14 सितंबर, 2021

नज़रिए का मोड़


 

बात सिर्फ नज़रिए की है
कौन किस नज़रिए से क्या कहता है ,करता है
कौन किस नज़रिए से उसे सुनता,और देखता है
और इन सबके बीच 
एक तीसरा नज़रिया
उसे क्या से क्या प्रस्तुत कर देता है,
जाने क्या मायने रखता है सबके लिए !!!

ईमानदारी बहुत कम है दोस्तों,
कुतर्कों की अमर बेल तेजी से फैल रही है...
आलीशान घर हो या फुटपाथ
सबके पास एक मोबाइल है
और मोबाइल पर - क्या नहीं है !

गली गली, हर मोड़ पर
अजीब अजीब विचार और व्यवहार तैर रहे हैं,
जो नहीं तैर पाया उनके साथ
वह डूब गया ।
कोई डूबना नहीं चाहता
ऊपर रहने के लिए बगैर कपड़ों के भी आना पड़े
तो यह उनका नज़रिया है,
व्यक्तिगत मामला है ।

... मैं सोचती रहती हूं
डुबो या तैरो
आखिर कब तक !!!
एक दिन वही शमशान होगा
वही चिता होगी
या कोई अनजान जगह ...
जहां खोकर पता भी नहीं चलेगा !

कभी कभार चर्चा होगी,
जब तक कोई जाननेवाला है
उसके बाद कहानी 
कब, कैसे कैसे मोड़ लेगी
अनुमानों की चपेट में आएगी

कौन जाने !!!

13 सितंबर, 2021

जर्जर परंपरा तोड़ दो


 



स्त्रियां निर्जला व्रत प्यार का प्रतीक मानती हैं
पति,बच्चों के लिए ...
ऐसा करके वे खुद को मान लेती हैं सावित्री
और दृढ़ माँ !
अनादि काल से ऐसा देखते देखते 
पुरुषों ने,बच्चों ने मान लिया
कि उनकी पत्नी
उनकी माँ - सबसे जुदा हैं ।
गर्व से कहते हैं सब,
"बिल्कुल कुछ नहीं लगा ...!"

न लगने की यूँ कोई उम्र नहीं होती,
पर वह उम्र -
जब दवा के सहारे जीने लगता है आदमी,
तब खुद को सबसे जुदा रखने के लिए
खुद के लिए सोचना चाहिए,
सोचना चाहिए पति और बच्चों को
कि पानी बगैर रहना
सारी व्यवस्था करके पूजा पर बैठना
सर्कस का सबसे बड़ा खतरनाक खेल है
उंगली थमाते थमाते अचानक
ईश्वर भी हतप्रभ हो उठते हैं 
और कहने को रह जाता है एक ही वाक्य,
"नहीं करती तो कुछ हो जाता, "
...... 
ईश्वर कहें या आप,
पर रो रोकर 
दबी आवाज़ में 
बार बार यह कहने से अच्छा है
इन प्रश्नों और
व्यर्थ टिप्पणियों के चक्रव्यूह से 
बाहर निकलें
मन को गंगाजल कर लें
और मानसहित कहें -
"बहुत हुआ, अब रहने दो
हमारे लिए है ना 
तो हम कहते हैं, 
आज हमें कहने दो -
तुम स्वयं दुआओं का कलश हो 
जिसके जल से हम रोज़ नहाते हैं
तुम्हारी आंखों के गोमुख से 
जिस जाह्नवी की धारा बहती है
उसमें प्रतिपल भीग जाते हैं 
तुम्हारे अंतर का पूजागृह 
जिसके कपाट
कभी बंद ही नहीं होते हैं
तुम्हारी बातें हैं हर की पौड़ी 
जहां सुबह शाम उतर कर 
हम अपने सारे कष्ट धोते हैं 
तुममें सांस लेता है हर व्रत,
हर मंदिर, हर तीर्थस्थल 
तुमसे पावन नहीं हो सकता 
कोई पुरी या रामेश्वरम
या गंगासागर,
कोई कैलाश मानसरोवर
या मुक्तिदायिनी
भागीरथी का जल... 
तुम्हारा है हमारे भीतर वास
जर्जर हो रही इस परंपरा को
तोड़ दो
अब छोड़ भी दो 
ये निर्जला व्रत
यह उपवास।"

