19 मई, 2021

सुना तुमने ?


 

सुना तुमने ?
गणपति ने महीनों से मोदक को हाथ नहीं लगाया है
माँ सरस्वती ने वीणा के तार झंकृत नहीं किये
भोग से विमुख हर देवी देवता
शिव का त्रिनेत्र बन
माँ दुर्गा की हुंकार बन
दसों दिशाओं में विचर रहे ...
फिर नीलकंठ बनने को तत्पर शिव
देव दानव के मध्य
एक मंथन देख रहे
विष निकलता जा रहा है
शिव नीले पड़ते जा रहे हैं
माँ पार्वती ने अपनी हथेलियों से
विष का प्रकोप रोक रखा है
मनुष्य की गलती की सज़ा
मनुष्य भोग रहा है
अभिभावक की तरह अश्रुओं को रोक
देवी देवता अपने कर्तव्य को पूरा कर रहे
रात के सन्नाटे में
शमशान के निकट
उनकी सिसकियां ...
सुनी तुमने ???

14 टिप्‍पणियां:

  1. सच है देवी-देवता भी मानवों की पीड़ा से अछूते कैसे रह सकते हैं, वे जो प्रेम और ममता के सागर हैं, अति भावपूर्ण सृजन !

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  2. अभिभावक की तरह अश्रुओं को रोक
    देवी देवता अपने कर्तव्य को पूरा कर रहे .
    बस मन में आस्था बानी रहे . वरना तो हर और अँधेरा ही फैला है .

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  3. बहुत ही गहरी बात कही है दीदी! परमपिता है जब वो, तो अपनी संतान की अकाल मृत्यु पर, चाहे वह उसी की सुनिश्चित की हुई क्यों न हो, रोएगा कैसे नहीं!! कविता की व्यथा हर पाठक के हृदय को कचोटती है !

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  4. NBN Australia is working towards designing all the Australian homes and businesses as futuristic by transforming all the telephone and internet services.

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  5. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगवार(१७-०८-२०२१) को
    'मेरी भावनायें...'( चर्चा अंक -४१५९ )
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  6. बहुत अच्छी और गहन रचना...।

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  7. अच्छा लगा एक लम्बे समयान्तराल के बाद आपका चिट्ठा सूची मैं फिर दिखा|

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  8. वाह जनाब वाह !!अंदाज ए बयाँ बेहद खूबसूरत । मेरी जानिब से बेशुमार दाद आओके लिए आदरणीय👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌👌

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  9. हरएक मन यही सोच रहा, यही दशा है सबकी। विचलित कर रहे है घटनाक्रम। कोई इसे प्रकृति का न्याय कह रहा है तो कोई युग परिवर्तन का दौर.... ना जाने ईश्वर रूपी माँ ने अपनी संतानों की दुर्दशा देखकर भी कैसे मन कठोर कर रखा है !

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  10. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" गुरुवार 02 सितम्बर 2021 को साझा की गयी है.............. पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  11. मानवता को तड़पता देख ईश्वर भी दुखी हो रहे है पर क्या कर सकते हैं हम अपनी गलतियों की सजा भुगत रहे है।

    मार्मिक सृजन ,सादर नमन रश्मि जी

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