संदेश...ऐसे मुर्दों के बीच ही रह रहे हैं और कभी कभी तो अपने ज़िंदा होने पर भी शक होने लगता है....

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  8. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन अंतरराष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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  9. बहुत ही सुन्दर सार्थक एवं सारगर्भित रचना..।
    बहुत लाजवाब

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