03 सितंबर, 2021

बरसाने की राधिका


 


साठ की कुछ सीढ़ियां चढ़ तो गई है वह स्त्री,

लेकिन वह उम्र और कर्तव्यों का
एक ढांचा भर है !
प्रेम उसका सपना था
प्रेम उसकी ख्वाहिश थी
अपनी पुरवा सी आंखों में
उसने प्रेम के बीज लगाए थे
 प्रेम की सावनी घटा बनकर
धरती के कोने कोने में 
थिरक थिरक कर बरसी थी।
इंद्रधनुष के सातों रंग
उसके साथ चलते थे,
गति की तो पूछो मत
हिरणी भी हतप्रभ हो दांतों तले उंगली दबाती थी  ।
ख्यालों में उसके कोई देवदार सा होता
और वह अल्हड़ लता सी
उससे लिपट जाती थी,
प्रेम का अद्भुत नशा था
अद्भुत उड़ान थी
कब वह कैक्टस से उलझी
कब उसके पंख टूटे
जब तक वह समझे
संभले 
वह दो उम्र में विभक्त हो चुकी थी,
एक प्रेम
एक मौन कर्तव्य !
मौन कर्तव्यों की यात्रा में
उसके चेहरे पर 
कब थकान की पगडंडियां उगीं
कब बालों का रंग मटमैला हुआ
कब पैरों के घुटने समाधिस्थ हुए
उसे खुद भी पता नहीं चला ।
तस्वीरों में
आईने में कई बार
खुद को ही नहीं पहचान पाई है
क्योंकि ख्वाबों में आज भी वह 
विद्युत गति से नृत्य करती है
अनिंद्य सुंदरी बन
अपनी पलकों को झपकाते हुए
प्रेम के शोखी भरे गीत गाती है 
सुनती है -
रावी और चनाब के किनारे
उसके नाम की तरंगें उछालते हैं 
एक उसे हीर कहता है 
एक अपनी सोहणी बताता है 
और दोनों किनारों के 
दरमियान खड़ा 
एक जवां अधीर साया 
उसके कानों में गुनगुनाता है 
"जलते हैं जिसके लिए
तेरी आँखों के दीये .."
इसे सुनकर, रोमांचित होकर 
वह ज़िंदगी के दरवाज़े पे लगे 
खामोशी के ताले खोलती है 
मुस्कुराते  हुए 
पड़ोसी दिल से बोलती है  ... 
"वह गोकुल का छोरा 
नटखट ग्वाला 
नंदलाला  ... 
युग बदले 
पर वह 
कण भर भी नहीं बदला  ... 
तो मैं आज भी 
बरसाने की 
राधिका ही हूं ना !


30 अगस्त, 2021

मैंने देवकी और यशोदा को ही जिया है


 



कृष्ण को सोचते हुए, 
मैं कभी राधा नहीं हुई,
न सुदामा, न सूरदास,न ऊधो ...
मैंने देवकी और यशोदा को ही जिया है,
लल्ला को गले लगाकर दुलारा है
बरसों का रुदन दबाए बिलखी हूँ ।
मैं बस माँ रही ...
क्या करती अपने ही कान्हा से गीता सुनकर
उसके मुख में ब्रह्माण्ड देख
उसे याद क्या रखना था,
मुझे तो बस भोली माँ बन
उसकी बाल लीलाओं से आनन्दित होना था
अन्यथा सच तो यही है
कि मुझ देवकी के 
सांवरे सलोने लाल ने
गीता का ज्ञान
मेरे गर्भ में लिया 
मेरे आंचल की छांव तले ब्रह्माण्ड को आत्मसात किया
उसे जगत कल्याण के निमित्त
ज्ञान का आगार बनना था,
मुझे अज्ञान के हिंडोले में
पेंग मारते हुए,
उसे अपलक देखते
विदा करना था
और सूने कक्ष में बैठ
उसकी मोहिनी सूरत को
स्मरण करना था
मगर ...
उस जैसा ज्ञानेंद्र
अज्ञानी जननी की
कोख से जन्मे
क्या कभी संभव है !
सात पुत्रों की नृशंस हत्या के आगे भी
मैं आठवें के विश्वास से परे नहीं हुई
ऐसे में,
प्रकृति के सारे सामान्य नियम बदलने ही थे !
कारा की कठोर धरती
और लौह बेड़ियों ने
मुझे स्वयं से
कई गुना कठोरतर बनाया
और चौदह वर्षों के लिए
मेरी आत्मा को यशोदा की आत्मा से बदल दिया ।
यशोमति का तन
देवकी का मन 
कान्हा का भरण पोषण
मैंने अपने लाल को 
यशोदा के हाथों से
माखन सा निर्मल,कोमल,और स्वाद से भरा बनाया
माथे मोरपंख लगा 
पैरों में मोर के नृत्य की गति दी
काठ की बांसुरी देकर शिक्षा दी
कि चाह लेने भर की देर होती है
पत्थर को भी सजीव किया जा सकता है
मनोबल हो तो 
गोवर्धन को उंगली पर उठाया जा सकता है !

एक सत्य और बताऊं,
लल्ला का सुदर्शन चक्र
हमदोनों मायें थीं
हमने उसे कभी भी
कहीं भी
अकेला और निहत्था नहीं किया
अभिमन्यु और कर्ण की मृत्यु पर
जब वह बिलखा था
उसके सारे आंसू हमने आँचल में बटोर लिए थे
 
... आज कृष्णा का जन्मदिन है
मुझ देवकी को पीड़ा सहनी है
बाबा वासुदेव को यमुना पार करना है
नन्द बाबा को उनकी गोद से कान्हा को लेकर
यशोदा का लाल बनाना है
फिर से गोकुल,वृंदावन,मथुरा,द्वारका को दोहराना है
आततायियों का नाश करना है
...
उससे पहले हमारे लाल को
जरा जरा माखन खिला दो
और जमकर उसका जन्मोत्सव मनाओ ...

23 अगस्त, 2021

रिश्तों का हवाला नहीं होता




जब हर तरफ से उंगली उठती है
तो बड़ी घबराहट
अकबकाहट होती है
लेकिन उस बेचैन स्थिति में भी
सारथी बने हरि साथ होते हैं
मन के रूप में ।
मन कहता है,
लौट यहां से
अभी इसी वक्त
स्पष्टीकरण की ज़रूरत नहीं
पता तो है तुझे
कि बात जब स्पष्टीकरण पर आ जाए
तो मानो,तुम गलत हो चुके हो
कुछ भी कहना जब समय की मांग नहीं,
तो बेहतर है एक लंबी ख़ामोशी
और ख़ामोशी की प्रतिध्वनि में
अपने 'अति' का मूल्यांकन !
. . .
मूल्यांकन करो,
तीव्रता से महसूस करो उन पलों को,
जहां से तुम्हें नियत समय पर हट जाना चाहिए था
न कि उसकी अवधि बढ़ाकर
रिश्तों का हवाला देना था ।
रिश्तों का कोई हवाला नहीं होता
गर हो तो बेहतर है 
इस हाले की घूंट से दूर
उस मधुशाला में जाओ
जहां तुम खुद को मिल सको
खुद को पा सको ।

19 मई, 2021

सुना तुमने ?


 

सुना तुमने ?
गणपति ने महीनों से मोदक को हाथ नहीं लगाया है
माँ सरस्वती ने वीणा के तार झंकृत नहीं किये
भोग से विमुख हर देवी देवता
शिव का त्रिनेत्र बन
माँ दुर्गा की हुंकार बन
दसों दिशाओं में विचर रहे ...
फिर नीलकंठ बनने को तत्पर शिव
देव दानव के मध्य
एक मंथन देख रहे
विष निकलता जा रहा है
शिव नीले पड़ते जा रहे हैं
माँ पार्वती ने अपनी हथेलियों से
विष का प्रकोप रोक रखा है
मनुष्य की गलती की सज़ा
मनुष्य भोग रहा है
अभिभावक की तरह अश्रुओं को रोक
देवी देवता अपने कर्तव्य को पूरा कर रहे
रात के सन्नाटे में
शमशान के निकट
उनकी सिसकियां ...
सुनी तुमने ???

28 अप्रैल, 2021

हमारा देश जहाँ पत्थर भी पूजे गए !


 


 


 हमारा देश
जहाँ पत्थर भी पूजे गए !

 
जाने किस पत्थर में अहिल्या हो
कहीं तो जेहन में होगा
जो हमीं ने पत्थरों में प्राणप्रतिष्ठा की
फूल अच्छत चढ़ाए
और सुरक्षित हो गए ।


बड़ों के चरण हम झुककर
श्रद्धा से छूते थे
कि उनका आशीर्वचन
रोम रोम से निकले
और ऐसा हुआ भी
और हम सुरक्षित हो गए ।


स्त्री के लिए हमने एक आँगन बनाया
जहाँ वह खुलकर सांस ले सके
अपने बाल खोल
धूप में सुखाए
आकाश से अपना सरोकार रखे
चाँद को रात भर देखे
स्त्री खुश थी
संतुष्ट थी
बाधाओं में भी उसके आगे एक हल था
जिसे संजोकर
हम सुरक्षित हो गए ।


फिर एक दिन हमने अपनी आज़ादी का प्रयोग किया
बोलने की स्वतंत्रता को
स्वच्छंदता में तब्दील किया ...
हमने पत्थर को उखाड़ फेंका
अपशब्द बोले
और उदण्डता से कहा,
"अब देखें यह क्या करता है !"


बड़ों के आगे झुकने में हमारी हेठी होने लगी
चरण स्पर्श की बजाय
हम हवा में घुटने तक हाथ बढ़ाने लगे
प्रणाम करने का ढोंग करने लगे
बड़ों ने देखा,
महसूस किया
उनके आशीर्वचनों में उनकी क्षुब्धता घर कर गई
. .. सिखाने पर हमने भृकुटी चढ़ाई
उपेक्षित अंदाज में आगे बढ़ गए
घने पेड़ की तरह वे भी धराशायी हुए
हम फिर भी नहीं सचेत हुए !


आँगन को हमने लगभग जड़ से मिटा दिया
जिस जगह पुरुष द्वारपाल की तरह डटे थे
वहाँ स्त्रियाँ खड़ी हो गईं
उनकी सुरक्षा में खींची गई
हर लकीर मिटा दी गई
हम भूल गए कि कराटे सीखकर भी
एक स्त्री
वहशियों की शारीरिक संरचना से नहीं जूझ सकती !!!
दहेज हत्या,कन्या भ्रूण हत्या,...
हमने स्त्रियों का शमशान बना दिया
और असुरों की तरह अट्टहास करने लगे
माँ के नवरूप स्तब्ध हुए
जब उनके आगे कन्या पूजन के नाम पर
कन्याओं की मासूमियत दम तोड़ गई
कंदराओं में सुरक्षा कवच बनी माँ
प्रस्थान कर गईं !
गंगा,यमुना,सरस्वती ... कोई नहीं रुकी !


उसका घर मेरे घर से बड़ा क्यों?
उसकी गाड़ी मेरी गाड़ी से कीमती क्यों?
और बनने लगा करोड़ों का आशियाना
आने लगी करोड़ों की गाड़ियां
ज़रूरतों को हमने
इतना विस्तार दे दिया
जहाँ तक हमारी बांहों की
पहुँच नहीं बनी
पर हमने
उसे समेटने की कोशिश नहीं की
उस नशे ने हमें आत्मघाती बना दिया
फिर हम ताबड़तोड़
आत्महत्या करने लगे ।


अति सर्वत्र वर्जयेत"
 इसीके आगे आज हम असहाय,
निरुपाय ईश्वर को पुकार रहे ।
पुकारो,
वह आएगा
लेकिन मन के अंदर झांक के पुकारो
लालसाओं से बाहर आकर पुकारो
पुकारो,पुकारो
ईश्वर ने सज़ा दी है
कठोर नहीं हुआ है"
इस विश्वास के साथ अपने संस्कारों को जगाओ
फिर देखो - वह प्रकाश पुंज क्या करता है ।


08 मार्च, 2021

महिला दिवस


 


इतिहास गवाह है,
विरोध हुआ 
बाल विवाह प्रथा का 
सती प्रथा का 
दहेज प्रथा का
कन्या भ्रूण हत्या का
लड़कियों को बेचने का
उनके साथ हो रहे अत्याचार का ...
पुनर्विवाह के रास्ते बने
लड़का-लड़की एक समान का नारा गूंजा
सम्मान के नाम पर 
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस निर्धारित हुआ
लेकिन,
कुछ अपवादों को छोड़कर
हर क्षेत्र में उठ खड़ी होने पर भी
महिलाओं के प्रति
न सोच बदली
न स्थिति
शिक्षित होने पर भी
नसीहतों की ज्वाला में
उसे जलना पड़ता है ।
स्वेच्छा से विवाह - 
तो स्वच्छन्द !
आत्मनिर्भरता के परिणामस्वरूप
परिवार के लिए देर से लौटी
तो कलंकिनी !
व विवाह नहीं किया
तो लानत,
विवाह नहीं टिका
तो मलामत ।
पति अत्याचारी
तो भी उलाहना
अकेली किसी के साथ हँस बोल लिया
तो मिथ्यानुमानों के संदेह  !
बच्चों के लिए
सम्पूर्णतः उसकी जिम्मेदारी 
एक कप सुबह की चाय पति ने दे दी
तो कटाक्ष करने से 
अधिकांश लोग पीछे नहीं हटते !
'दिवस' मनाना
और हृदय से सम्मान देना
दो अलग स्थितियाँ हैं !
नवरात्रि हो
या महिला दिवस
स्थिति जो कल थी
वही लगभग आज भी है
और कल भी होगी ।

03 मार्च, 2021

चाहा तो ऐसा ही था !


 














"पुष्प की अभिलाषा" से मेरा क्या वास्ता था अपनी तो बस एक चाह थी छोटी सी पर बहुत बड़ी ... कि मैं बनूं, अल्हड, अगराती पुरवा का बेफिकर, बेखौफ, बिंदास झोंका दरवाज़ा चाहे जिसका भी हो, उसकी सांकल खटखटा दूं और दरवाज़े के खुलते ही जब तक कोई संभले, शैतान बच्चे की तरह - करीने से रखी सारी चीज़ें बिखेर दूं, मेरी धमाचौकड़ी से जो मचे अफरातफरी...सामान सहेजने की तो मैं शोखी का जामा पहनकर ज़ोर से खिलखिलाऊं ! बन जाऊं --- केदार की बसंती बंजारन जायसी की कलम से निकला वो भ्रमर, वो काग कालिदास का मेघ प्रियतम का संदेश सुनाता, गाता मेघराग पहाड़ों के कौमार्य में पली वादियों के यौवन में ढली शिवानी की अनिंद्य सुंदरी नायिका ! ......... बारिश ठहरने के बाद आहिस्ता आहिस्ता टपकती बूंदों की नशीली आवाज़ की तरह, मिल जाए कोई इश्क - सा ! पकड़ ले मेरा हाथ और कहे, ' थम भी जा बावरी ! थक जाएगी, आ, थोड़ा बैठ जा चल मेरे संग एक प्याली चाय आधी- आधी पी लें ... पर ज़रा रुक, मैं बंद कर लूं खिड़कियां वरना निकल जाएगी तू ! ...... बता तो सही, नदी, नालों, पहाड़ों को पार करते सुदीर्घ यात्रा तय कर हंसिनी सी, मानसरोवर के तीर जा पहुंचती है ..... क्या तलाश रही है ? खुद को ? मिल जाएगी क्या ऐसे ? खुद से ? अकेली ही ? ' और मैं ! पुरवा का परिधान उतार कर उस माहिया, उस रांझणा के पन्नों पर स्याही सी बिखर जाऊं ..... मेरे अंदर की पुरवाई ने चाहा तो ऐसा ही था !

01 मार्च, 2021

अटकन चटकन


 

विरासत में पिता से मिली कलम, वंदना अवस्थी ने उसे सम्मान से संजोया ही नहीं, ज़िन्दगी के कई सकरी गलियों में घुमाया, कहीं रुदन भरा,कहीं हास्य,कहीं घुटन,कहीं विरोध और अपनी खास दिनचर्या में इसकी खासियत को बड़े जतन से शामिल किया । "बातों वाली गली" से गुजरकर, आज अटकन चटकन की गलियां हैं, जिसमें सिर्फ सुमित्रा,कुंती ही नहीं, किशोर,छोटू,रमा,जानकी,छाया, ... जैसे विशेष पात्र भी हैं, और लेखिका ने किसी को अपनी कलम से अछूता नहीं रखा है ।

अछूता तो लेखिका ने कुंती के दूसरे पक्ष को भी नहीं रहने दिया, वरना अक्सर लोग सिर्फ बुराइयों में लगे रहते हैं । हाँ तो कुंती सुमित्रा के बच्चों को बहुत प्यार करती थी और स्वयं सुमित्रा की जो इज़्ज़त उतार दे, पर मज़ाल थी किसी की जो उसके आगे सुमित्रा के बारे में कटु शब्द बोलकर निकल जाए । 

ख़ैर, उम्र की सांझ के करीब आते आते जीवन की गहरी सच्चाइयां कुंती के आगे अकेलापन बनकर आई । सबसे इतना बुरा व्यवहार किया कि सब उससे दूर हो गए, जुड़ाव दिखाया भी तो मतलब से ! एक बच्चा भी उसके निकट खेलने से कतराता था । और ऐसे सन्नाटे में, समय से लगे तमाचे की आवाज़ में कुंती को अपना हर गलत किया दिखने लगा । परिचित तो वह पहले भी थी, पर तब उम्र की धौंस थी । उसने सुमित्रा के साथ जो किया, उसके पछतावे में वह सुमित्रा के पास ही गई, क्षमा नहीं मांगा, पर अपना दिल उसके आगे ही उड़ेलकर रखा । 
सुमित्रा ने ही मन लगाने का रास्ता दिखाया ... शिक्षा तो उनके घर की नींव थी, सो बच्चों को शिक्षा देना और इसीसे ज़िन्दगी को खूबसूरत बनाने का सिलसिला शुरू हुआ और जीवन की समाप्ति से पूर्व कुंती ने प्रायश्चित भी कर लिया, "सुमित्रा शिक्षा निकेतन" खोलकर ।


.....समाप्त ।

26 फ़रवरी, 2021

अटकन चटकन


सब दिन न होत न एक समान"... कुंती के कर्मों से शर्मिंदा होकर समय ने बहुत कुछ बदल दिया और इसी बदलाव ने कुंती को बहुत कुछ सोचने पर बाध्य किया । 

केंद्र में सुमित्रा को रखकर कुंती ने न सिर्फ अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ा, बल्कि बदजुबान होती गई । बच्चों के साथ भी वह जीतने की कोशिश में लगी रही, जीत भी मिली, पर जब मात होने का मंजर शुरू हुआ तब कुंती अकेली पड़ गई । बड़ी बहु जानकी का आना, उसके द्वारा ग़लत का विरोध करना, समस्याओं से जूझने के लिए पीपल वाले बाबा को ढाल बना लेना एक बहुत स्वाभाविक घटना है । खुद लेखिका ने भी माना है कि ऐसा होता है, होने के पीछे की मनःस्थिति गौर करने की है । सुमित्रा के आगे जानकी स्वीकार भी करती है, और सुमित्रा मानती है कि कुंती के साथ यह सही उपाय है । 
क्योंकि यह एक सच्ची कहानी है तो यह तो सिद्ध होता है कि खुद लेखिका ने इसे रूबरू देखा या सुना है (मेरी समझ से) । और देखने-सुनने में हमसब एक अनुमान, आगे पीछे की शत प्रतिशत सच्ची,झूठी विवेचना से गुजरते ही हैं - सबसे अहम होता है, प्रत्यक्ष में घटित घटनाएं और उसका दिलोदिमाग पर प्रभाव । यह प्रभाव का ही असर है कि लेखिका ने उस मीठे बुंदेली भाषा को भी उकेरा है, जो सुमित्रा-कुंती-रमा-जानकी वगैरह  के मध्य हुआ, जो सहजता से पाठकों को छूता है, एक रोचकता का एहसास देता है । 

क्रमशः
 

 

प्रीतम एंड पेद्रो

 कभी किसी से माफ़ी मांग लो,कभी किसी को माफ़ कर भी दो... यही शायद प्रीतम एंड पेद्रो की सबसे बड़ी सीख है। यह फिल्म सिर्फ़ एक कहानी नहीं सुनाती...